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कहां गये दूसरी परंपरा के हिंदू?

अरुण कुमार त्रिपाठी

नयी दिल्ली.हरियाणा के मेवात जिले की नूह तहसील का पहलू खान जयपुर गया था भैंस लेने लेकिन उसे अपनी जान गंवानी पड़ी. संयोग से उसे ऐसी गाय मिल गयी जो 12 लीटर दूध दे रही थी. कुल जमा 45000 रुपये का यह सौदा उसे सस्ता लगा और उसने भैंस की जगह पर गाय खरीद ली. उसके जयसिंहपुर गांव के लोग दूध का व्यापार करते हैं और उसमें मुस्लिमों की बहुतायत है. इसलिए उसने सोचा नहीं था कि गाय उसके लिए मौत साबित होगी. अलवर जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग आठ पर गौरक्षकों ने उसे घेर लिया और गाय का तस्कर बताकर पीट-पीट कर मार डाला. उसका बेटा पीछे वाले ट्रक पर था और संयोग से वह बच गया. लेकिन हैरानी की बात है कि इस गौरक्षक दल के साथ पुलिस भी थी और उसने गौरक्षकों को गिरफ्तार करने की बजाय उन लोगों पर तस्करी का मुकदमा दायर किया जो ट्रकों पर गाय और भैंस लेकर आ रहे थे. संभव है गौरक्षकों की इस कार्रवाई को कुछ लोग हिंदू राष्ट्र निर्माण के मार्ग में मामूली सी कुर्बानी मान रहे हों और उन तमाम पापों का बदला ले रहे हों जो गौमाता के साथ सदियों से किये जा रहे हैं लेकिन वे यह भूल रहे हैं कि गौरक्षकों की यह आक्रामकता सिर्फ मुस्लिमों तक ठहरने वाली नहीं हैं. वह उन तमाम हिंदुओं तक भी जायेगी जो किसी तरह दूध और जानवरों का व्यापार करते हैं और उनके लिए भी सबूत देना और अपने को निरपराध साबित करना कठिन होगा. उससे भी बड़ी विडंबना यह है कि सबूत किसी अदालत या पुलिस के समक्ष नहीं पेश करना है बल्कि उन लोगों के सामने पेश करना है जो एक विशेष विचारधारा में दीक्षित हैं और आस्था से ओतप्रोत भावना के वशीभूत हैं. उन्होंने तर्क को इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिया है और सारे कानूनों की व्याख्या आस्था से प्रेरित होकर कर रहे हैं. 
दूसरी तरफ शिया धर्मगुरुओं ने इराकी धर्मगुरुओं के फतवे के माध्यम से गौकशी और तीन तलाक के विरुद्ध मुसलमानों को सहमत करने का प्रयास शुरू किया है. उनका कहना है कि देश के सामाजिक सद्भाव के लिए गौकशी और गौमांस का सेवन बंद कर देना चाहिये. उसी तरह तीन तलाक भी स्त्रियों के अधिकारों के विरुद्ध है इसलिए उसे भी प्रतिबंधित करना चाहिये. इसी तरह का बयान हाल में अजमेर शरीफ की दरगाह पर कुछ मौलानाओं ने भी जारी किया है. एक मौलाना ने तो कहा कि वे आज से गोमांस का सेवन बंद कर रहे हैं और चाहेंगे कि यह संकल्प दूसरे मुसलमान भी लें. स्पष्ट तौर पर ऐसा महात्मा गांधी का भी कहना था कि मैं गौपूजक हूं और मैं अपने मुसलमान भाई से अनुरोध करूंगा कि वे गाय को मारना बंद कर दें. लेकिन उनका यह भी कहना था कि वे गाय के साथ साथ इनसान को भी पूजते हैं इसलिए वे गाय के लिए इनसान को नहीं मारेंगे. यह एक उदार हिंदू का दृष्टिकोण है और इसी के आधार पर एक संविधान बनाकर लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष भारत का गठन हुआ था. लोगों को उम्मीद थी कि भारतीय समाज की यह दूसरी परंपरा आजादी के सत्तर सालों बाद हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं और समाज में रच बस गयी है और उसी के आधार पर समाज एक दूसरे से व्यवहार करेगा. इसी दूसरी परंपरा के संघर्ष को डा लोहिया हिंदू बनाम हिंदू की लड़ाई कहते थे और मानते थे कि यह पांच हजार साल से चल रही है. यह परंपरा कट्टर बनाम उदार हिंदू के बीच संघर्ष की परंपरा है. हमारे स्वाधीनता संग्राम में उदार हिंदू जीता था और कट्टर हिंदू हाशिये पर चला गया था. यही वजह थी कि बड़ी संख्या में दूसरे धर्मों के लोगों ने भारत में रहने का फैसला किया था. आज उदार हिंदू राजनीतिक रूप से पराजित हो गया है. लोकतांत्रिक संस्थायें कभी कभी उसकी भाषा बोलती हैं लेकिन लगता नहीं कि वे बहुत दूर तक उदार परंपरा की रक्षा कर पायेंगी. इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने हाल में उत्तर प्रदेश सरकार को चेताया भी है कि अवैध बूचड़खानों पर कार्रवाई के जोश में वह धर्मनिरपेक्ष ढ़ाचे को चोट न पहुंचाये. पर क्या उदार हिंदुओं के जागे बिना यह संभव हो पायेगा? 
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