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दो रोटी और एक गिलास पानी !
मदन गोपाल 
एक अख़बार था इलाहाबाद का 'स्वराज्य '.इसमें लिखने वालों में ग़दर पार्टी के लाला हरदयाल भी थे .गणेश शंकर विद्यार्थी भी इसमें काम करते थे जिन्होंने बाद में ' प्रताप ' अखबार निकाला .' स्वराज्य ' के संपादक थे शांति नारायण भटनागर जिनकी लिखाई इतनी तीखी थी कि उनके मित्र बार बार नर्म रुख अख्तियार करने को कहते थे .भटनागर ने एक बार लिखा , 'स्वराज्य ' के कड़े रवैये के पीछे देशवासियों को उनके सुन्नपन से झकझोर कर उठाना है ताकि उनमे अपने पतन और विदेशी सरकार के शोषण के प्रति चेतना जागे .' स्वराज्य ' के शुरू होने के छह महीने में ही सरकार की उसमे राजद्रोह की गंध आने लगी .इलाहाबाद के कलेक्टर ने शांति नारायण को तलब किया और कहा कि इस तरह के लेख न छापे जिसमे सरकार को राजद्रोह दिखे .संपादक ने जवाब में लिखा ,सरकार की प्रशंसा करने वाले अखबार अगर गलत जानकारी और भारतियों के प्रति अपमान जनक विचार भी छाप दे तो सरकार उन्हें टोकती नहीं .उन्होंने लाहौर से छपने वाले अंग्रेजी पत्र ' सिविल और मिलेट्री गजट ' का वास्ता दिया जिसके खिलाफ अभियोग चलाने की बात लाहौर के कई वकील कर रहे थे .पर सरकार ने मामला दायर करने की अनुमति देने से इंकार कर दिया .कलेक्टर ने जवाब में कहा  कि उनका काम संपादक को चेतावनी देना और सरकार का नजरिया समझाना भर है .इसके आगे वे कुछ सुनना नहीं चाहते .उन्होंने संपादक को दफ्तर से चले जाने को कहा .इस घटना पर संपादक ने अख़बार में लिख कर पूछा कि क्या इनके अखबार को अंग्रेजी हुकूमत के आगे झुक जाना चाहिए .फिर उसका जवाब भी उन्होंने उसी लेख में दिया .लिखा कि यह उनके मूल्यों के खिलाफ होगा .सरकार से बढ़ते टकराव के बाद स्वराज्य के दो संपादक को राजद्रोह की सजा मिली .शांति नारायण भटनागर को पांच साल की सजा और एक हजार का जुर्माना हुआ .उसके बाद बाबू रामहरी अख़बार के ग्यारह अंक निकाल पाए थे कि उन्हें 21 साल के लिए अंडमान जेल भेज दिया गया .जैसे ही इसकी जानकारी मिली मुंशी रामदास जो लाहौर से ' भारत माता ' नाम का अखबार निकालते थे वे अगली गाडी से इलाहाबाद निकल पड़े .स्वराज्य अख़बार को खरीदने .उन्हें अखबार खरीदने के समय ही गिरफ्तार कर लिया गया .एक हजार रुपए जुर्माने के लिए छापाखाना नीलाम किया जाने लगा .नीलामी जिस ब्रिटिश कलेक्टर के मातहत हो रही थी ,उसने कटाक्ष में पूछा ,अब इस मुग़ल ताजोतख्त पर कौन बैठेगा ?महात्मा नन्द गोपाल चोपड़ा एकदम आगे आए .वे उस समय देहरादून से आ पहुंचे थे .वे स्वराज्य के सिर्फ बारह अंक निकाल पाए थे की राजद्रोह के इल्जाम में गिरफ्तार कर लिए गए उन्हें तीस साल की सजा हुई और अंडमान के सेलुलर जेल भेज दिया गया .
 
वर्ष 1907 में ही  'स्वराज्य ' मे एक बार इश्तहार छपा था -संपादक चाहिए .वेतन में सिर्फ दो चपाती और एक गिलास पानी मिलेगा .और संपादक के लिखे संपादकीय पर दस साल का कारावास भी हो सकता है .इसके संपादकों में शांति नारायण भटनागर ,बाबू रामहरी से लेकर नंदगोपाल चोपड़ा तक संपादक रहे और सब लंबे समय के लिए जेल गए संपादकीय लिखने की वजह से .इस इश्तहार के बाद बाद बीस और लोगों ने संपादक के लिए आवेदन कर दिया था .जारी 
 
 
(बीते दिनों में अखबार और टीवी चैनलों में लाखों रुपए का वेतन पाने वाले कुछ संपादकों को अपनी नौकरी छोडनी पड़ी है .पत्रकारों की काम करने की आजादी पर बार बार सवाल उठ रहे हैं .यह भी कहा जा रहा है कि पत्रकारिता पर बाजारुपन  हावी है .ऐसे माहौल में आज से 106 साल पीछे की पत्रकारिता को याद करने की जरुरत है .तब भारत उस ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा था जिसमे कभी सूरज ढलता नहीं था .लेकिन भारत भर में कई साधारण लोग असाधारण काम कर रहे थे .इन्ही लोगों की तपस्या से पत्रकारिता को इज्जत मिली .वर्ष 1905 से 1908 के बीच लिखे गए ऐसे ही एक लेख का संपादित अंश जल्द जनादेश में कुछ किस्तों में देंगे .यह लेख गैगिंग द प्रेस के एक खंड का हिंदी अनुवाद है जिसका संपादन ' गांधी मार्ग ' के लिए सोपान जोशी ने किया है .लेखक मदन गोपाल का जन्म लाहौर में हुआ .वे कई अख़बारों के संवाददाता और संपादक रहे .वर्ष 1982 में वे चंडीगढ़ में द ट्रिब्यून के संपादक पद से रिटायर हुए थे .   )
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