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शराबबंदी के साथ नोटबंदी की भी मार झेलता बिहार

डा लीना

पटना. बिहार के कर राजस्व में भारी कमी हुई है. इसके लिए शराबबंदी और नोटबंदी कारण रहे है. इस बात का खुलासा बिहार विधानमंडल के दोनों सदनों में 29 नवंबर को पेश भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) का बिहार राज्य के राजस्व पर लेखापरीक्षा प्रतिवेदन से हुआ है. प्रतिवेदन  में कहा गया है कि वित्त वर्ष 2015-16 की तुलना में 2016-17 में 1706.85 करोड़ रुपये की कमी का प्रमुख कारण सिर्फ शराबबंदी नहीं बल्कि नोटबंदी भी था.
 
बिहार विधानमंडल के दोनों सदनों में पेश भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) का बिहार राज्य के राजस्व पर लेखापरीक्षा प्रतिवेदन 2017 के अनुसार, राज्य के कर राजस्व में 31 मार्च 2017 को समाप्त हुए वित्त वर्ष में इसके पिछले वित्त वर्ष की तुलना में 6.71 प्रतिशत अर्थात 1706.85 करोड़ रुपये की कमी हुई. इस कमी का प्रमुख कारण के लिए सिर्फ शराबबंदी जिममेदार नहीं रहा, बल्कि नोटबंदी ने भी प्रभाव डाला था. रिपोर्ट के मुताबिक कर राजस्व से संबंधित नौ शीर्ष में से छह शीर्ष में वृद्धि हुई है. जबकि राज्य उत्पाद, मुद्रांक एवं निबंधन और बिजली पर कर और शुल्क में कमी आयी है.
 
कैग रिपोर्ट के अनुसार, पिछले वित्त वर्ष की तुलना में वर्ष 2016-17 में 05 अप्रैल 2016 से पूर्ण शराबबंदी के कारण राज्य उत्पाद में 99.06 प्रतिशत की कमी आयी. वर्ष 2015-16 में राज्य उत्पाद से 3141.75 करोड़ रुपये का संग्रह हुआ , जो वर्ष 2016-17 में घटकर 29.66 करोड़ रुपये हो गया. इससे राज्य सरकार को करीब 3112 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ. वहीं, 08 नवंबर 2016 को विमुद्रीकरण (नोटबंदी) के कारण मुद्रांक और निबंधन शुल्क की प्राप्तियों में 12.52 प्रतिशत की कमी आयी. वर्ष 2015-16 में मुद्रांक और निबंधन शुल्क की प्राप्तियां 3408.57 करोड़ रुपये थी जो वर्ष 2016-17 में घटकर 2981.95 करोड़ रुपये हो गयी. इससे राज्य सरकार को 426.62 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ.
 
देखा जाये तो इसी तरह 31 मार्च 2017 को समाप्त हुए वित्त वर्ष में बिजली पर कर और शुल्क में भी पिछले वित्त वर्ष की तुलना में 24.86 प्रतिशत की कमी आयी है. वर्ष 2015-16 में बिजली पर कर और शुल्क से प्राप्तियां 297.99 करोड़ रुपये थी जो वर्ष 2016-17 में घटकर 223.90 करोड़ रुपये रह गयी. इससे  भी राज्य सरकार को 74.09 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ.
 
रिपोर्ट के अनुसार, तीन शीर्ष में कर राजस्व में हुई कमी की सर्वाधिक भरपायी भू-राजस्व से हुई है. भू-राजस्व में वर्ष 2015-16 की तुलना में 2016-17 में 39.70 प्रतिशत की वृद्धि हुई. वर्ष 2015-16 में भू-राजस्व के जरिये प्राप्तियां 695.15 करोड़ रुपये थी जो वर्ष 2016-17 में बढ़कर 971.12 करोड़ रुपये हो गयी. यह वर्ष 2016-17 के बजट अनुमान से 194.28 प्रतिशत अधिक था. इससे राज्य सरकार को पिछले वर्ष की तुलना में 275.97 करोड़ रुपये अतिरिक्त राजस्व की प्राप्ति हुई.
 
राज्य सरकार को आय एवं व्यय पर अन्य कर-पेशा, व्यापार, आजीविका एवं रोजगार पर कर से पिछले वित्त वर्ष की तुलना में वर्ष 2016-17 में 22 प्रतिशत अतिरिक्त राजस्व की प्राप्ति हुई है. इसी तरह वस्तुओं और सेवाओं पर अन्य कर एवं शुल्क में 16.90 प्रतिशत, वाहनों पर कर में 16.23 प्रतिशत, बिक्री, व्यापार पर कर में 11.98 प्रतिशत तथा माल एवं यात्रियों पर कर में वित्तीय वर्ष 2015-16 की तुलना में 2016-17 में 2.60 प्रतिशत की वृद्धि हुई .
 
भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक रिपोर्ट में कहा गया है कि राजस्व अर्जित करने वाले किसी विभाग ने लंबित बकायों का डेटाबेस संधारित नहीं किया था, जिसके कारण राजस्व बकायों के अनुश्रवण में विफलता हुई. इसके कारण 31 मार्च 2017 तक 6327.12 करोड़ रुपये के बकाये लंबित रहे. इसमें 801.75 करोड़ रुपये पांच वर्ष से अधिक समय से लंबित थे.
 
देखा जाये तो हर साल भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक अपनी रिपोर्ट जारी करता है और राज्य के कर राजस्व की पोल खोलता है. विभागों द्वारा लंबित बकायों का डेटाबेस संधारित नहीं किया जाना और इस वजह से राजस्व बकायों के अनुश्रवण में विफलता का होना जहाँ हर बार देखा जाता है तो वहीं इस बार नीतीश सरकार की शराबबंदी और मोदी सरकार की नोटबंदी ने बिहार के कर राजस्व में भारी कमी कर दी है अब देखना होना कि नीतीश सरकार इससे कैसे निपटती है.
 
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