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क्या भाजपा चुनाव हारना चाहती है
राजकाज 
संघ और भाजपा ने तो इस बार  सचमुच  कमाल कर दिखाया. टिकट वितरण में माल काटने में बहनजी की बसपा को भी पीछे छोड़ दिया. चर्चा है कि औसतन हर टिकट 75 लाख से एक करोड़ रुपये के बीच बिका. पार्टी का शुरू से दावा आ रहा है कि नोटबंदी के कारण किसी को किसी तरह की कोई समस्या नहीं रही. शायद इस वजह से टिकट के नकद खरीदारों की भरमार रही हो. पार्टी ने टिकट वितरण करते समय पुराने नेताओं, कार्यकर्ताओं की जमकर अनदेखी की और परिणाम स्वरूप उत्तर प्रदेश से लेकर उत्तराखंड तक में भारी तादाद में बागी उम्मीदवार मैदान में उतर आये हैं. बताते हैं कि संघ ने पार्टी को आगाह कर दिया है कि इसका असर चुनाव पर पड़ सकता है. मोदी भले ही आंधी की बात कर रहे हों पर पैर पार्टी के ही उखड़ रहे हैं. इसलिए सोशल मीडिया पर एक नया खेल शुरू हो गया है. अब यह थ्योरी बेची जा रही है कि पार्टी खुद उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव नहीं जीतना चाहती है इसलिए उसने टिकट वितरण पर ज्यादा ध्यान ही नहीं दिया. दलील दी जा रही है कि दो साल बाद लोकसभा चुनाव के साथ ही बाकी कई राज्यों में चुनाव होंगे. मोदी सरकार इसकी तैयार कर रही है. राष्ट्रपति के अभिभाषण में भी यह स्पष्ट कर दिया गया है. चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट  भी इसके पक्ष में है.  इसलिए अगर अभी राज्य में भाजपा की सरकार बनी तो दो साल बाद उसे सत्ता विरोधी माहौल का सामना करना पड़ेगा. केंद्र सरकार, सांसदों, राज्य सरकार व विधायकों के खिलाफ माहौल बनेगा. इसका भाजपा को नुकसान उठाना पड़ेगा. जबकि अभी अगर किसी और दल को सरकार बनती है तो 2019 में विधानसभा और लोकसभा के चुनाव साथ होने से भाजपा को इसका फायदा मिलेगा. भाजपा का मानना है कि इस बार सपा की सरकार बनने जा रही है. उसका डर दिख रहा है. सपा और  कांग्रेस मुस्लिम वोट को पूरी तरह अपने साथ कर लेंगे और बसपा हाशिये पर आ जायेगी. इससे अगले लोकसभा चुनाव में उसका दलित वोट भाजपा को मिल जायेगा.
  
अबकी बार त्रिशंकु विधानसभा?
पंजाब और गोवा के विधानसभा चुनावों में हुए मतदान के बाद सट्टा बाजार किसी भी एक पार्टी की सरकार बनती नहीं देख रहा. दोनों ही  राज्यों में जबरदस्त मतदान हुआ है. पंजाब में 78 और गोवा में 84 फीसदी मतदान होने का यह अर्थ माना जा रहा है कि वहां किसी एक पार्टी को बहुमत मिलेगा मगर सट्टा बाजार का कुछ और ही मानना है. सट्टा बाजार की मानें तो इन दोनों राज्यों के अलावा उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और मणिपुर में भी त्रिशंकु विधानसभा बनेगी. हालांकि पिछले कुछ समय से विधानसभा चुनावों को लेकर लोकसभा तक में स्पष्ट बहुमत मिलता आया है. खुद उत्तर प्रदेश में पिछले दो विधानसभा चुनावों में बसपा व सपा को स्पष्ट बहुमत मिला था. दिल्ली के सट्टा बाजार के मुताबिक उत्तर प्रदेश में सपा कांग्रेस गठबंधन को 172 से 174 सीटे मिलने की संभावना है. पंजाब के बारे में सट्टा बाजार का मानना है कि वहां आप 54 से 56 सीटें हासिल कर सबसे बड़े दल के रूप में उभर सकती हैं. गोवा के बारे में सट्टा बाजार का आकलन है कि वहां भाजपा सबसे बड़े दल के रूप् में उभरेगी. मगर उसे बहुमत हासिल नहीं होगा. वहीं आप महाराष्ट्र वादी गोमांतक पार्टी, कांग्रेस ने उसके लिए दिक्कते पैदा की हैं.  उत्तराखंड में भाजपा के अंदर जबरदस्त मार चल रही है. उसे कांग्रेस के बाद अपने ही असंतुष्टों का सामना करना पड़ रहा है. मणिपुर में भी कोई एक दल अपने बलबूते पर सरकार नहीं बना पायेगा.
 
 
 
पंजाब में भी केजरीवाल सरकार?
पिछले कुछ समय से दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया काफी चर्चा में है. वे हर मोर्चे पर आगे नजर आ रहे हैं. बताते हैं कि खुद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल उन्हें दिल्ली के अगले मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट कर रहे हैं. पंजाब को लेकर वे बहुत आशान्वित हैं और उन्हें लग रहा है कि राज्य में उनकी पार्टी की सरकार बनने वाली है. ऐसे में वे खुद वहां की कमान संभालना चाहते हैं. खासतौर से उन्हें मालवा इलाके से बहुत उम्मीद है जहां जबरदस्त मतदान हुआ है.  इसलिए वे सात तारीख को बेंगलुरू चले गये जहां वे 22 फरवरी तक विपश्यना शिविर में हिस्सा लेंगे.  माना जा रहा है कि इतनी लंबी अवधि तक बाहर रहने की वजह यह है कि वे चाहते हैं कि इस दौरान मनीष सिसौदिया दिल्ली का प्रभार पूरी तरह से संभाल लें. पंजाब की कमान संभालने के पहले वे पूरी तरह से स्वस्थ्य होना चाहते हैं. मालूम हो कि आप ने पंजाब के किसी को मुख्यमंत्री के रूप में पेश नहीं किया था. अगर आप जीती तो केजरीवाल वहां के पहले गैर सिख मुख्यमंत्री बनेंगे.
 
 
कांग्रेस भरोसे भाजपा
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में गठबंधन सपा और कांग्रेस के बीच हुआ है पर कांग्रेस का भला भाजपा सोच रही है. भाजपा नेता चाहते थे कि अखिलेश यादव कांग्रेस को ज्यादा सीटें दे. उनका माना है कि यादव मतदाता कांग्रेस को वोट नहीं देंगे. जहां कांग्रेस लड़ेगी वहां के यादव मतदाताओं का रूख उनकी (भाजपा ) की ओर हो सकता है. यह दलील दी जा रही है कि पिछली बार लोकसभा चुनाव में भी बड़ी तादाद में यादवों ने नरेंद्र मोदी को वोट दिया था. कांग्रेस ने बहुत कम यादव उम्मीदवारों को टिकट दिया है. कांग्रेस का सारा फोकस सवर्ण और मुसलमानों पर है. उसने 15 ब्राहमण 14 ठाकुर और 19 मुसलमान उम्मीदवार  उतारे हैं. अगर इसमें सुरक्षित सीटों को भी शामिल कर दें तो आंकड़ा 70 के ऊपर चला जायेगा. भाजपा का मानना है कि इस चुनाव में यादव राजनीतिक वोट करेंगे. यहां यह याद दिलाना जरूरी हो जाता है कि गत विधानसभा चुनाव में भी भाजपा को कुछ ऐसा ही लगा था तब अमित शाह ने कहा था कि कांग्रेस की सीटें भाजपा की झोली में आ गयी हैं मगर कांग्रेस इसमें से 27 सीटें जीत गयी. अब उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को 105 सीटें मिलने के बाद भाजपा काफी परेशान है. इसलिए अमित शाह सपा के अलावा कांग्रेस को भष्ट्राचार के मुद्दे पर अलग निशान बना रहे हैं.
 
गुजरात बना चुनौती
विधानसभा चुनावों के नतीजे चाहे कुछ हों पर गुजरात में मोदी के लिए दिक्कतें बढ़ने वाली हैं. जहां एक ओर महाराष्ट्र में गठबंधन की सहयोगी शिवसेना ने गुजरात विधानसभा चुनाव में हार्दिक पटेल को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर दिया है वहीं गोवा और पंजाब के बाद यह राज्य आप पार्टी के रडार पर आ गया है. हाल ही में आप की एक अहम बैठक में गुजरात चुनाव को लेकर रणनीति बनायी गयी. पार्टी इस साल के अंत में होने वाले हिमाचल और गुजरात दोनों ही विधानसभा चुनावों में उतारने का मन बना चुकी है. पार्टी का मानना है कि गुजरात और हिमाचल के हालात ठीक दिल्ली जैसे हैं वहां कांग्रेस और भाजपा के अलावा कोई तीसरी पार्टी नहीं है. उन्हें इसका पूरा लाभ मिलेगा. पंजाब के नतीजे, पड़ोसी राज्य हिमाचल को भी प्रभावित करेंगे. पार्टी नेताओं का मानना है कि लगातार दो दशकों से राज्य में और अब केंद्र में भाजपा की सरकार होने के कारण वहां जबरदस्त सत्ता विरोधी माहौल है. मोदी को चुनौती देने के लिए वे पाटीदार आंदोलन के हार्दिक पटेल को भी साथ लेने की कोशिश कर रहे हैं.
अपने पांव आप कुल्हाड़ी!
सपा ने लखनऊ कैंट से मुलायम सिंह की छोटी बहू अपर्णा यादव को उतारा है. पर अंदाज ऐसा है जैसे किसी डिग्री कालेज का चुनाव लड़ रही हों .चुनाव आयोग को जो हलफनामा दिया है उसके मुताबिक सबसे ज्यादा पैसा अपर्णा यादव के पास है, पर चुनाव में वह दिख नहीं रहा. इस वजह से प्रचार पर भी असर पड़ रहा है. आलमबाग की कार्यकर्त्ता जो कुछ दिन प्रचार में जुटी थीं प्रचार के बाद थक कर चूर हो जाने के बाद अगर चाय भी न मिले तो क्या करतीं मजबूरन समाजवादी पार्टी के दूसरे उम्मीदवार अनुराग यादव के साथ चली गयीं. राजनीति और कार्यकर्त्ता संस्कृति से अंजान अपर्णा यादव आरक्षण को लेकर अपनी टिपण्णी से वैसे भी पार्टी को सांसत में डाल चुकी हैं. अब कार्यकर्त्ता भी उसी तरह के जो विपक्षी उम्मीदवार के लिए कुछ भी कह दें. अगर पार्टी उनके चुनाव को लेकर गंभीर नहीं हुई तो अपर्णा खुद ही अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगी .
प्रस्तुति-विवेक सक्सेना 
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