नवनीश कुमार
सहारनपुर सर्वोच्च न्यायालय, केंद्र सरकार व प्रदेश सरकार के भूजल स्तर को बनाए रखने के लिए वन, तालाब , पोखर, जलप्रणालियां आदि को उनके प्राकृतिक स्वरूप में लाने के आदेश प्रशासनिक भ्रष्टाचार व हीलाहवाली के चलते जमीन पर कारगर होते नहीं दिख रहे है। ऐसा भी नहीं है कि सरकार इस मद में पैसा नहीं खर्च कर रही है। महात्मा गांधी राष्ट्रिय रोजगार गारंटी योजना में पहली प्राथमिकता भूजल को बचाए रखने की है साथ ही आदर्श जलाशय योजना से तालों के सौंदर्यकरण तक की योजनाएं तो चली और अरों रूपये खर्च भी हुए लेकिन तालों पर किये गये अवैध कजें आज भी इन योजनाओं का सीधा-सीधा मुंह चिढा रहे है। जिन तालों पर अरबों रूपयें बहाकर खुदाई के दावे किये जा रहे है, उनमें ज्यादातर वो ही तालाब शामिल है जो पहले से ही गांववालों के प्रयासों से ही जलमग्न थे। इन तालों से ही थोडी ाहुत मिट्टी निकालकर सरकारी धन की बंदरबांट की गई है। प्रशासन ने अलहैदा से जो तालाब खुदवाये है तो उनमें न कल पानी था और न आज पानी है। कारण साफ है कि उन नवनिर्मित्त तालों में बरसात का पानी आने का रास्ता ही नहीं है। आने वाली पीढियों के पानी के संकट को देखते हुए न्यायालय से लेकर सरकारें तक जल स्रोतों को जिंदा रखने के लिए और अपने प्राकृतिक स्वरूप को खो चुके तालों को पुन: अपने स्वरूप में लाने के आदेश है। सूचना के अधिकार अधिनियम में सहारनपुर तहसील के 2 विकास खंडों में वन, तालाब , पोखर, जलप्रणालियां आदि पर अवैध कजों की बाबत प्रशासन ने जो जानकारी मुहैय्या कराई है वो आंखें खोलने वाली है। 2 विकास खंडों के करीब 200 गांवों में ही अवैध कजाधारकों की संख्या हजारों में है और सरकारी रिकार्डो से प्राप्त सूचना के अनुसार इन्होंने हजारों हेक्टेयर भूमि पर अवैध कब्जा कर रखा है। प्रशासन ने इन लोगों को चिन्हित तो कर लिया लेकिन कार्रवाई के नाम पर एकाध को छोड ज्यादातर कब्जे तहसील कर्मियों की अवैध कमाई का धंधा बन गये है। यहीं नहीं, तालों में बनाए गये सरकारी भवनों जैसे प्रशासनिक कब्जे तक भी नहीं हटाये गये है। तालों का प्राकृतिक स्वरूप लौटाने की बात तो दीगर रही, सहारनपुर में तो तालों की नवैय्यत तक बदलने के कई मामले सामने आ चुके है जिनमें प्रशासनिक मिलीभगत से कालोनियां व अवैध निर्माण धडल्ले से किये जा रहे है। कुछ मामलों में तो आसामी पट्टेधारक जिसे अस्थाई जीविका के लिए पट्टा किया जाता है, शहर के बीचोबीच स्थित ऐसे तालों तक पर कालोनियां काटी जा रही है। ये तो बानगी है। चकांदी अधिकारियों ने तो यमुना व हिंडन जैसी सदानीरा नदियों तक को बेच दिया है। हॉल ही में हरियाण व उत्तरप्रदेश की ख्मुना से लगी सीमा से सटे गांव ढिक्काकलां में चकांदी अफसरों द्वारा यमुना की सैकडों बीघा जमीन को लोगों के नाम दर्ज करने का खुलासा हुआ है। हिंडन व ढमोला नदी तो पूर्णतया नालों में तदील कर दी गई है। प्रशासन ने भले ही सरकार या न्यायालय को अपनी कागजी प्रगति रिपोर्ट व तालों के जीर्णोद्वार के शपथ पत्र प्रस्तुत कर दिये हो लेकिन न्यायालय की भावी पीढी के लिए पानी की चिंता में प्रशासन ही रोडा है।