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तैयारी में जुटे राजनाथ !
विवेक सक्सेना 
नई दिल्ली .(राजकाज ) चुनाव नतीजे अभी आये भी नहीं है पर उत्तर प्रदेश में ‘नये’ मुख्यमंत्री ने अपनी तैयारी शुरू कर ली है. अगर हाल के घटनाक्रम पर नजर डाली जाये तो कुछ ऐसा ही नजर आता है. दिल्ली दरबार में चर्चा है कि गृहमंत्री राजनाथ सिंह के दफ्तर में हाल ही में मंत्रालय के तहत आने वाले अर्धसैनिक बलों और दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया है कि गृहमंत्री को उनके समारोहों की जितनी भी फोटोग्राफ हो वे तैयार करके उन्हें भिजवा दी जाये यह आदेश बीएसएफ, सीआरपीएफ, आईटीबीपी, सीआईएसएफ, एसएसबी और असम राइफल्स को भेजे गये हैं. हर संगठन पिछले तीन साल में गृहमंत्री की 100-200 तस्वीरों वाले एलबम तैयार करने में व्यस्त हो गया है जो कि उनके विभिन्न कार्यक्रमों में खीची गयी थी. दिल्ली पुलिस ने तो हाथ आगे बढ़ाते हुए एलबम की जगह गृहमंत्री के पोस्टर की आकार वाली तस्वीरे तैयार करवायी है. इस हरकत से इन अटकलों को हवा मिली है कि राजनाथ सिंह मानसिक रूप से लखनऊ जाने की तैयारी कर रहे हैं और वहां के मुख्यमंत्री निवास में यह एलबम शोभा बढ़ाएंगे. 
 
 
आईबी की ऐसी रपट 
आईबी   में उत्तर प्रदेश चुनावों को लेकर भेजी गयी नवीनतम रिपोर्ट चौकाने वाली है. इसके मुताबिक भाजपा भले ही शमशान और कब्रिस्तान का मुद्दा उछाल रही हो पर बड़ी तादाद में मुस्लिम महिलाओं का झुकाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर हो रहा है. इसकी वजह केंद्र सरकार द्वारा तीन तलाक के मुद्दे पर मुस्लिम महिलाओं के हक में बयान देना और उन्हें इस समस्या से निजात दिलवाने की कोशिश करना है. रिपोर्ट के मुताबिक मुस्लिम महिलाएं इसे एक क्रांतिकारी कदम मान रही है. वे नरेंद्र मोदी की आपसी बातचीत में तारीफ भी कर रही है. शायद बनारस रोड शो में उनके अतिउत्साह की यह भी एक वजह हो क्योंकि आईबी की रिपोर्ट सीधे प्रधानमंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ही देखते हैं. वहीं गृह मंत्रालय के कुछ वरिष्ठ अफसरों का मानना है कि आईबी की रिपोर्ट पर पूरी तरह से विश्वास नहीं किया जा सकता है. जिस तरह से इस संग्रह का राजनीतिक इस्तेमाल हुआ उसे देखते हुए इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इसके प्रमुख अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए उन्हें ऐसी रिपोर्ट भेजते आये जो उन्हें पढ़ने में अच्छी लगे. वे आपातकाल को याद दिलाते है जब तत्कालीन अफसरों ने इंदिरा गांधी को खुश करने के लिए अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि अगर चुनाव करवाये जायें तो कांग्रेस को भारी जीत  हासिल होगी. मगर जब परिणाम सामने आये तो रिपोर्ट धरी रह गयी.
 
 
त्रिशंकु विधानसभाएं?
 
राजनीति के जानकारों का मानना है कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव यह तो तय करेंगे कि इस देश में गठबंधन की राजनीति का भविष्य क्या होगा. 1989 में इस देश की राजनीति पर गठबंधन हावी हो गये थे. तब से लेकर 2009 के चुनाव तक लोकसभा चुनाव तक में किसी भी एक पार्टी को बहुमत नहीं मिला. हालांकि इससे कुछ वर्ष पहले विधानसभा मेंएक ही पार्टी की सत्ता में लाने की पटकथा शुरू हो गयी थी. लोकसभा चुनाव में तो उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली सटी सभी राज्यों में एकतरफा नतीजे आये. हालांकि इससे पहले उत्तर प्रदेश, गोवा, पश्चिम बंगाल सरीखे राज्यों में पार्टियों को अपने बलबूते पर सरकार बनाने के लिए बहुमत हासिल हो गया था. मगर अब हालात बदलते नजर आ रहे हैं. जहां एक ओर बड़े दल और गठबंधन अपनी जीत का दावा कर रहे हैं वहीं छोटे दलों का आत्मविश्वास भी गजब का है. इन पांचों राज्यों के छोटे दलों और निर्दलीयो को पूरा विश्वास है कि उनके बिना सरकार का गठन नहीं हो पायेगा. अहम बात तो यह है कि अभी तक मीडिया समूह के सर्वेक्ष्ण और सट्टा बाजार सब का यही मानना है कि इस बार त्रिशंकु विधानसभा ही बनेंगी. यही वजह है कि आजकल अजीत सिंह के बरताव में जबरदस्त बदलाव आया है. ऐसा लगता है कि अगामी चुनाव नतीजे आ चुके हैं और वे किंग मेकर बन गये हैं. अपना दल के नेता भी हवा हवाई हो रहे हैं.
 
 
उत्तराखंड में 
 
उत्तराखंड में जहां पहले भाजपा की स्थिति मजबूत मानी जा रही थी वहां तमाम निर्दलीय और उत्तराखंड क्रांतिदल और बसपा सरीखे दल के नेता यह मान कर चल रहे हैं कि इस बार भी 2012 को पुनरावृत्ति होगी और किसी भी बड़े दल को बहुमत नहीं मिलेगा और सरकार बनाने में उनकी अहम भूमिका रहेगी. यही हालत गोवा की भी है जहां पहले यह माना जा रहा था कि भाजपा अपने बलबूते पर सरकार बना लेगी अब यह कहा जा रहा है कि उससे अलग होकर चुनाव लड़ने वाली महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी, शिव सेना और गोवा सुरक्षा मंच की इस चुनाव में चंद सीटें मिल सकती है जो कि भाजपा की कीमत पर ही जीती जायेगी. मालूम हो कि संघ के गोवा प्रमुख रहे सुभाष वेलिंगकर ने चुनाव पूर्व उससे अलग होकर गोवा सुरक्षा मंच बनाया था और तीन पार्टियों का गठबंधन बना कर चुनाव लड़े थे. अब संघ ने उनकी घर वापसी करवा ली है इसे राज्य में त्रिशंकु विधानसभा बनने का संकेत माना जा रहा है. मनीपुर में शर्मिला इरोम ने तो पंजाब में आप ने संघर्ष की तिकोग बना दिया है जिससे किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत मिलने की संभावना कम जताई जा रही है. वहां सीधे आप और कांग्रेस के बीच टककर है.
 
 
राजनाथ के मुंगेरी सपने
 
चुनाव नतीजे अभी आये भी नहीं है पर उत्तर प्रदेश में ‘नये’ मुख्यमंत्री ने अपनी तैयारी शुरू कर ली है. अगर हाल के घटनाक्रम पर नजर डाली जाये तो कुछ ऐसा ही नजर आता है. दिल्ली दरबार में चर्चा है कि गृहमंत्री राजनाथ सिंह के दफ्तर में हाल ही में मंत्रालय के तहत आने वाले अर्धसैनिक बलों और दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया है कि गृहमंत्री को उनके समारोहों की जितनी भी फोटोग्राफ हो वे तैयार करके उन्हें भिजवा दी जाये यह आदेश बीएसएफ, सीआरपीएफ, आईटीबीपी, सीआईएसएफ, एसएसबी और असम राइफल्स को भेजे गये हैं. हर संगठन पिछले तीन साल में गृहमंत्री की 100-200 तस्वीरों वाले एलबम तैयार करने में व्यस्त हो गया है जो कि उनके विभिन्न कार्यक्रमों में खीची गयी थी. दिल्ली पुलिस ने तो हाथ आगे बढ़ाते हुए एलबम की जगह गृहमंत्री के पोस्टर की आकार वाली तस्वीरे तैयार करवायी है. इस हरकत से इन अटकलों को हवा मिली है कि राजनाथ सिंह मानसिक रूप से लखनऊ जाने की तैयारी कर रहे हैं और वहां के मुख्यमंत्री निवास में यह एलबम शोभा बढ़ाएंगे.
 
धर्म पर हावी जाति
 
गृह मंत्रालय और चुनाव आयोग में इस बात को लेकर राहत की सांस ली है कि हमारे नेताओं की तमाम कोशिशों के बावजूद चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश में कहीं भी सांप्रदायिक टकराव नहीं हुआ. इस बार भी बिहार विधानसभा चुनाव की तरह ही तनाव भड़काने की सारी कोशिशे नाकाम साबित हुई. मालूम हो कि बिहार में विधानसभा चुनाव दशहरे और मुहर्रम के बीच हुए थे. तब अमित शाह ने अपने भाषणों में कहा था कि बिहार में भाजपा हारी तो पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे. भाजपा तो हार गयी मगर पाकिस्तान में पटाखे फूटने की खबर नहीं आयी. इस बार उत्तर प्रदेश में मतदान शांतिपूर्ण रहा. विजनौर और बहराइच की इक्का-दुक्का घटनाओं को छोड़ दे तो कुल मिलाकर न तो मुजफ्फनगर के दंगो और न ही कैराना से हिंदुओं के पलायन का असर चुनाव में नजर आया. मालूम हो कि 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान यह मुद्दे काफी हावी रहे थे. इस बार भी शमशान और कब्रिस्तान सरीखे मुद्दों को हवा देने के बाद भी धार्मिक आधार या ध्रुविकरण न होने की वजह यह बतायी जा रही है कि जहां लोकसभा चुनावा में धार्मिक भावनाएं हावी रही थी वहीं विधानसभा चुनाव में जाति हावी रही. इस बार जाट, यादव, दलित सभी जातीय आधार पर बंटे नजर आये तभी भाजपा ने हिंदू कार्ड की जगह अतह पिछड़ों का कार्ड आगे किया. जानकारों का मानना है कि मुस्लिम बहुत सतर्क रहे और उन्होंने अंतिम क्षण तक यह पता नहीं चलने दिया कि वे किसे वोट दे रहे हैं. इसका असर यह हुआ कि धार्मिक आधार पर किसी दल के खिलाफ या पक्ष में आक्रामक ध्रुविकरण नहीं हो सका.
 
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