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कारपोरेट और सत्ता को किसानों ने दी चुनौती

अरुण कुमार त्रिपाठी

नई दिल्ली. एक तरफ देश के पूंजीपति और धर्म के मठाधीश मिलकर सुप्रीम कोर्ट और संविधान को चुनौती दे रहे हैं तो दूसरी ओर धर्म और कारपोरेट सत्ता को चुनौती देने देश भर के लाखों किसानों ने दिल्ली में दस्तक दी है. रैली में उड़ीसा, बिहार, मध्यप्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश से लाखों किसान आए हैं. वे चाहते हैं कि कर्ज माफी हो, उनको फसलों का उचित दाम मिले और खेती के समूल संकट को सरकार संबोधित करे. वे यह भी चाहते हैं कि हर मुद्दे पर घंटों समय बर्बाद करने वाली संसद कम से कम तीन हफ्ते यानी 21 दिन खेती के संकट पर चर्चा करे. क्योंकि आंकड़ों को बदलने और छुपाने वाली एनडीए सरकार के राज में कुछ समझ पाना और भी कठिन हो गया है. 
दिल्ली के रामलीला मैदान में दो दिन के लिए आए किसानों की आवभगत करने के लिए इस देश के वे लोग भी जुट गए हैं जो अंग्रेजी पढ़े लिखे हैं और मध्य वर्ग के सम्मानित सदस्य हैं. उनकी आय का स्रोत खेती नहीं है लेकिन वे जानते हैं कि खेती को कारपोरेट लूट रहा है और धर्म से मिलकर जनता को बांट रहा है. शायद इसीलिए किसानों का यह जमावड़ा सांप्रदायिक और जातिवादी हो चुकी राजनीति को वर्गीय आधार पर परिभाषित करना चाहता है. 
किसानों के इस देशव्यापी प्रदर्शन कार्यक्रम में 210 किसान संगठन हिस्सा ले रहे हैं. इनमें भारतीय किसान यूनियन, सेतकारी संगठन, नर्मदा बचाओ आंदोलन, स्वराज इंडिया , रैयत संघ, अखिल भारतीय किसान सभा और किसानों के जमीनी संगठन तो हैं ही साथ में मध्य वर्ग के भी कई संगठन हिस्सा ले रहे हैं. उन संगठनों के नाम हैं डाक्टर्स फार फार्मर्स, लायर्स फार फार्मर्स, टेकीज फार फार्मर्स, नेशन फार फार्मर्स. देश भर के किसानों को इस रैली के लिए आह्वान करने वाले संगठन का नाम है आल इंडिया संघर्ष समिति. 
उनकी मुख्य मांगों में कर्ज मुक्ति, एमएसपी बढ़ाए जाने और तीन हफ्ते के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाकर खेती के संकट पर चर्चा करने का आग्रह शामिल है. वे मौजूदा सरकार के चार साल का हिसाब मांगने आए हैं. किसान इस बात से नाराज हैं कि एनडीए सरकार ने कृषि मंत्रालय की वह रिपोर्ट बदलवा दी जिसमें कहा गया था कि नोटबंदी से किसानों को विशेष परेशानी हुई है. पहले मंत्रालय ने स्टैंडिंग कमेटी आन फाइनेंस को यह प्रतिवेदन दिया था कि जब नोटबंदी हुई तो खरीफ की फसल के बेचे जाने और रबी की फसल के बोए जाने का समय हो रहा था. इसलिए किसान न तो फसल बेच सके और न ही बीच खरीद सके. योगेंद्र यादव के संगठन स्वराज इंडिया के परचे में लिखा गया है, ``हमारा जीवन सस्ता हो गया है. पिछले 20 सालों में तीन लाख से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है. किसानों का टमाटर पांच रुपए किलो बिकता है और उपभोक्ता को यह टमाटर 30 रुपए किलो मिलता है.   
अब सरकार ने दावा किया है कि किसानों को कोई दिक्कत नहीं हुई है. संसदीय समिति के अध्यक्ष वीरप्पा मोइली ने यह माना है कि कृषि मंत्रालय ने ऐसा किया है. किसान नेताओं का कहना है कि सरकार तमाम आंकड़ों में उलटफेर कर रही है. पहले बीच निगम ने  भी माना था कि कैश की कमी के कारण 1.38 लाख कुंतल गेहूं का बीच खरीदा ही नहीं जा सका. अब वह इनसे मुकर रहा है. इसी तरह सेंटर फार मानीटरिंग इंडियन इकानमी ने माना था कि नोटबंदी से 15 लाख नौकरियां गई थीं. सरकार ऐसे तमाम आंकड़ों को झूठा बता रही है. सरकार दावा कर रही है कि वह 2022 तक किसानों की आय दोगुनी कर देगी. जबकि मौजूदा स्थिति को देखते हुए ऐसा संभव ही नहीं लगता. ऐसा तभी हो सकता है जब चार साल तक खेती की वार्षिक विकास दर 13 प्रतिशत से ऊपर रहे. 
वरिष्ठ पत्रकार और खेती के विशेषज्ञ पी साईनाथ ने एक इंटरव्यू में कहा है कि महाराष्ट्र, उत्तरी कर्नाटक, विदर्भ और तेलंगाना के किसान बुरी तरह से तबाह हुए हैं. वे बच्चों की फीस नहीं दे पा रहे हैं. उनके बच्चे स्कूल छोड़कर वापस लौट रहे हैं.यह पूछे जाने पर कि कांग्रेस के शासन में तो किसान बहुत आत्महत्याएं कर रहे थे लेकिन अब तो वह स्थिति ठहर गई है, उन्होंने कहा कि सरकार नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े जारी नहीं करती. बीच में उसे पुलिस रिसर्च विभाग के साथ मर्ज कर दिया था. अब फिर डिमर्ज किया गया है. लेकिन आंकड़े अभी जारी नहीं हुए हैं. 
साईनाथ ने कहा,   सरकार स्वामीनाथन समिति की रिपोर्ट लागू करने को तैयार नहीं है. वह या तो ए-2 फार्मूला मान रही है या ए-2 और एफएल मान रही है. जबकि सीओपी-2 दिया जाना चाहिए. सीओपी-2 वह फार्मूला है जिसके तहत किसान को लागत का 50 फीसदी ज्यादा दिया जाना प्रस्तावित है. उन्होंने फसल बीमा की भी आलोचना की और कहा कि कैग ने भी इस पर सवाल उठाए हैं.  फोटो -साभार  
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