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पश्चिम में लोकदल ने बिगाड़ा खेल

वंदना शर्मा

मेरठ.पश्चिमी राष्ट्रीय लोकदल भाजपा का खेल बिगाड़ रहा है .जाट बहुल पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव में भाजपा को जाट बिरादरी का भारी समर्थन मिला था .पर इस बार माहौल बदल रहा है .जाट अब फिर चौधरी अजित सिंह के साथ खड़े नजर आ रहे हैं .पश्चिमी  उत्तर प्रदेश में जहां 11 फरवरी को मतदान होना है वहां अगर रालोद कई सीटें नहीं भी जीत पाता है तो भी काफी कुछ उसके प्रदर्शन पर निर्भर करेगा. अगर वह अपने पारंपरिक मतदाताओं जाटों के अहम वोट हासिल करने में कामयाब रहा तो इसका परिणाम पर बड़ा असर होगा. गौरतलब है कि 2014 के आम चुनाव में जाटों ने भाजपा को खुलकर समर्थन दिया था. इस बार समाजवादी पार्टी -कांग्रेस गठबंधन और बसपा के साथ राष्ट्रीय लोकदल भाजपा को कडी चुनौती दे रहा है .गठबंधन को भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फायदा होने की उम्मीद है .मेरठ में राहुल गांधी और अखिलेश यादव की रैली के बाद से माहौल और बदला है . 
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि रालोद इस चुनाव में वोट कटवा की भूमिका में रहेगी. पार्टी ने कैराना और पीलीभीत समेत 300 से अधिक प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारे हैं. इसका नुकसान सीधे तौर पर भाजपा को होगा. पिछले चुनाव में पार्टी ने कांग्रेस के साथ गठजोड़ कर 46 प्रत्याशी उतारे थे जिनमें से नौ को जीत मिली थी लेकिन इस बार भाजपा के लिए बहुत कुछ दांव पर लगा है. इसलिए क्योंकि खासतौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रालोद के पक्ष में भीतर ही भीतर माहौल बना है. हालांकि ऐसा सभी सीटों पर नहीं है.इस क्षेत्र के किसानों से बात करने पर पता चलता है कि उनका भाजपा से मोहभंग हुआ है. चपरौली के रहने वाले ओमवीर कहते हैं, 'किसानों के साथ ठीक नहीं किया भाजपा ने. किसान लाइन में लगे, शादी में खर्च नहीं कर पाये, कई बच्चों के तो दाखिले तक नहीं हुए.'
अन्य लोग भी बताते हैं कि फसल की कम कीमत, वादाखिलाफी और किसान विरोधी कदम पार्टी पर भारी पड़ सकते हैं. एक अन्य किसान कहते हैं कि कई खेतों में बुवाई नहीं हो सकी क्योंकि नोटबंदी ने विवश कर दिया. 
नोटबंदी तो हालिया मामला है लेकिन हरियाणा से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक जाट भाजपा से इसलिए नाराज हैं क्योंकि पार्टी ने उनकी सरकारी नौकरी में आरक्षण की मांग पर ध्यान नहीं दिया. उनको लगता है कि संप्रग के कार्यकाल में अजित सिंह ने इस दिशा में जो भी कदम उठाये थे भाजपा ने उनको भी नाकाम कर दिया. अजित सिंह को दिल्ली स्थित उनके आवास में उनके पिता और पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह का स्मारक नहीं बनाने देने और राजग सरकार द्वारा बिजली पानी काटकर उनको लगभग घर से निकाले जाने ने भी क्षेत्र के जनमानस पर बुरा असर डाला है.अजित सिंह के नेतृत्त्व में रालोद का पलटी मारना भी इतिहास रहा है. इसके लिए वजह यह बतायी गयी है कि किसानों को सत्ता में बनाये रखना है. इस बार भी इस गन्ना बेल्ट के किसानों का मानना है कि चुनाव के बाद रालोद सपा-कांग्रेस गठबंधन में शामिल होगी.
पांच दशक पहले चरण सिंह ने कांग्रेस का हाथ थामा और प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. अब देखना होगा कि वर्ष 2017 में उनके बेटे इस विरासत को कैसे आगे बढ़ाते हैं? मथुरा के पूर्व सांसद और अजित सिंह के बेटे जयंत चौधरी कहते हैं, 'राजनीति बहुत जीवंत होती है. उत्तर प्रदेश में बदलाव होने वाला है. राजनीतिक परिदृश्य हमेशा एक से नहीं रहते.विरासत का प्रश्न हमेशा उलझाऊ होता है. मेरा आकलन चौधरी चरण सिंह के उच्च मानकों पर नहीं होगा. मेरा काम करने और सोचने का तरीका अलग है. परंतु मेरी एक जिम्मेदारी है. मैं उसे लेकर प्रतिबद्ध हूं और लगातार काम कर रहा हूं.यही वजह है कि मैं यहां हूं.'प्रदेश में चुनाव सर्वेक्षकों और विश्लेषकों के अनुमान रोज बदल रहे हैं लेकिन यह स्पष्ट है कि राज्य में राजनीतिक भाग्य तस्वीर जल्दबाजी में बदल सकती है. रालोद अपनी जमीन पुख्ता करना चाह रहा है. जयंत कहते हैं कि उनका लक्ष्य एक चुनाव जीतना और कुछ विधायक पाना नहीं बल्कि उससे कहीं अधिक बड़ा है.
 
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