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पक्की फसलों का सुनहरा सरोवर

शेखर जोशी

हिमालय के प्रांगण में अल्मोड़ा जनपद की पट्टी पल्ला बौरारौ के गणनाथ रेंज की उत्तर-पूर्व दिशा में प्राय: 5500 फुट की ऊंचाई पर बसा मेरा ओलियगांव दो भागों में विभाजित है. इस छोटे से गांव में मात्र ग्यारह घर हैं. गांव की बसासत ऊंचाई वाले भाग में बांज, फयांट, बुरुँश, पयाँ और काफल के वृक्षों से घिरी है. ऊपर की पहाडिय़ों में चीड़ का घना जंगल है.'कुमाऊं का इतिहास' के लेखक पंडित बद्रीदत्त पांडे के अनुसार उन्नाव जनपद अन्तर्गत डोडिया खेड़ा नामक स्थान के प्रकांड ज्योतिषी पंडित सुधानिधि चौबे ने कुंवर सोमचंद से एक भविष्यवाणी की थी. वह यह थी कि यदि वह उत्तराचखंड की यात्रा करें, तो उन्हें राज्य की प्राप्ति हो सकती है. तो, कुंवर 22 लोगों के साथ उत्तराखंड की यात्रा पर चले और ज्योतिषी जी की वाणी सच साबित हुई. कुंवर सोमचंद ने कुमाऊं में चंद वंश की स्थापना की. सुधानिधि चौबे ने राज्य का दीवान बनकर चंद राज्य को विस्तार और स्थायित्व प्रदान किया. सुधानिधि के वंशज इस राज्य के पुश्तैनी दीवान रहे. ज्योतिषी जी के गर्ग गोत्रीय वंशज झिजाड़ गांव के जोशी कहलाये.अनुमान किया जा सकता है कि झिजाड़ से कुछ परिवार नौ पीढ़ी पूर्व किसी सुरम्य स्थान की खोज में ओलियागांव में आकर बस गये.
काठगोदाम-गरुड़ मोटरमार्ग पर मनाण और सोमेश्वर के बीच एक स्थान रनमन है. सड़क के दांई ओर खेतों से आगे कोसी नदी प्रवाहित होती है. दड़मिया का पुल पार कर जंगलात की सड़क पर आगे बढ़ें, तो मात्र आधा किलोमीटर चलने पर देवदारु का घना जंगल शुरू हो जाता है, जो प्राय: एक किलोमीटर तक फैला है और उसके बाद चीड़ वन प्रारम्भ होता है. इसी चीड़ वन से घिरा है ओलियागांव शस्य श्यामल भूमि पर एक कटोरे के आकार में. गांव के दोनों भागों के बीच कल-कल करती हुई एक छोटी नदी बहती है और उस पार चार मकानों के बाद गिरिखेत का मैदान, देवी थान और फिर सीधी चढ़ाई. इसी पहाड़ पर बहुत ऊपर बहता है, एक झरना. बरसात के मौसम में उस छोटी अनाम नदी की तेज धारा और इस झरने के शुशाट के कारण गांव के आर-पार के घरों तक अपनी आवाज पहुंचना मुश्किल हो जाता है.
गांव की पूरब दिशा में बहुत दूरी पर भटकोट के शिखर दिखाई देते हैं, जिन पर सूर्य की किरण पड़ती हैं तो दिन के आरंभ की प्रतीति होती है. इन्हीं शिखरों पर शीतकाल में पहली बर्फबारी होती है, तो ये रजत शिखर चमकने लगते हैं.ऋतु परिवर्तन के साथ यह कटोरा भिन्न प्रकार के धान्य से भर उठता है. पहले धानी रंग के पादप, फिर खड़ी फसल की हरियाली और जब फसल पक जाती, तो धान्य का यह कटोरा सुनहरे सरोवर का रूप ले लेता है. घास के हाते ऊंची- ऊंची घास का कंबल ओढ़ लेते हैं.
मैं भाग्यशाली था कि इसी गांव में श्री दामोदर जोशी और श्रीमती हरिप्रिया जोशी के घर में सन 1932 के पितर पक्ष में तृतीया के दिन मेरा जन्म हुआ. नामकर्ण के दिन पुरोहितजी ने मुझे  चंद्र दत्त नाम दिया था, परन्तु वर्ष 1944 में मामा ने स्कूल में मेरा नाम चंद्र शेखर लिखवाया. चंद्र का दिया हुआ नहीं, शीर्ष पर चंद्र धारण करने वाले शिवजी का पर्याय बना दिया.
हम तीन भाई-बहन थे. मैं उनमें सबसे छोटा था. कहा जाता है कि जब मैं पैदा हुआ, तब मेरी नाक बहुत चपटी और सिर हांडी जैसा था. लेकिन माता-पिता को अपनी संतान कैसी भी हो, बहुत प्यारी होती है. मैं सबका लाड़ला था.गांव में हर घर के साथ फल-फूलों के बगीचे थे, पेड़ थे. हम लोगों का बचपन पेड़ों के साथ, पशुओं के साथ और फूल-पत्तियों के साथ बीता. हमने यह भी सीखा कि किस तरह से अनाज बोया जाता है, अनाज उगता है और अनाज काटा जाता है.
 
खेती में लड़कपन में हमारा कोई विशेष योगदान नहीं होता था, लेकिन हमें इसमें बहुत आनंद आता था, खास तौर से जब धान की रोपाई होती थी. एक छोटे खेत में बेहन बोया जाता था. उसमें खूब घने पौधे होते थे. जब वे बड़े हो जाते थे, करीब 6-7 इंच के, तो उनको वहां से उखाड़कर दूसरे खेतों में रोपते थे. उससे पहले जिन-जिन खेतों में रोपाई होनी होती, उनको पानी से खूब सींचा जाता. पानी से भरे खेत में दांता चलाया जाता, जो कि मिट्टी के ढेलों को तोड़ देता. उससे खेत की मिट्टी समतल हो जाती थी. धान रोपाई का काम पूरे दिन का होता था. बहुत से खेतों में रोपाई होती थी, तो खूब सारे मजदूर लगते थे. वे लोग भी उसको एक उत्सव की तरह से मनाते थे, क्योंकि उस दिन उनको खूब अच्छा खाना मिलता था—रोपाई वाला. उस दिन हलवाहे की विशिष्ट भूमिका होती थी. अगर हलवाहा हुड़किया भी होता, तब तो उसकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती थी. हुड़किये का मतलब यह है कि वह डमरूनुमा वाद्य 'हुड़की' को हाथ में लेकर बजाता और पगड़ी बांध कर खेत में सिर्फ गाता फिरता. कतार में औरतें पूलों में से पौधे लेकर रोपती जातीं. अलग-अलग जगहों पर पूले रख दिये जाते. औरतें पूले खोलकर उनमें से पौधें निकालतीं और रोपती जातीं. हुड़किया चंद्राकार या सीधे पीछे हटता जाता और हुड़की बजाता हुआ गाता जाता. वह कोई कथानक लगा देता—राजा भर्तृहरि या राजा हरिश्चन्द्र का, बम-बम्म-बम... हुड़की की आवाज के साथ. औरतें आखिर में टेक लेतीं और वे भी साथ में गातीं. खेत में जाने से पहले हरेक को रोली और अक्षत का टीका लगाया जाता. उस दिन उनके लिए विशेष किस्म का कलेवा बनाया जाता—मोटी रोटियां होती हैं, बेड़ुवा मतलब मंडुवा और गेहूं की मिली हुईं रोटियां, कुछ पूडिय़ां और सब्जी. कलेवा हुड़किया के लिए अलग, हलवाहे के लिए अलग, हलवाहे की पत्नी के लिए अलग और आम महिलाओं के लिए अलग बनता. दिन में सभी के लिए खेत में ही दाल-भात पहुंचाया जाता. सभी भर पेट खाना खाते और उनके बच्चे भी आ जाते. शाम को जब औरतें काम खत्म कर देती थीं, तो हाथ-पैरों में लगाने के लिए उनको थोड़ा-थोड़ा तेल दिया जाता था.
खेतों में बने बिलों में पानी भर जाने से बड़े-बड़े चूहे निकलते थे. शाम को अगर खेत बकाया रह जाता, तो मालिक नाराज न हो जाये, इसलिए हुड़किया हुंकारी लगाता था—'धार में दिन है गो, ब्वारियो.... छेक करो, छेक करो.' मतलब कि चोटी पर सूरज पहुंच गया है. जल्दी करो, बहुओ, जल्दी करो.  
कार्तिक में जब धान की फसल पक जाती थी, तो उसकी पूलियां खेत में ही जमा करके रख दी जाती थीं. धान की पेराई के लिए इस्तेमाल होने वाली बांस की चटाइयों को 'मोस्ट' कहते थे. ये पतले बांस की नरसल की चटाइयां होती थीं, जो कि 10 फुट बाई 10 फुट या 8 फुट बाई 8 फुट की होती थीं. ये चटाइयां बड़े खेत में बिछा दी जाती थीं और उनमें धान के पूले रख दिये जाते थे. लकड़ी का बड़ा-सा कुंदा रखकर उसमें धान को पछीटा जाता था. पूलियों में जो धान रह जाता, उसे पतली संटियों से झाड़ा जाता था. धान के खाली पराल को अलग करते. चांदनी रात को पूरी रात यह कार्यक्रम चलता. एकाध बार मैं भी जिद करके इस तरह के कार्यक्रम में गया. कई मजदूर लगे थे. हमारी ईजा भी गई थीं. धान की वह खुशबू और चांदनी रात, बहुत आनंद आता था.
धान की पकी फसलों को नुकसान पहुंचाने में जंगली सुअरों का बड़ा हाथ रहता. वे अपनी थूथन से खेत की मिट्टी को खोद कर न जाने क्या ढूंढ़ते रहते. लीलाधर ताऊजी के पास एक भरवां बंदूक थी, जिसमें बारूद, साबुत उड़द के दाने, कपड़े का लत्ता, ठूंस-ठूंस कर ट्रिगर के ऊपरी सिरे पर टोपी चढ़ाने के बाद फायरिंग की जाती, तो सुअर भाग जाते. यह काम देर रात में किया जाता था.
इस बंदूक से जुड़ा एक रोचक प्रसंग है, जिसने हमें बचपन में बहुत गुदगुदाया था. हमारी माधवी बुआ की ससुराल मल्ला स्यूनरा में थी, जो हमारे गांव से अधिक दूरी पर नहीं था.
उस बार उनका पोता राम अकेला ही अपनी दादी के मायके में आया था. वह 14-15 वर्ष का किशोर बहुत ही दुस्साहसी था. ताऊजी की भरवां बंदूक उनके शयनकक्ष में कोने पर टंगी रहती थी. एक दिन महाशय राम की नजर उस पर पड़ी. उसने साबुत उड़द के दाने, पुराने चिथड़े, कुछ कठोर पत्थर के टुकड़े जमा किये. उसे न जाने कैसे बारूद का पाउडर भी आलमारी में मिल गया था. उसने खूब ठूंस कर बारूद से सना यह सामान बंदूक की नाल में भरा. अब समस्या ट्रिगर (घोड़ी) में पहनाने वाली टोपी की थी. वह नहीं मिली, तो राम ने ट्रिगर उठा कर छेद के मुंह के सामने जलता चैला (छिलुक) रख दिया. बंदूक ऊंचाई पर टिकाई हुई थी. उसके अंदर भरे मसाले में आग लगी, तो बारूद विस्फोट करता हुआ, दीवार के ऊपर रखे ताऊजी के जूते से टकराया. दूसरी तरफ छिद्र से निकली चिंगारी के छींटे राम के कपाल पर जा लगे. खैरियत यह थी कि उसकी आंखें सुरक्षित रहीं. गांव के लड़कों की तरह वह टोपी पहने रहता था. उस दिन राम ने अपनी टोपी आंख की भंवों तक खींच रखी थी. हादसे के बाद वह बंदूक को यथास्थान रख आया .
बाद में ताऊजी जब अपना जूता पहनने लगे, तो उसमें बड़ा-सा छेद देख कर वह चौंके. राम ने उन्हें बताया कि एक काला कुत्ता जूतों के पास बैठा था. शायद उसी की यह कारस्तानी हो. लेकिन जब किसी ने राम की टोपी को ऊपर खिसका कर ठीक से पहनाने की कोशिश की, तो ललाट में चानमारी के निशानों ने उसकी पोल खोल दी. राम अपने गांव भाग गया.
 
पकी फसलों, विशेषकर धान के खेतों के बीच से गुजरने का अपना आनंद होता था. पके धान की मादक गंध तन-मन को एक नयी स्फूर्ति से भर देती थी.
धान की पेराई के अलावा मुझे गेहूं की मड़ाई में भी बहुत आनंद आता था. गेहूं की पूलियां घर के आँगन के ऊपर वाले खेत में लाकर जमा कर दी जाती थीं. आँगन की खूब अच्छे से सफाई करके लिपाई कर दी जाती थी. जब आँगन सूख जाता, तो पूलियां आंगन में फैला दी जातीं. फिर बैलों को गेहूं की बालियों के ढेर के ऊपर चलाया जाता था. हम बच्चे उनके पीछे-पीछे हाथ में संटी लेकर चलते थे—'हौ ले बल्दा, हौ ले- हौ ले... कानि कै लालै बल्दा... पुठि कै लालै, हौ ले-हौ ले... ' मतलब बैल राजा चल/धीरे-धीरे चल/ कंधे में लाद कर लायेगा, पीठ पर लाद कर लायेगा/ बल्दा चल. बैल गेहूं की पूलियों को अपने पैरों से कुचलकर दानों को अलग कर देते थे. बैल गेहूं न खा लें, इसलिए उनके मुंह में जाली बांधी जाती थी. बाद में सूपों से या चादरों से हवा करके भूसे को उड़ाया जाता. एक सयाना इधर से, तो दूसरा उधर से चादर पकड़ता और चादर को तेज-तेज ऊपर-नीचे कर हवा करते. इससे भूसा उड़ता जाता और गेहूं नीचे गिरता जाता. उसके बाद हम बच्चे जहां गाय-भैंस चरने जातीं, वहां से सूखा हुआ गोबर लेकर आते. पहाड़ में गोबर का ईंधन के रूप में इस्तेमाल नहीं होता था, क्योंकि गोबर खेती के लिए बहुत जरूरी होता है, इसलिए उसे बरबाद नहीं किया जाता. गोशाला की रोज सफाई होती. गोबर को गोशाला के बाहर डाल दिया जाता. वहाँ खाद का ढेर लगा रहता. जो घास पशुओं के नीचे बिछाई जाती, वह उनके पेशाब और गोबर में सन कर सुनहरी खाद हो जाती. वही जैविक खाद खेतों में डाली जाती थी. वह खाद फर्टिलाइजर से कहीं ज्यादा अच्छा होती थी.
हम बच्चे सूखा हुआ गोबर लेकर आते थे. उस गोबर का ढेर लगा करके उसमें आग लगा दी जाती थी. उसके जलने से राख बनती. बांस की चटाइयां बिछा कर और उन पर गेहूं डाल कर उसमें राख डाली जाती. फिर पैरों से उसको मिलाया जाता. राख कीटनाशक दवा का काम करती थी. यह गांव की विधि थी कि किस तरह से अनाज को सुरक्षित किया जाता था. जिन चटाइयों पर खेती का काम होता था, उनको ऐसे ही लपेट कर नहीं रखा जाता था. उन चटाइयों के लिए बकायदा गोशालाओं में गाय का या अन्य पशुओं का मूत्र कनस्तर में इकठ्ठा किया जाता था. पशुओं के मूत्र को इन चटाइयों पर छिड़का जाता था. उससे एक तो चटाइयों में लचीलापन आ जाता था. दूसरा, कीड़े नहीं लगते थे. इससे ये चटाइयां वर्षों चलती थीं. मूत्र सूखने पर चटाइयों को लपेटकर टांड़ के ऊपर डाल दिया जाता. जब जरूरत हुई, तब निकाल लिया जाता.
 
हम बच्चे बचपन से ही खेती-बाड़ी के बारे में जान जाते थे और अपनी क्षमता के अनुसार कुछ करते भी रहते थे. जैसे—गर्मियों में बैंगन और मिर्च की पौध लगाते. हम अपनी-अपनी क्यारियां बनाते थे. फिर उनमें मिर्ची और बैंगन के पौध रोपते थे. भिंडी की पौध नहीं होती थी. भिंडी के बीज बोये जाते. शाम को हम पौधों में गिलास से पानी डालते थे. फिर पौधों का क्रमिक विकास देखते थे—पौधे बड़े होते जाते. फिर उनमें फूल लगते. इसके बाद उनमें फल लगते. जब पौधों में पहला फल दिखाई देता, तो हमें बहुत खुशी होती. अगर कोई सीधी उंगली से फल की तरफ इशारा कर देता, तो हम टोकते कि ऐसा करने से सड़ जायेगा. उंगली टेढ़ी करके दिखाना होता था कि वह देखो, फल आ गया है.
इस तरह का मनोविज्ञान और लगाव बचपन से वनस्पतियों के साथ था.
पहाड़ों में मैदानी इलाकों की तरह पतली ककड़ी नहीं होती. वहां बड़ा खीरा होता है जिसे कहते ककड़ी ही हैं. खीरे की बेल को कोई सहारा देना पड़ता है. बेलों के सहारे के लिए कोई छोटा पेड़ काटकर या पुराने पेड़ की टहनी को काटकर उसे लगाया जाता था. बेल उस पर लिपट कर चढ़ जाती. पेड़ के सहारे खीरे लटके रहते थे. जब फसल समाप्त हो जाती, तो बेल को निकाल दिया जाता. उसमें छोटे-छोटे खीरे लगे रहते थे. इनकी अब बढऩे की सम्भावना नहीं रहती थी. हम बच्चे उनको निकालकर उन पर सीकों की टांगें लगाकर बकरे की तरह से उनकी बलि देते थे. ऐसा हमने मंदिरों में देखा होता था, जहां बलि दी जाती थी. मेरी एक कविता है--
काली की बलि पूजा का स्वांग,
रचा लगा तिनकों की टाँग
हरी ककड़ी के अंतर को छेद
छिन्न कर उसका मस्तक बांटा प्रसाद
न रखा छूत-अछूत का भेद.
खट्टे अनार को दाडि़म कहते हैं. पंसारी के यहां चटनी के लिए जो अनार दाना बिकता है, वह दाडि़म का ही बीज होता है. दाडि़म का फूल सिंदूरी रंग का होता है. आरी के दांतों की तरह तिकोनी उसकी चार-पांच पंखुड़ियां होती हैं. उसको उल्टा करके रख देने से फूल खड़ा हो जाता. वे फूल पेड़ों के नीचे खूब गिरे रहते थे. हम उनको इकठ्ठा करके लाते और कतार में रखकर बारात निकालते थे. उनमें सींकें लगाकर डोली वगैरह बना लेते. इस तरह के खेल होते थे हमारे जो वनस्पति संसार से हमको जोड़ते थे.जारी 
 
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