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माणिक सरकार का प्रतिबंधित भाषण 'जो अंग्रेजों का साथ दे रहे थे वे राष्ट्रवादी हो गए ' अखिलेश की गिरफ़्तारी , सड़क पर समाजवादी अडानी को लेकर ' द गॉर्डियन ' का धमाका !
उत्साहीलाल पुलिस का उत्साह!
शंभूनाथ शुक्ल
नई दिल्ली .राजनेता और ब्यूरोक्रेट में बुनियादी फर्क होता है कि राजनेता लचीला और सामाजिक संबंधों को गहराई से समझता-बूझता है जबकि एक ब्यूरोक्रेट बस लीक का फकीर होता है। अगर निर्वाचन आयोग का हेड किसी बुजुर्ग और रिटायर्ड राजनेता को बनाया जाने की परंपरा होती तो वह वह भूल कभी नहीं करता जो कि निर्वाचन आयोग ने अति उत्साह में आकर कर दी। दैनिक जागरण के एक वरिष्ठ पत्रकार की पहले गिरफ्तारी और फिर तत्काल रिहाई से कुछ सवाल खड़े हुए हैं। अब यह महसूस किया जाने लगा है कि निर्वाचन आयोग आचार संहिता के नाम पर कैसी-कैसी भूलें कर बैठता है। आचार संहिता के नाम पर ब्यूरोक्रेसी और पुलिस अचानक बेलगाम हो जाती है। उसे लगता है कि अब वह अपने दिमाग से काम करेगी। जिसको चाहा पकड़ा और जिसे चाहा रिहा किया, कोई पूछने-जाँचने वाला तो है नहीं। भले यह सुविधा महज डेढ़ महीने की हो पर इस डेढ़ महीने में तमाम ऐसी कुंठाएं निकाली जाती हैं जिन्हें आम दिनों में निकालने के पूर्व पुलिस या नौकरशाही दस बार सोचती। क्योंकि तब राजनेताओं का सीधा दखल प्रशासन पर होता है और राजनेता अपनी सनक से नहीं थोड़ा व्यवहार बुद्घि से काम करते हैं क्योंकि वे प्रशासन की तरह स्थायी कर्मचारी नहीं बल्कि पांच साल के लिए ही लोकसेवक होते हैं।
दैनिक जागरण के आनलाइन संपादक शेखर त्रिपाठी को जिस तरह से गिरफ्तार किया गया वह निंदनीय तो है ही साथ में पुलिस प्रशासन की कुंठा का प्रतीक भी है। 13 फरवरी की शाम उन्हें गिरफ्तार किया और चौदह फरवरी को तत्काल उन्हें जमानत मिल गई। उनके वकील ने जब पूछा कि गिरफ्तार किस बिना पर किया गया है तो पुलिस वाले बगलें झांकने लगे। और यह सही भी था। निर्वाचन आयोग ने जिस बात को संज्ञान में लिया वह कोई छपी हुई खबर नहीं बल्कि एक अन्य प्रतिद्वंदी आनलाइन पोर्टल वायर का अभियान था। वायर ने सबसे पहले यह मामला उछाला कि दैनिक जागरण के आनलाइन संस्करण में 11 फरवरी की रात एक सर्वे छपा है जिसमें भाजपा को भारी बढ़त दिखाई गई है। उसके बाद वे सारे लोग एकजुट होकर हंगामा करने लगे जिन्होंने पोस्ट तो नहीं पढ़ी थी पर किसी न किसी वजह से वे या तो दैनिक जागरण के विरोधी थे या मोदी के। यूं भी वायर की प्रतिष्ठा इसी बात की है कि उसकी वेबसाइट मोदी विरोधियों को एक मंच पर ले आई है। मगर वायर पोर्टल ने जिस वेबसाइट का लिंक दिया वह जागरण डॉट काम का नहीं बल्कि जागरण पोस्ट का है। जागरण पोस्ट को जागरण समूह का एक पोर्टल तो माना जा सकता है पर दैनिक जागरण अखबार से उसका कोई नाता नहीं है। तब फिर पुलिस ने किस हैसियत से शेखर त्रिपाठी को पकड़ा। यह भी मजेदार तथ्य है कि दैनिक जागरण उत्तर भारत का सबसे बड़ा हिंदी अखबार है मगर जागरण पोस्ट अंग्रेजी की साइट है और शेखर त्रिपाठी का उससे कोई संबंध नहीं है। शेखर त्रिपाठी काफी सीनियर पत्रकार हैं और एक लंबे अरसे तक वे दैनिक जागरण लखनऊ के संपादक रह चुके हैं तथा इस वक्त वे दैनिक जागरण के आनलाइन संस्करण जागरण डॉट काम के संपादक हैं।
बेहतर रहता कि निर्वाचन आयोग ने अगर वायर की खबर पर संज्ञान लिया ही था तो पुलिस को किसी को गिरफ्तार करने के पूर्व यह तो पता करना था कि जिस व्यक्ति को गिरफ्तार किया जा रहा है वह असल अभियुक्त है भी या नहीं। पुलिस को न तो पीआरबी एक्ट के बारे में पता रहता है न संपादक के कार्यक्षेत्र का। अगर पीआरबी एक्ट की जानकारी पुलिस को होती तो यह अवश्य पता होता कि किसी भी अखबार समूह में कुछ गलत छपने पर आरोप किस पर आाएगा। दूसरे, वायर द्वारा दिए गए उस लिंक को पता किया जाता कि आखिर छपा क्या था। क्योंकि अब वह लिंक खुल नहीं रहा और वह शायद कुछ क्षण के लिए दिखा होगा। और वह भी जागरण पोस्ट पर जो अंग्रेजी का पोर्टल है तो हिंदी के संपादक को पकडऩे का क्या मतलब? जाहिर है ऐसा सब नासमझी और हड़बड़ी अथवा स्वयं को राजाबेटा दिखाने के लिए उत्तर प्रदेश की पुलिस ने किया। राज्य के एडीजी (कानून व्यवस्था) दलजीत चौधरी तो काफी अनुभवी और परिपक्व हैं उन्हें तत्काल अपने गाजियाबाद स्थित एसएसपी से पूछना चाहिए कि ऐसी त्रुटि कैसे हुई?
चुनाव आयोग को चाहिए कि अगर उसे जागरण प्रकाशन पर कार्रवाई करनी ही है तो सुनी सुनाई बात पर नहीं बल्कि पूरी पड़ताल करने के बाद ही कोई कदम उठाए। अगर जागरण पोस्ट ने ऐसा कोई सर्वे छापा भी है तो उसका पता चल ही जाएगा और यह भी पता चल जाएगा कि वह सर्वे कितनी देर तक जागरण पोस्ट पर दिखा। अगर प्रबंधन ने तत्काल कार्रवाई कर उसे हटा दिया तो यह सहज मानवीय भूल मानकर भुला देना चाहिए और अगर शरारतन किया गया तो कड़ी सजा दी जाए। पर जो कुछ भी हो पूरी तहकीकात और पुख्ता पड़ताल के बाद ही। किसी प्रतिद्वंदी साइट के कहने पर नहीं। प्रशासन और पुलिस को किसी का मित्र या शत्रु नहीं दिखना चाहिए। यूं दैनिक जागरण अखबार की सामान्य छवि भाजपा समर्थक की है पर ध्यान रखना चाहिए कि दैनिक जागरण के मालिक एक व्यवसायी भी हैं इसलिए वे ऐसी कोई हरकत सरेआम नहीं करेंगी जिससे उनके बाजार पर आंच आए। एक सामान्य अवधारणा को हकीकत में बदलने की नादानी जागरण के मालिक कभी नहंी करेंगे। अत जांच हो पर किसी के कहने या किसी की बात को स्वयं संज्ञान में लेकर नहीं बल्कि पूरी पड़ताल और ठोस सबूतों के आधार पर ही। तब ही किसी भी संस्था की एक निष्पक्ष छवि बनती है।
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  • माणिक सरकार का प्रतिबंधित भाषण
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