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बांधों को लेकर सवाल बरकरार

फ़ज़ल इमाम मल्लिक

नैनीताल .गंगा यमुना पर नैनीताल हाई कोर्ट के फैसले के बाद सवाय यह उठने लगा है कि क्या सरकारें अब नदियों का पानी रोकने के लिए बांध बनाने से बचंगीं. हालांकि अदालत ने अपने आदेश में गंगा यमुना ही नहीं ग्लेशियरों, झील-झरनों, घास के मैदानों, जंगलो आदि को भी जीवित व्यक्ति का दर्जा दिया है. लेकिन 20 मार्च के इस फैसले में अदालत ने बांधों को लेकर कोई टिप्पणी नहीं की है. इससे यह सवाल उठना लाजिमी है कि अदालत के आदेश के बावजूद सरकारें इसका फायदा उठाएंगीं और बांध के सवालों पर बच निकलेंगीं. इतना ही नहीं इस आदेश में नदी से जुड़े लोगों को लेकर भी कुछ नहीं किया गया है. माटू जनसंगठन के विमलभाई और  राजपाल रावत इसे लेकर सवाल उठा रहे हैं. यह तो साबित हो चुका है कि बांधों से बहती नदी, ,,ग्लेशियर, झील-झरने, घास के मैदान व जंगल प्रभावित होते हैं. किसी भी नदी को बांध दिया जाता है तो निचले हिस्से में पानी नही रहता जिससे नदी में बचा हुआ पानी भी गंदा हो जाता है. निर्मल नदी के लिए उसका अविरल होने जरूरू है. अदालत के आदेश के बाद अब सरकार पर इसकी जिम्मेदारी आ गई है कि वे नदियों को किस तरह से बांधों से बचाए ताकि नदियां मैलीं न हों.
 
गंगा को लेकर अदालतों के फैसलों को लेकर सरकारों का जिस तरह का रवैया रहा है उसे देखते हुए इस आदेश का पालन सरकारें करेंगीं, इसमें शक ही लगता है. 2008 में गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया गया. गंगा पर हजारों करोड़ रुपए गंगा एक्शन प्लान के तहत खर्च हुए थे. जिसकी आलोचना भाजपा सरकार ने की और बीस हजार करोड़ से नमामि गंगा की शुरुआत की. 22 फरवरी को राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने कहा की ‘नमामि गंगा‘‘ के तहत खर्च किए गए दो  हजार करोड़ से कुछ नहीं हुआ है. टिहरी बांध के वक्त पर्यावरण को संरक्षित रखने के लिए भागीरथी नदी घाटी प्राधिकरण बनाने की शर्त रखी गई थी. लेकिन यह अभी तक भी ढंग से काम नही कर पाया है. ‘नमामि गंगा‘‘बांधों की समस्याओं को लेकर कुछ नहीं कहा गया है. अब अदालत ने जो फैसला सुनाया है, उसमें भी बांधों को लेकर कुछ नहीं कहा गया है.
उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही सत्ता में रहीं. केन्द्र में भी कांग्रेस शासन के बाद लगभग तीन साल भाजपा सत्ता में है. लेकिन गंगा की स्थिति पर दोनों ही सरकारें बांधों के खतरनाक खेल में शामिल रहीं हैं. फिर इन सरकारों से हम क्या उम्मीद रखे की वह गंगा-यमुना के अभिवावक की भूमिका निभाएंगे.
विमल भाई कहते हैं कि इस आदेश का देश के तमाम नदी प्रेमियों ने स्वागत किया है. लेकिन खतरा यह है कि इस आदेश का अुनपालन करने कि जिम्मेदारी जिनको दी गई है वे उसी सरकार के नीचे काम कर रहे हैं जिसे लेकर हमने बराबर सवाल उठाए हैं. राज्य के मुख्यमंत्री त्रिवेंदर रावत ने इस आदेश के आते ही सुप्रीम कोर्ट में उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौति देने की बात कही है. रावत ने पद संभालते ही यमुना के बांधों में तेजी लाने के लिये केन्द्र से बात भी की है. उनके इस बयान से हमारी चिंता बढ़ी है. जाहिर है कि इससे पता चलता है कि प्रदेश की नई सरकार के इरादे क्यां हैं. विमल भाई कहते हैं कि क्या नई सरकार भागीरथी के सौ किलोमीटर पर ‘‘इकोसेंसेटिव जोन‘‘ बनाए जाने पर अपना रुख साफ करेगी. वे यह भी पूछते हैं कि सरकार बांधों के निर्माण पर किस सीमा तक रोक लगाएगी और सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मुकदमे जिनमें अदालत के 24 बांधों पर रोक लगाई है, उस पर सरकार का क्या रुख रहेगा. माटू जनसंघठन के अलावा कई और संगठनों ने अदालत के फैसले का स्वागत तो किया है लेकिन उनका सवाल बांधों को लेकर है क्या सरकार नदियों को बचाने के लिए बांधों के निर्माण पर रोक लगाएगी या फिर जो जैसा चल रहा है वैसे चलने देगी.
 
 
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