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कभी काचर भी तो बनाएं

अरुण कुमार पानीबाबा 

वर्तमान की परिभाषा सरल विषय नहीं. आजादी के 68 बरसों केदौर में कुपोषण, बीमारी का लगातार विस्तार हुआ है. राहत की किरण दिखाई तो नहीं देती.कुपोषण, संभवतः उतना गंभीर विषय नहीं जितना कि इस संबंध में चिंतन का अभाव. आंकड़ों से अतिरिक्त, कहीं कोई विमर्श नहीं. अचरजकारी विषय है कि खाद्य पदार्थों की मंहगाई चुनाव संवाद तक में महत्वहीन मुद्दा है. गंभीर आकस्मिक अनुसंधान का विषय है कि इतनी तीव्र गति से बढ़ती मंहगाई पर जनआक्रोश अनुपस्थित क्यों है? दालों और विविध शाकभाजी के भाव वर्तमान ऊंचाई पर बने रहे तो संतुलित भोजन अति दुर्लभ होने ही वाला है.
 
मंहगाई असाध्य नहीं दो-चार-दस-बरस में कोई न कोई समाधान हो ही जायेगा. मंहगाई की तुलना में, विषाक्त अन्नजल अधिक विकराल समस्या है. भारत जैसा कुराज दुनिया में अन्य कहीं नहीं. जो कुछ खेतों में पैदा कर रहे हैं उसमें तो विष पर्याप्त मात्रा में डाल ही रहें हैं, जो अपने आप उग रहा है जैसे आम, पपीता आदि उसे कृत्रिम ऊर्जा. गर्मी से पकाकर विषैला बना रहे हैं.शाक-भाजी के संदर्भ में तो सरकारी संस्थाएं अब यह प्रचारित भी करने लगी हैं कि सुंदर दिखने वाली सब्जी विषयुक्त हो सकती है, अत: थोड़ा सावधानी से उसका उपयोग करें. सब्जी को विषमुक्त बनाने के लिए साधारण सलाह भी दे रहें हैं. जैसे हरी सब्जियों को कुछ देर के लिए नमक के पानी में डाल लें. इस कृपा के लिए आमजन को कृतज्ञ होना चाहिए.
 
भारत पुराणको जंगलराज कहना, वास्तव में जंगल की सुव्यवस्था के साथ अन्याय है. हमारे राजा अज्ञानी संप्रदाय के सक्रियतावादी सदस्य हैं. पहली बात तो यह कि कहीं कोई कानून, नियम, या आचरण का प्रश्न ही नहीं है. और यदि कहीं कोई कानून हो भी तो वह बेचारे गरीब कर्मचारियों की आय का साधन है, और नेताओं के चुनाव खर्च का स्रोत है. अब जिस पैमाने पर चुनाव खर्च होने लगा है, वह साधारण चंदे से तो नहीं जुटाया जा सकता.
विषाक्त खाद्य पदार्थ और मंहगाई के परिप्रेक्ष्य में कोई भी, नुस्खा व्यंजन विधि लिखने में हाथ कांपते हैं, संकोच होता है, और मन को लज्जा लगती है. इन हालात में जो कुछ संभव है, वह परोसने का प्रयास तो अवश्य ही करना होगा.
उत्तर भारत में बरसात का अंत होने लगता है तो एक स्वयंभू सब्जी का आगमन होता है हरियाणा, राजस्थान के खेतों में काचर नाम की छोटी गोलमटोल ककड़ी स्वत: फलने लगती है. इन्हीं दिनों गुवार, मूंग, मोठ, लोभिया की फलियां भी तैयार होती हैं. हमने जिन चार फलियों काजिक्र किया येबरसाती फसलें हैं. आजकल के मौसम में, अब से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक काचर गुवार की सब्जी का प्रयोग अवश्य करें.
 
बनाने की विधि बहुत कठिन नहीं लेकिन आधुनिक मां-बहन हमें क्षमा करें, क्योंकि थोड़ी मशक्कत तो अवश्य करनी पड़ेगी.चार-पांच सदस्यों के परिवार के लिए आधा किलो गुवार में पावभर काचर का मिश्रण पर्याप्त होता. काचर बोई नहीं जाती और इसकी अनेक प्रजातियां होती हैं. उत्तर-प्रदेश में जो काचर की तरह की ककड़ी होती है उसे फूट कहते हैं, और फल की तरह उसका उपयोग करते हैं, यदि कुछ कच्ची उपलब्ध हो जाये तो विभिन्न फलियों के साथ मिलाकर सब्जी बना सकते हैं.
 
काचर को धोकर पीलर से छील लें. गुवार यदि देसी नसल की है और अभी कचिया है तो मात्र तिनका तोड़ सकते है. धागा पड़ चुका है तो तिनका तोड़ने के साथ-साथ सूत भी निकालना है. बाजार में बिकने वाली गुवार के लिए यह निर्णय आसान नहीं कि उस में रासायनिक खाद और अन्य कीटनाशक, खरपतवारनाशक विषों का प्रयोग हुआ है या नहीं? अत: बनाने की विधि में एक सावधानी कर सकते हैं. जो वास्तव में गुवार पकाने की विधि का पुराना नियम भी है.
अभी हाल के गुजरे जमाने में गुवार का सालभर नियमित प्रयोग हुआ करता था. ग्रामीण महिलाएं इस भाजी को सुखाकर आसानी से संरक्षण कर लिया करती थीं. काचर तो सुखाई ही जाती है. अभी हाल तक उत्तर भारत के हलवाई, चाटवाले जिस मीठी सौंठ (अमचूर या इमली की चटनी) का प्रयोग करते थे, उसमें काचर का मोटा चूरा अनिवार्य मसाला होता है.गुवार हरी हो या सुखी उसे अच्छी तरह गर्म पानी में धोकर उबाल लें. अच्छी तरह पकी गुवार को एक थाली या परात में हाथ से मथ लें और उसमें जो भी तिनका, धागा और महीन छिलका है वह अलग कर निकाल दें. इस तरह तैयार की गई गुवार अत्यंत गुणकारी होती है. इस प्रक्रिया से इसकी वायु की प्रवृत्ति पूर्णतया नष्ट हो जाती है. विशुद्ध प्रोटीन बचता है.
 
ताजे काचर उपलब्ध हैं तो छीलकर छोटा-छोटा काट लें, और यदि सूखे काचर का प्रयोग कर रहे हैं तो उन्हें तोड़कर पानी में भिगों दें.जहां तक संभव हो अब से लेकर होली तक नये तिल का ताजा तेल ही खाना चाहिए. लेकिन आधुनिक समाज नये तिल के ताजा तेल को ‘चील का दूध’बता देगा. अत: जो भी औद्योगिक तेल आप खा रहे है, उसका उपयोग करें लेकिन इस व्यंजन के लिए सरसों के कड़वे तेल का प्रयोग नहीं किया जाता चूंकि गवार के रस को कड़वा और तिक्त माना गया है.
 
आधा सेर गुवार के लिए 75 से 100 मिलीग्राम तेल अनिवार्य है। तेल गर्म हो जाये तो उसमें साबूत लाल मिर्च के छिलके (यानि बीज रहित मिर्च) स्वादानुसार लेकिन अजवायन पर्याप्त मात्रा में (तीन-चार चाय के चम्मच) पर्याप्त मात्रा में हींग का प्रयोग अवश्य करें. बस इसमें मथी हुई गुवार, कटी काचर डाल दें. स्वादानुसार नमक, सौंफ, धनिए का पॉउडर डालकर सब्जी को अच्छी तरह पकायें यानि सब्जी में तेल दिखना चाहिए। यह ऐसा सालन है जो एक समय बनाकर अगले तीन-चार समय सहज उपयोग में लाया जा सकता है.
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