राजकुमार शर्मा
देहरादून.एक बार फिर केन्द्र की मनमोहन सिंह सरकार ने गंगा के अविरल धारा के महत्व को स्वीकारते हुए देवभूमि उत्तराखण्ड के साधू-संतो के समक्ष हथियार डालते हुए भागीरथी पर बनने वाले छह सौ मेगावाट की जल बिद्युत परियोजना को बंद करने का फैसला लिया है.इस परियोजना में भारत सरकार के अब तक लगभग छह सौ करोड़ रूपये खर्च हो चुके है,एनटीपीसी द्वारा अब तक इस परियोजना के 40 फीसदी कार्य किया जा चुका हैं.केन्द्र सरकार के मंत्रियों समूह की बैठक में यह फैसला किया गया. इस प्रकरण को लेकर केन्द्र सरकार के भीतर भी लम्बे समय से आपसी खींचतान चल रही थी एनटीपीसी क ेअब तक खर्च किये गये करोड़ों रूपये का हवाला देकर केंद्रिय उर्जा मंत्री सुशील सिंदे इस जल बिद्युत परियोजना को बढ़ाये जाने की वकालत कर रहे थे वही वन,पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश पर्यावरण एंव गंगा के अविरल धारा की दुहाई देकर संत महात्माओं की भावना के अनुरूप इसे खत्म करने की पैरवी कर रहे थे.इस प्रकरण में वित्तमंत्री की अगुवाई में एक मंत्री समूह का गठन प्रधानमंत्री जी ने किया था.पिछले दिनों किये गये भारी निवेश का हवाला देते हुए इस जल विद्युत परियोजना को जारी रखने की सिफारिश की थी.इस मंत्रीयों की सिफारिश ने पुरे देवभूमि हिमालय के संतों को उद्वलित करके रख दिया.इसके बाद हरिद्वार सहित पुरे देश के संत महात्माओं ने इस मंत्री समूह के सिफरिश का कड़ा विरोध किया,प्रख्यात पर्यावरणविद् प्रो.जी.डी.अग्रवाल ने हरिद्वार के मातृसदन में आमरण अनशन शुरू कर दिया.सरकार द्वारा परियोजना को वापस लेने की सरकारी घोषणा के बावजूद भारत सरकार के वन,पर्यावरण मंत्री जैराम रमेश जब प्रधानमंत्री के प्रतिनिधी के रूप में प्रों.अग्रवाल का अनशन तोड़वाने मातृसदन पहुचे तो प्रो.अग्रवाल ने गंगा बेसिन एथार्टी की बैठक बुलाकर सन्तों की सहमती के बाद अनशन समाप्त करने की बात कह कर मंत्री जी को बैरंग वापस कर दिया.प्रो अग्रवाल दो बार सरकारी अमले द्वारा छल किये जाने से इस बार हर कदम फूक-फूक कर रख रहे है.
भारत सरकार ने इस बार तीन मंत्रियों की एक कमेटी बना कर पर्यावरण से लेकर जन भावना सहित अनेक मुद्दों का पुनः परीक्षण किया जिसकी रिपोर्ट के आधार पर इस परियोजना पर कार्य न बढ़ाने की अनुशंसा की.इस समिति की काम रोकने की अनुशंसा से गंगा के अस्तित्व को बचाने की दिशा में एक महत्व पूर्ण कदम माना जा रहा है.केन्द्र सरकार इस बार कोई धोखा नही कर रही है इसकी हर सम्भावना के बावजूद गंगा के लिए आंदोलन चलाने वाले प्रो.अग्रवाल सहित इससे जुड़े संत ठोस कार्यवाही के पक्षधर है.
भारत सरकार ने इस परियोजना को रोकने का निर्णय करके राज्य के भारतीय जनता पार्टी की हिन्दूत्व विचारधारा पर आधारित निंशक सरकार के हाथ से गंगा से जुड़ा वह मुद्दा भी झटक लिया है जिसमें गंगा के नाम पर अपनी राजनीति की रोटी सेकने का जो सपना भारतीय जनता पार्टी एंव उसके नेता लालकृष्ण आडवानी देख रहे थेे.गंगा को देश की करोड़ों जनता की आस्था से जुड़ा होने के कारण आडवानी अयोध्या के राम मंदिर की तरह एक बार अपने पक्ष में उसका लाभ लेना की योजना ही बना रहे थे.इसी के चलते सूबे की निंशक सरकार ने स्पर्श-गंगा कार्यक्रम का शुभारम्भ ऋषिकेश से आडवानी जी को बुलाकर किया था, फिर सूबे के मुख्यमंत्री ने चारधाम यात्रा आरम्भ होने के पहले दिन ही उन्हे(आडवानी) को गंगोत्री बुलाकर गंगा पर राजनीति की रोटी सेकी थी.निंशक सरकार ने इतना ही नही गंगा का ब्रंाड अम्बेसडर अपने दल के सांसद मसहुर फिल्म अभिनेत्री हेमा मालिनी को बना कर जनता के धन का नाच-गाने पर खर्च किया.सूबे के सरकार के इस स्पर्शगंगा कार्यक्रम से गंगा मईया का तो कोई भला नही हुआ ,सूबे की सरकार को हिन्दूओं की भावना को भूनाने का एक मुद्दा जरूर मिल गया.
यूपीए अध्यक्ष सोनिया गंाधी के सुझाव पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पहले गंगा को राष्ट्रीय नदी का दर्जा दिया फिर उसकी अबिरल
धारा को गंगोत्री तक ले जाने का मार्ग प्रशस्त करते हुए उसमें आ रही बाधा लोहारीनाग पाला जल विद्युत परियोजना को वापस ले लिया . गंगा को साफ करने का एक पावन भागीरथ प्रयास पूर्व प्रधानमंत्री स्व.राजीव गंाधी ने गंगा कार्य योजना में अरबों रूपये की कार्य योजना देकर किया था इस पावन योजना को इस कदर देश में बह रही भ्रष्टाचार की बढ़ी गंगा ने निगल लिया जिसके जलते अरबों रूपये पानी में बहाने के बावजूद गंगा के निर्मली करण का कार्य एंव राजीव गांधी का सपना चकना चूर हो गया.इस योजना के ध्वस्त होने की घटना के साथ राजीव के गंगा के निर्मली करण की सोच के
आकार न ले सकने पर ﴾जानकार तत्वों की माने तो )यूपीए अध्यक्ष सोनिया गंाधी स्वंय आश्चर्य चकित है और चाहती है कि करोड़ों हिन्दूओं की आस्था की केन्द्र गंगा को हर हाल में अविरल पावन बनाये रखा जाय.इसी कारण दह सौ करोड़ रूपये भारत सरकार के ब्यय करने के बावजूद सरकार ने इस परियोजना पर काम रोकने का निर्णय लिया.
गंगा पर सूबे की निशंक सरकार पूरी तरह से राजनीति कर रही है. पहले मुख्यमंत्री ने इस परियोजना को जारी रखने पर स्थानीय ठीकेदारों के दबाव में दबाव बनाया,फिर जब भगवा ब्रिगेड (साधू-सन्तों सहित लाल कृष्ण आडवानी)ने जब उन पर दबाव बढ़ाया तो उसी निंशक ने इस योजना को बन्द करने की बात कहने लगे.अब जब केन्द्र सरकार ने यू टर्न लेकर इस योजना को बन्द कर दिया है तो मुख्यमंत्री निंशक भी अपनी शर्तो के साथ इस फैसले का स्वागत करने में जुट गये है.उन्होने भारत सरकार के फैसले का स्वागत करते हुए प्रधानमंत्री से राज्य को दो हजार मेगावाट बिजली उपलब्ध कराने की मांग की है.
लोहारीनागपाला प्रोजेक्ट के निरस्त होने से पाला मनेरी और भैरवघाटी परियोजना पर भी तलवार लटकती लोगों को नजर आने लगी है.इस प्रकरण् पर अभी पहाड़ में भाजपा एंव कांग्रेस में आपस में ही तलवार निकल आई है दोनों दल एक बार फिर आमने-सामने हो
गये है.सूबे के पर्यावरण विशेषज्ञों की इस निर्णय से जहां बाछे खिल उठी है वही सरकार के इस निर्णय से ऊर्जा विशेषज्ञ हैरत में हैं.राज्य के विकास पसंद लोग गंगा के शर्त पर विकास की गंगा को रोकना पसंद नही कर रहे है उनका स्पष्ट कहना है कि उत्तराखण्ड को ऊर्जा विहिन प्रदेश बनाने का कुचक बुन रहे है राजनेता,जिससे जनता को भी सावधान किया जा रहा है.इस फैसले से पद्यमश्री अवधेश कोशल जी जो एक अच्छे सामाजिक कार्यकर्ता भी है कहते है कि यह ठीक नही हुआ,केन्द्र सरकार को अब टिहरी डैम को भी ध्वस्त कर देना चाहिए,गंगा की अविरल धारा कायम रहे.क्योंकि अब
सियासी दलों को अब संतों व महन्तों के ही बोट चाहिए आम जनता के दुखःदर्द से उनका लेना देना नही है.राज्य के ऊर्जा निगम के पूर्व सीएमडी एसपीएस राघव इस फैसले से हैरत में है और कहते है कि केन्द्र के इस निर्णय से राज्य की दो बड़ी परियोजनाओं का भी भविष्य खतरे में पड़ता दिख रहा है.जाहिर है कि यह उत्तराखण्ड को बिजली विहीन राज्य बनाने का कुचक्र है.लेकिन हैरत यह है कि सूबे की जनता आखिर क्यों चुप बैठी है ?इतना ही नही कांग्रेस के मुखर सांसद सतपाल महाराज इस परियोजना को निरस्त करने को दुर्भाग्य बताने से नही चुक रहे है.कुल मिला कर अगर यह कहा जाय की देवभूमि में गंगा को बचाने का काम दोयम दर्ज पर हो रहा है,गंगा पर राजनीति की रोटी सेकने का काम अब औव्वल हो गया है.
हरिद्वार के संत सरकार के इस फैसले के बाद आगे की लड़ाई लड़ने का मन बना रहे है.लोहारीनाग पाला जल विद्युत परियोजना को रद्द किये जाने से ही संत संतुष्ट नही है.अखिल भारतीय साधु समाजअ.भा.सन्त समिति,अखाड़ा परिषद,गंगा महा सभा सहित अनेक संगठन ने सरकार के इस फैसले का तहे दिल से स्वागत किया है,और कहा हैकि गंगा के अस्तित्व के साथ खिलवाड़ करने नही दिया जायेगा.उनका मानना है कि उत्तराण्ड के हिमालय के पर्यावरण को प्रभावित करने वाली कोई परियोजना स्वीकार नही होगी.इन संतो ंके मन में प्रो जीडी अग्रवाल के आंदोलन के प्रति पर्याप्त आदर है.उनका मानना है कि प्रो. अग्रवाल ने गंाधीवादी आंदोलन का जो राह दिखया उसे सदैव याद किया जायेगा.इस पुरे प्रकरण में गांधी का सत्याग्रह का हथियार जिसे प्रो. अग्रवाल ने साधा उसमें दम है,इसी कारण उनके प्रयास की चारों ओर सराहना हो रही है.(साथ में -अनिल कुमार ) फोटो-रामेश्वर गौड