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अरुण कुमार त्रिपाठी

डा ब्रह्मदेव शर्मा का निधन ऐसे समय में हुआ है जब देश की सत्ता पर हिंदुत्ववादी कारपोरेट ताकतें काबिज हैं. उनकी बातें जरूर गरीबों का नाम लेकर शुरू होती हैं लेकिन उनका काम ऊंची पूंजी और उच्चवर्ण के ही हित में होता है. ऐसे समय में दलितों और आदिवासियों के एक हितैषी ही नहीं उनके लिए एक क्रांतिदर्शी का जाना देश के तमाम जनांदोलनों के और कमजोर होने की घटना के रूप में ही देखा जाएगा. डा शर्मा विव्दानों के बीच विव्दान थे, अफसरों के बीच अफसर थे, आंदोलनकारियों के बीच आंदोलनकारी और आदिवासियों और दलितों के बीच उनके परिवार के सदस्य थे. कई बार उनकी यही छवि उनके लिए परेशानी का सबब बनती थी और अफसर उन्हें क्रांतिकारी मानकर उनसे दूर भागते थे, क्रांतिकारी उन्हें अफसर समझ कर और आदिवासी उन्हें कथित सभ्य समाज का हिस्सा मानकर. लेकिन इसी विडंबना को ईमानदारी और प्रतिबद्धता से डा शर्मा ने अपनी ताकत बनाई थी और मार्क्सवादी अर्थों में जिसे डिक्लास होना या वर्गावतरण कहा जाता है वह उनके जीवन शैली में देखा जा सकता था. बल्कि जीवन के आखिरी दिनों में किसानों की आत्महत्याओं और आदिवासियों क्षेत्रों में माओवाद के बढ़ते असर को देखकर वे कहने लगे थे कि काश युवा होता ते बंदूक उठा लेता. लेकिन वे दिल्ली के तमाम मीडिया प्रेमी समाजसेवियों की तरह से अपने संपर्कों का दावा नहीं करते थे. तभी उन्होंने स्वामी अग्निवेश के उस कार्यक्रम में कोई रुचि नहीं दिखाई थी जिसमें माओवादियों और सरकार के बीच संवाद कराने का प्रयास था. बल्कि जब इस पत्रकार के सामने स्वामी जी का फोन आया तो उन्होंने उनकी बात को हल्के में ही लिया था. नतीजा सामने था कि कई प्रमुख नक्सली नेता और उनके सहानुभूति रखने वाले पत्रकार मारे गए और स्वामी जी का अभियान आखिरकार सरकार के पाले में सिमट गया. लेकिन जब बस्तर के कलेक्टर  पाल अलेक्स मेनन का अपहरण हुआ तो सरकार को डा शर्मा की अहमियत समझ में आई और बयासी साल के डा शर्मा अपने बस्तर में किए गए अपने काम के असर के कारण मेनन को छुड़ा कर लाए. लेकिन बाद में वे कहने लगे कि सरकार ने निर्मला बुच के माध्यम से जो वादा किया था उसे पूरा नहीं किया. देश के आदिवासी इलाकों में बढ़ते नक्सलवाद के बारे में ब्रह्मदेव शर्मा का कहना था कि वहां तो सरकार और आदिवासियों के बीच युद्ध चल रहा है. अगर हमें किसी समस्या का समाधान करना है तो पहले युद्धविराम तो होना चाहिए. 
आधुनिक विकास और अनुसूचित जाति और जनजाति के समाजों की स्थिति के बारे में उनके विचार एससी एसटी आयुक्त के तौर पर 1987-89 में आई उन्नतीसवीं रपट में जिन सूत्र वाक्यों में व्यक्त किए गए उन्होंने व्यवस्था के चरित्र को उजागर कर दिया था. उन्होंने लिखा था---इस तरह हमारे देश में दोहरी नहीं तिहरी व्यवस्था कायम होती जा रही है. –इंडिया, भारत और हिंदुस्तनवां. अधिकतर अनुसूचित जाति और जनजाति के सदस्य इसी हिंदुस्तनवां की आखिरी मंजिल में शामिल हैं. इस स्थिति का कारण बताते हुए वे कहते हैं कि दो बुनियादी बातें हैं—हमारे कानूनी ढांचे की बुनावट और विकास की हमारी अवधारणा. विकास की अवधारणा में हमने एक तो पश्चिमी देशों के विकास को आदर्श मान लिया है. विकास की हड़बड़ी में विकास पहले की पेशकश मानकर सामाजिक न्याय को पीछे जगह दे दी है...........इस सोच में इस ओर ध्यान ही नहीं दिया गया कि पहली और दूसरी दुनिया के विकास के लिए तीसरी दुनिया का कूड़ेदान बनना जरूरी था. उसी सिलसिले में तीसरी दुनिया के लिए चौथी दुनिया का कूड़ेदान चाहिए. आज हमारे देश में हिंदुस्तनवा वही कूड़ेदान बन गया है.
कुर्ता धोती पहन कर एक किसान की तरह रहने वाले डा ब्रह्मदेव शर्मा ने जहां अपने प्रशासनिक करियर के दौरान यह साबित किया कि एक अधिकारी संविधान और कानून का रक्षक ही नहीं उसे समाज के वंचित तबके के हित में लागू करने वाला कार्यकर्ता है वहीं वैसा पाने में असमर्थ रहने में उसे व्यवस्था से बाहर होकर चुनौती देने में भी कोई गुरेज नहीं करना चाहिए. उन्होंने बैलाडीला जैसी महत्त्वाकांक्षी परियोजनाओं का आदिवासी हितों के आधार पर विरोध किया. अपनी 29 वीं रपट में नर्मदा आंदोलन के समर्थन में लंबी रपट दी और संवैधानिक सीमाओं के भीतर उसको भरपूर मदद दी. विश्व बैंक के मोर्स बर्गर नाम के जिन अधिकारियों की रपट के आधार पर बैंक ने परियोजना से हाथ खींचे उनके पीछे डा शर्मा का ही अध्ययन और चिंतन था. उनकी पुस्तकों और पुस्तिकाओं की संख्या अनगिनत है. जिनमें-- वेब आफ पावर्टी, गणित की सैर उनके महत्त्वपूर्ण ग्रंथ हैं. किसान की गरीबी का राज बताते हुए वे लगातार कहते थे कि आजादी के सड़सठ सालों में देश के छह लाख गांवों से छह लाख करोड़ रुपए छन कर शहरों को गया है. अगर गांव की गरीबी मिटानी है तो वह धन वापस आना चाहिए. इसके अलावा उनका कहना था कि किसानी का मोल कुशल कारीगरी से कम नहीं होना चाहिए. वे लगातार आदिवासी स्वशासन और स्वायत्तता की पैरवी की और इसी सिलसिले में-- मावा नाटे मावा सरकार का नारा भी दिया. उनका मानना था कि भारतीय संविधान लागू होने से आदिवासी स्वायत्तता छिन गई है और उसकी बहाली के उपाय के तौर पर उन्होंने पेसा एक्ट 1996(पंचायत एक्सटेंशन टू शिड्यूल्ड एरिया एक्ट)तैयार करवाया जिससे आदिवासियों की परंपरागत पंचायतों को अधिकार मिले. आदिवासी इलाकों में रोजगार के लिए डा शर्मा ने झंडा हाजिरी कार्यक्रम चलवाए और इस तरह प्रशासन का ध्यान बेरोजगारी और रोजगार योजनाओं के क्रियान्वयन की ओर खींचा.
बस्तर में कलेक्टरी के दौरान उन्होंने उन तमाम अफसरों को बेनकाब कर दिया था जो वहां आदिवासी औरतो का शोषण कर रहे थे. उन्होंने पंचायत बुलाकर उनकी शादियां करवा दीं और उनके पास सुधरने या भागने के अलावा कोई उपाय नहीं बचा. उनके पास आदिवासी समाज की सैकड़ों कहानियां और चुटकुले थे. वे अक्षर ज्ञान से रहित आदिवासियों को सिखाते थे कि जब कोई सरकारी कर्मचारी तुम्हारी जमीन पर कब्जा करने के लिए कागज दिखाए तो उससे कहो कि कागज तुम अपने पास रखो---कागज तुम्हारा जमीन हमारी.उन्हें अपने जनसमर्थक विकास और धर्मनिरपेक्ष विचारों के लिए संघियों का भी शिकार होना पड़ा और एक बार रायपुर में उनका मुंह काला करके उन्हें बाजार में घुमाया भी गया. फिर भी वे आजीवन सांप्रदायिक विचारों और शोषण करने वाली विकास नीति को चुनौती देते रहे. बल्कि उनका कहना था कि अगर फैजाबाद का कलेक्टर अड़ गया होता तो उसके पास इतनी ताकत होती है कि राज्य सरकार भी बाबरी मस्जिद नहीं गिरवा सकती थी. डा शर्मा आधुनिक युग के वेरियर एल्विन थे जिन्होंने उस अंग्रेज नृतत्वशास्त्री से अलग आदिवासियों के सवाल को सामाजिक और आर्थिक विश्लेषण के आधार पर देश के विमर्श के केंद्र में रखा. अगर एल्विन ने कांग्रेस को ठक्कर बापा जैसे आदिवासी सेवकों को खड़ा करने पर मजबूर किया तो ब्रह्मदेव शर्मा ने मेधा पाटकर जैसा आंदोलनकारी पैदा किया. 
अद्भुत स्मरण शक्ति के धनी डा शर्मा बाद के दिनों में स्मृतिभ्रंश(अलजाइमर) के शिकार हो गए थे. पिछले साल जब उनके 85 वें जन्मदिवस पर डा सुनीलम, डा अरुण और उनके परिवार और तमाम समाजिक कार्यकर्ताओं के साथ हम लोग ग्वालियर में जमा हुए तो वे किसी को पहचान नहीं पा रहे थे. यह देखकर बड़ा दुख हुआ कि गणित के विव्दान डा शर्मा जिन्होंने अपने प्रशासनिक करियर में कभी नोट्स नहीं लिए वे अपनी बहुएं, बेटों और नजदीकी सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी पहचान नहीं पा रहे थे. लेकिन वह डा शर्मा के शरीर में उत्पन्न हुई उस चेतना का लोप होना था जो उनके त्यागपूर्ण आदर्श जीवन और विचारों के माध्यम सेसमाज में पहले ही फैल चुकी है. डा ब्रह्मदेव शर्मा का शरीर भले हमारे बीच से चला गया हो लेकिन उनके विचारों की ज्वाला हिंदुस्तनवा (इस समाज के वंचितों) के लिए क्रांति की एक मशाल है जो इस समाज को हमेशा रोशनी देती रहेगी. शुक्रवार से साभार 
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