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अखिलेश पर दबाव बढ़ा रहें है मुलायम

अंबरीश कुमार 

लखनऊ .अखिलेश यादव की सरकार साढ़े चार साल तक चलाने वाले मुलायम सिंह यादव एक बार फिर फिर पार्टी पर अपना एकाधिकार बनाने के लिए दबाव बढ़ा रहे हैं .इस अभियान में भाई शिवपाल यादव ,दूसरी पत्नी साधना गुप्ता और बहू अपर्णा यादव खुलकर साथ हैं .आये दिन इस सिलसिले में सभी दबाव डाल रहे है .शिवपाल सिंह यादव को नेता विरोधी दल न बनाये जाने से यह विवाद बढ़ रहा है .पर असली मंशा पार्टी पर एकाधिकार की है .मुलायम सिंह यादव फिर अध्यक्ष बनना चाहते हैं . बहू अपर्णा यादव ने भी अखिलेश यादव से यह मांग की है .साधना गुप्ता पहले ही यह कह चुकी है .शिवपाल नई पार्टी बनाने के नामपर दबाव डाल रहे हैं .खुद मुलायम सिंह यादव यह कह चुके हैं कि परिवार की कलह के चलते अखिलेश यादव विधान सभा चुनाव हारे .वे यहीं नहीं रुके और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस टिपण्णी का हवाला भी दिया जो वे चुनाव के दौरान कर रहे थे .एक सभा में मुलायम सिंह यादव ने साफ़ कहा ,जो अपने बाप का नहीं हुआ वह दूसरे का क्या होगा .यही वह राजनैतिक संदेश था जिसे भाजपा ने चुनाव में गांव गांव तक फैलाया था .वैसे भी ध्यान से देखे मुलायम सिंह और उनके परिवार का एक हिस्सा भाजपा के करीब खड़ा नजर आता है .वे मोदी से खुद कानाफूसी करते हैं .दूसरा बेटा और बहू योगी से तार जोड़ते नजर आते हैं .शिवपाल भी मुलाकात कर राजनैतिक संदेश देते हैं .परिवार का दूसरा हिस्सा किस दिशा में बढ़ रहा है क्या किसी को समझ नहीं आता .
इस सब के बावजूद  क्या समाजवादी पार्टी पारिवारिक कलह से हारी ? बहुजन समाज पार्टी जिसे मीडिया का एक बड़ा तबका सत्ता में वापस ला रहा था उसकी मुखिया का तो ऐसा कोई बड़ा परिवार भी न था जिसकी और बुरी गत हुई .अपवाद एक भाई जरुर है .दूसरे मुलायम सिंह यादव शायद भूल रहें है कि पिछले लोकसभा चुनाव में वे अपने संयुक्त और मजबूत परिवार के साथ चुनाव लड़े  थे और  पांच सीट पर निपट गए थे .तब वे ही पार्टी का चेहरा थे और प्रधानमंत्री पद के दावेदार भी .तब बेटा भी साथ था तो भाई भतीजा बहू भी साथ थे .भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश विधान सभा का चुनाव रणनीति बनाकर लड़ी और जीती भी .उस रणनीति में हिंदुत्व भी था तो दलितों और अति पिछड़ों की सोशल इंजीनियरिंग भी .समाजवादी पार्टी ने शहरी क्षेत्रों में काम किया पर उत्तर प्रदेश जैसे बड़े सूबे में ग्रामीण इलाकों में समाजवादी पार्टी सरकार की न कोई उपलब्धि पहुंच पाई न सोशल इंजीनियरिंग पर ध्यान दिया गया .वे मेट्रो से लेकर एक्सप्रेस वे जैसे शहरी विकास के प्रतीक पर ज्यादा भरोसा कर रहे थे .दूसरे वोट बैंक के नामपर सिर्फ यादव मुसलमान साथ था .न कभी अति पिछड़ा को जोड़ने की ठोस पहल हुई न दलित को .ऐसी कई वजह से पार्टी को नुकसान हुआ .वैसे भी साढ़े चार साल तक मुलायम सिंह यादव ने ही सरकार चलाई थी .कौन मुख्य सचिव होगा यह भी वे ही तय करते थे और किसे यश भारती मिलेगा यह भी .अब सरकार चली गई तो फिर पार्टी को लेकर विवाद शुरू हो चुका है .अब अखिलेश यादव के सामने भी बड़ी राजनैतिक चुनौती है जिसका मुकाबला बिना आईएएस अफसरों के उन्हें करना है .वैसे भी निहायत अराजनैतिक किस्म की एक टीम जो उनके ईर्दगिर्द थी वह हार कर जमीन पर आ चुकी है .ऐसे में असली राजनैतिक परीक्षा की घड़ी अब आई है .सिर्फ प्रदेश ही नहीं देश की भी निगाह उनपर है .
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