ताजा खबर
राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बने अब सबकी निगाह राहुल गांधी पर कैसे पार हो अस्सी पार वालों का जीवन कश्मीर में सीएम बना नहीं पाया तो कहां बनाएगा ?
किसकी मदद कर रहें हैं अमर सिंह

 विवेक सक्सेना 

उत्तर और दक्षिण भारत की राजनीति में जहां तमाम समानताएं हैं वहीं कुछ खास अंतर भी है। दक्षिण भारत में लगभग हर अहम दल का अपना चैनल है जिसके जरिए वह प्रदेश में अपनी राजनीति चमकाता है। तमिलनाडू में अन्नाद्रमुक का जया चैनल है तो द्रमुक का प्रचार प्रसार ‘सन’ टीवी के जरिए होता आया। आंध्रप्रदेश में राज शेखर रेड्डी का ‘साक्षी’ चैनल उनकी काफी मदद करता आया था। मगर उत्तर भारत में ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है। शायद यही वजह है कि भाजपा और कांग्रेस सरीखे राष्ट्रीय दलों ने भी कभी अपना चैनल शुरु करने की बात नहीं सोची। हालांकि इस बारे में एक नेता का कहना है कि जब मदर डेयरी का दूध उपलब्ध हो तो भैंस पालने की क्या जरुरत है। जब दूध पीना हो तो मदर डेयरी के बूथ पर जाओ सिक्का डालो और ताजे स्वादिष्ट दूध का मजा लो जो कि सेहत के लिए किसी भी दृष्टि से हानिकारक नहीं हेाता है।
 
कुछ दल सत्ता में रहने पर पैसे लेकर टोकन हासिल करते हैं तो कुछ इन चैनलों के मालिकों, पत्रकारों को सरकारी सम्मान से उपकृत करते हैं। नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद तो तमाम चैनलों में यह होड़ लग गई है कि कौन उन्हें सबसे ज्यादा खुश करता है। पहले टाइम्स नाउ पर अकेले अरनब गोस्वामी हुआ करते थे जो कि सत्तारुढ़ दल की पैरवी करते थे मगर अब हिंदी के चैनल एक दूसरे को पछाड़ने पर आमादा है। उनकी चापलूसी और चंपूगीरी की कोई लक्ष्मण रेखा न होने के कारण दूरदर्शन भी, केजरीवाल व हार्दिक पटेल की तरह अच्छा लगने लगा है। अक्सर यह लगता है कि इन भोंपू चैनलों की तुलना में दूरदर्शन कहीं ज्यादा सार्थक व संतुलित प्रस्तुति दे रहा है। अच्छा हुआ कि भाजपा ने अपना चैनल शुरु नहीं किया वरना उसको सबसे ज्यादा चुनौती इन्हीं सहयोगी चैनलों से मिलती जैसे आज शिवसेना जैसे संगठनों से उसे मिल रही है।
 
शनिवार की रात चैनल बदल रहा था तो पाया कि एक चैनल पर अमरसिंह बैठे हैं। उन पर मुकदमा चलाया जा रहा है। मैंने भी पत्रकारिता करते हुए यह सीखा है कि कैसे किसी नेता को बातों में लपेटा जाए। उससे मनवांछित बयान दिलवाया जाए मगर जो हुनर रजत शर्मा के अंदर है उसे देखते हुए तो लगता है कि उन्हें पद्मविभूषण देकर सरकार ने उनका अपमान किया है। उन्हें तो इस सरकार ने भारत रत्न देना चाहिए। वैसे अभी तीन साल बाकी है। कुछ भी हो सकता है।
 
अमर सिंह मुलजिम के कटघरे में बैठे थे। उनके बारे में अपना मानना है कि वे भारतीय राजनीति का ऐसा चीनी माल है जिसकी गारंटी दुकान के बाहर निकलते ही खत्म हो जाती है। वे कब किसी के पैर पकड़ ले और कब उसकी गर्दन जकड़ ले, कुछ कहा नहीं जा सकता है। वे देश के एकमात्र ऐसे नेता है जिन्हें खुद को दल्ला कहने पर गर्व महसूस होता है।
 
खैर अमर सिंह पर मुकदमा चलाया जा रहा था। वकील रजत शर्मा थे जो कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के सबसे करीबी व पसंदीदा पत्रकार हैं। मैं उनकी योग्यता व क्षमता पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहा हूं। उनका भी संघ का बैकग्राउंड रहा हैं। वे कालेज के दिनों में अरुण जेटली, सुधांशु मित्तल के साथी रह चुके हैं। अमेरिका में भारतीय राजदूत नवतेज सरना, स्टेटसमैन के संपादक रवींद्र कुमार उनके सहपाठी रहे हैं। उन्होंने खुद भी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के उम्मीदवार के रुप में दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ का चुनाव लड़ा। प्रभु चावला की तरह वे भी संघी पत्रकार माने जाते हैं। भाजपा के प्रति उनका लगाव व झुकाव होना स्वभाविक है।
 
उत्तर प्रदेश में मतदान के पहले दिन आपकी अदालत में अमर सिंह को पेश किया गया। जब हर तरफ से यह खबरें आ रही हो कि मुलायम सिंह यादव के साथ हुए टकराव के बाद अखिलेश का राजनीतिक ग्राफ बढ़ने लगा है व सपा-कांग्रेस गठबंधन की ओर लोग आकर्षित हो सकते हैं तो ऐसे में भाजपा की दिक्कतें बढ़ना स्वभाविक है। पत्रकारिता में आप किसी दल या नेता की दो तरह से मदद करते हैं। यह प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रुप में होती है। अगर आप प्रत्यक्ष रुप में किसी की मदद करना चाहते हैं तो सीधे उसकी प्रशंसा में कसीदे काढ़े जा सकते हैं। मगर ऐसे में खुद अपनी छवि खराब होने का खतरा बना रहता है क्योंकि इस तरह की रिपेार्टिंग विशुद्ध चंपूगीरी मान ली जाती है। मगर अप्रत्यक्ष मदद करके अपनी छवि बचाई जा सकती है। यह पत्रकारिता की पोंजी स्कीम होती है।
 
इसके तहत आप उस व्यक्ति की तारीफ करने की जगह उसके विरोधी को निशाना बनाते हैं। उसका चेहरा काला करते हैं। उसके कच्चे चिट्ठे निकालते हैं ताकि उसके मुकाबले में अपने नेता की छवि निखर उठे। अमर सिंह के जरिए भी ऐसा ही किया गया। सपा से बेइज्जत होकर निकाले गए इस रीढ़विहीन नेता ने अखिलेश, रामगोपाल यादव से लेकर मुलायमसिंह यादव तक को जम कर कोसा।उन्होने खुलासा किया कि बाप बेटे की लड़ाई सिर्फ नाटकबाजी थी। मैं तो पार्टी का चुनाव चिन्ह जब्त करवाना चाहता था मगर ऐन मौके पर नेताजी ने मुझे ऐसा करने से रोक लिया क्योंकि वे अखिलेश की मदद करना चाहते थे। अखिलेश ने भ्रष्ट अफसरों को प्रश्रय दे रखा है। यह वे अफसर हैं जो कि मायावती के शासनकाल में भी मौज करते थे। मुलायम सिंह को वानप्रस्थ में चले जाना चाहिए था। हां मैंने कहा था कि मैं मुलायमवादी हूं। मैं दल्ला हूं। मैंने अखिलेश यादव की पढ़ाई का प्रबंध किया। मैंने उनकी शादी करवाई। दोनों पति-पत्नी ने अपनी शादी की वर्षगांठ पर जब केक काटा तो जबरन मेरे मुंह में उसका टुकड़ा घुसेड़ दिया। वगैरह-वगैरह। अब मैं कुछ भी कहने को स्वतंत्र हूं। क्योंकि नेताजी ने मुझसे कहा कि अब तुम आजाद हो।
 
ध्यान रहे कि वे इससे पहले भी निकाले जाने पर नेताजी का कच्चा चिट्ठा खोलने की धमकी दे चुके थे मगर जब वापस सपा में लिए गए तो खुद को मुलायमवादी कहने लगे। उन्होंने मुसलमानों के प्रति सहानुभूति दिखाने के लिए मुलायमसिंह यादव का मजाक उड़ाया। हिंदुओं को चेताया कि यही मुलायम सिंह कहा करते कि मैंने मस्जिद की रक्षा करेन के लिए सरयू नदी का पानी खून से लाल कर दिया। अब वे मस्जिद गिरवाने के लिए जिम्मेदार कांग्रेस से हाथ मिला चुके हैं।
एक अच्छे वकील की तरह रजत शर्मा ने अमर सिंह के मुंह से वह सब कुछ निकलवाया जो कि भाजपा के हक में जाता था। सरकारी गवाह की तरह लगता था कि मुलायम सब रट कर आए थे। उन्होंने सुषमा स्वराज से लेकर लाल कृष्ण आडवाणी तक की तारीफ की। मोदी के गुण गाए। उस नोटबंदी को साहसिक कदम बताया जिसका उत्तरप्रदेश में जिक्र करने की हिम्मत खुद प्रधानमंत्री की भी नहीं हो रही है।
 
अमर सिंह द्वारा मोदी की तारीफ करना कुछ ऐसा ही लगा कि जैसे खानदानी शफाखाना का झोलाछाप वैद्य, एम्स के डायरेक्टर पद पर आवेदन करने वाले डाक्टर को अपना प्रमाण पत्र दे। फिर अपने एक मित्र की वह बात याद आ गई कि जब किसी भीड़-भाड़ वाले बाजार में किसी रिक्शेवाले से आपकी मर्सीडीज टकरा जाती है तो आप पान वाले को भाइसाहब कहकर संबोधित करते हुए उससे अपने निर्दोष होने का प्रमाण पत्र देने के लिए कहते है कि क्यों भाईसाहब, आपने तो देखा ही था कि मैं अपनी लाइन में ही चल रहा था। आपकी अदालत के जज राहुल देव थे जो कि अपने भी संपादक रह चुके हैं व संघ से उनका पुराना नाता रहा है। यह सब देखकर वो शेर याद आ गया कि ‘उसी का शहर, वही मुद्दई वही मुंसिफ, मुझे यकीन था मेरा कसूर निकलेगा।
email ईमेल करें Print प्रिंट संस्करण
  • कैसे पार हो अस्सी पार वालों का जीवन
  • अब सबकी निगाह राहुल गांधी पर
  • कश्मीर में सीएम बना नहीं पाया तो कहां बनाएगा ?
  • राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बने
  • गुजरात में एक नेता का उदय
  • डगर कठिन है इस बार भाजपा की
  • तिकड़ी से घिरे तो बदल गई भाषा !
  • रेपर्टवा के लिए तैयार हो रहा लखनऊ
  • यहां अवैध शराब ही आजीविका है
  • ये नए मिज़ाज का लखनऊ है
  • इस राख में अभी आग है !
  • जन आंदोलन का चेहरा हैं मेधा पाटकर
  • इंडियन एक्सप्रेस की स्टोरी में झोल !
  • शक के दायरे में फिर अमित शाह
  • जज की हत्या और मीडिया का मोतियाबिंद
  • साफ़ हवा के लिए बने कानून
  • नेहरू से कौन डरता है?
  • चालीस साल पुराना मुकदमा ,और गवाह स्वर्गवासी
  • चार दशक बाद समाजवादी चंचल फिर जेल में
  • भाजपा पर क्यों मेहरबान रहा ओमिडयार
  • ओमिडयार और जयंत सिन्हा का खेल बूझिए !
  • दांव पर लगा है मोदी का राजनैतिक भविष्य
  • कांग्रेस की चौकड़ी से भड़के कार्यकर्त्ता
  • माया मुलायम और अखिलेश भी तो सामने आएं
  • आदिवासियों के बीच एक दिन
  • Post your comments
    Copyright @ 2016 All Right Reserved By Janadesh
    Designed and Maintened by eMag Technologies Pvt. Ltd.