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साहित्यकार की बदबू और जनवादीसेंट

जगदीश्वर चतुर्वेदी 

 रायपुर साहित्य मेला पर हिन्दी के  रायपुरिया प्रतिवादी वामलेखकों की तथाकथित प्रतिवादी प्रतिक्रियाएं और जलेसं के रुख को देखकर जनवादी-प्रगतिशील साहित्यकार पदबंध से घृणा होने लगी है। यह साहित्यिक बदबू पहले भी थी,लेकिन इधर तो इसने विराट रुप धारण कर लिया है । इसे हम सुविधा के लिए 'साहित्यकार की बदबू' या 'साहित्य का कचड़ा' कहेंगे। आप जितना ही लेखक संगठनों के करीब जाएंगे उतना ही इस बदबू का अहसास करेंगे। हिन्दी में हमने साहित्यकार की घिनौनी हरकतों को छिपाने के लिए कुछ तथाकथित वैचारिकसेंट का इस्तेमाल किया है। जनवादीसेंट उसमें से एक है। हम कहना चाहते हैं इससे साहित्यिक बदबू खत्म नहीं होगी! साहित्यिक गंदगी साफ नहीं होगी। जनवादीसेंट तो लेखक का नकली आवरण है।  
   उल्लेखनीय है साहित्यिक गंदगी को कभी हिन्दी के तीनों बड़े लेखक संगठनों (जलेसं,प्रलेसं,जसम) ने निशाना नहीं बनाया । रायपुरिया वामप्रतिवादी लेखकों ने भी कभी इसके खिलाफ कुछ  नहीं लिखा! लेखक  संगठनों के द्वारा प्रकाशित पत्रिकाएं देखें और खोजें कि 'साहित्यकार की बदबू'  और ' साहित्य का कचड़ा' क्या इनके निशाने पर है? स्थिति की भयावहता का चरम यह है कि लखनऊ से प्रकाशित एक जनप्रिय साहित्यिक पत्रिका के संपादक ने हाल ही में एक लेखक से दो टूक कहा नामवर सिंह के खिलाफ वह कोई लेख नहीं छापेगा ! यह संपादक हिन्दी में सबका प्यारा कहानीकार है! सवाल यह है  क्या इस तरह की सेंसरशिप की जरुरत है ? क्या इस तरह की सेंसरशिप की नामवर सिंह को जरुरत है ?
    हिन्दी साहित्यकार के घिनौने रुप को  हमने सुंदर राजनीतिक नारों से ढ़ंक दिया है। मसलन् , आप धर्मनिरपेक्ष हैं ,वामपंथी हैं ,लेखक संगठन के नेता के पसंदीदा लेखक हैं,या भक्त हैं ,तो लेखकनेता आपकी भूरि-भूरि प्रशंसा करेगा,चाहे आपका लेखन कचड़ा हो। सवाल उठता है  जलेसं,प्रलेसंऔर जसम ने लेखकों के गैर-अकादमिक और गैर-पेशेवर कर्मों पर कभी खुली बहस क्यों नहीं की ? लेखक के आचरण और आलोचना का गहरा संबंध है, लेखक के मूल्यबोध और आचरण का उसके नजरिए के साथ गहरा संबंध है, ऐसा क्या घटा है जिसने लेखक को दरबारी बना दिया ? यह कैसे हुआ कि दरबारीपन को हम वैचारिक प्रतिबद्धता कहने लगे ?दरबारी होने पर लेखक न तो लोकतांत्रिक होगा और न जनवादी होगा। वह दरबारी ही रहेगा।  
     हम जलेसं के पदाधिकारियों से जानना चाहेंगे कि कॉमरेड! क्या लेखक फ्रंट पर सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है ? क्या हिन्दी के सभी स्व-नामधन्य वामलेखक दूधके धुले हैं ? क्या वे राजनीतिक दरबारी संस्कृति के शिकार नहीं हैं ? क्या इन लेखकों ने राजनीतिक गुटबाजी को त्याग दिया है ?
     लेखकों में राजनीतिक दरबारीपन और गुटबाजी ,साहित्यिक अपराध है। सामाजिक पतनशीलता की निशानी है। लेकिन इन दोनों प्रवृत्तियों को अपने-अपने तरीके से लेखक संगठनों ने बढ़ावा दिया है। वे सामान्य लेखक से इसी तरह के आचरण की मांग भी करते  हैं।  लेखकों में राजनीतिक-साहित्यिक मसलों पर प्रचार हो, विवाद हो,लेकिन लेखकों में राजनीतिक दरबारीपन और गुटबाजी न हो, इस ओर इन लेखक संगठनों ने कभी ध्यान नहीं दिया।
       'साहित्यकार की बदबू' की जड़ है राजनीतिक दरबारीपन। इस दरबारीपन के आधार पर ही अनेक लेखकों ने बड़े-बड़े पुरस्कार पाए, सरकारी खरीद में किताबें बिकवाने में सफलता हासिल की।प्रकाशकों को पाकेट में डाला। मंत्रियों-नेताओं-मुख्यमंत्री-केन्द्रीयमंत्री –पार्टी सचिव को जेब के हवाले किया। केन्द्र सरकार के नेताओं और कम्युनिस्ट पार्टी नेताओं की जी-हुजूरी की, और ऊँचे ओहदे पाए! यही वह प्रवृत्ति है जिसने साहित्य में मिथ्या प्रशंसा को साहित्यिक समीक्षा में रुपान्तरित कर दिया। दिलचस्प बात है जो हिन्दी साहित्य में दरबारी संस्कृति के नायक हैं, वे ही हिन्दी के महान लेखक भी हैं ! उनकी जेब में ही लेखक संगठन भी हैं !
    दरबारी  भावना के कारण  लेखक संघ के पदाधिकारी लेखककीय अहंकार में डूबे रहते हैं, दूसरों को उपदेश देते हैं, सलाह देते हैं, यह करो,यह न करो, यह सही है,वह सही नहीं है। फलां व्यक्ति लेखक नहीं है, फलां व्यक्ति लेखक है, मैं सही हूँ ,वह गलत है। फलां बाजारु है, बिका है, फलां प्रतिबद्ध है। फलां जनवादी है, फलां वाम है,फलां प्रगतिशील है,फलां बड़ा लेखक है, फलां छोटा लेखक है, इसका लिखा पढ़ो, उसका लिखा मत पढो, उसके यहां जाओ,इसके यहां मत जाओ, उसे गोष्ठी में बुलाओ,इसे मत बुलाओ,जो हमारे साथ नहीं है उससे दूर रहो, जिसे संगठन से निकाल दिया है उसका बहिष्कार करो,बार-बारलेखकों से कहो कि वह भ्रष्ट है,पतित है, हम महान हैं, पुण्यात्मा हैं, दूध के धुलेहैं, हमारे साथ पार्टी है, उसके साथ पार्टी नहीं है, जो पार्टी में नहीं उसे लेखक मत मानो, जो पार्टी में नहीं उसे निकृष्ट मानो, जिस पर पार्टी का वरदहस्त है उसे परम पवित्र मानो, वैचारिक रुप से दूध का धुला मानो, हमारी हां में हां मिलाओ,यही वह दरबारीपन है जहां से हिन्दी साहित्य के प्रगतिशील—जनवादी समूह में चीजें तय की जाती रही हैं। यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां पर हर किस्म की साहित्यिक तिकड़म और घोटालों को  पुण्यकर्म में रुपान्तरित कर दिया जाता है। इन सब चीजों को मैंने बहुत करीब से देखा है,यही वजह है कि मैंने कभी अपने को  प्रगतिशील या जनवादी साहित्यकार के रुप में नहीं देखा,मुझे साहित्यिक दरबारीपन देखकर बार-बार यही महसूस हुआ  कि मैं कम से कम साहित्यकार नहीं बन सकता, मैं साहित्यकार नहीं हूँ, मुझे इस तरह की हरकतें नापसंद  हैं ।
   रायपुर साहित्य मेला पर जलेसं के महासचिव-उपसचिव का बयान लीपापोती और लेखकीय अहंकार की आदर्श अभिव्यक्ति है। दुखद है ये दोनों पदाधिकारी दो-टूक ढ़ंग से प्रतिवादी लेखकों के तथाकथित प्रतिवादी रुख से अपने को अभी तक अलग नहीं कर पाए।इससे भी दुखद है  जलेसं के नेतृत्व का अहंकार और निर्देशभरा भावबोध। इसमें लोकतंत्र और लोकतांत्रिक व्यवहार की न्यूनतम मर्यादा का ख्याल तक नहीं रखा गया। हम जानना चाहते हैं  कि जलेसं का पदाधिकारी बन जाने पर क्या लेखकीयअहंकार और लेखककीय ओहदा बढ़ जाता है ? क्या जो लेखक नहीं है ,यानी मेरे जैसे लोग, वे क्या तुच्छ और हेय हो जाते हैं ? मैं निजी तौर पर अपने को हिन्दी का साहित्यकार नहीं मानता, मेरी कोई रुचि साहित्यकार बनने की कभी नहीं रही , क्योंकि हिन्दी के मौजूदा अधिकांश साहित्यकार मुझे प्रेरणाहीन और जुगाड़ में मशगूल लगते हैं। वे अपने को महान और श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए दूसरे लेखकों को हेय ठहराते रहे, छोटा दिखाते रहे हैं।  वे कभी अपने सांगठनिक दरबारीपन को आलोचनात्मक नजरिए से नहीं देखते। इससे लेखकों का व्यापक स्तर पर नुकसान हुआ है। जलेसं की लेखक संगठन के रुप में साख में बट्टा लगा है। जलेसं दरबारीपन और लेखकीय अहंकार के दायरे से बाहर आएं तो समाज में बेहतर हस्तक्षेप कर सकता है। लेकिन रायपुर साहित्य मेला प्रसंग में जिस तरह का निम्नस्तरीय आचरण जलेसं ने किया है उससे यह उम्मीद कम लगती है कि वे दरबापीपन से बाहर निकलेंगे !फेसबुक से साभार 
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