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अजवायन की रोटी

अरुण कुमार पानीबाबा 

आज की विडंबना है कि समस्या चाहे स्थानीय हो हम यथासंभव उसका त्वरितगति से अंतर्राष्ट्रीयकरण कर देते हैं. किसी भी तरह का समाधान निकालने की आवश्यकता से बिल्कुल बच कर निकल जाते हैं.इस समय विश्व आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है, और हम इस दुनिया का हिस्सा हैं तो संकट की आंख से कैसे बच सकते हैं? इसलिए सत्तासीन वर्ग के लिए समाधान की कोई जिम्मेदारी बनती ही नहीं. जब कभी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समाधान होगा तब हमारी परिस्थिति भी सुधर जाएगी.
 
पिछले डेढ़-दो महीनों से मलेरिया और उत्तर भारत के कुछ शहरी क्षेत्रों से डेंगू के चिंताजनक समाचार सुनने को मिल रहे हैं. मृत्युदर के आंकड़े लगातार बढ़ रहे हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो भी समाधान उपलब्ध हैं, वह महंगा तो बहुत है और कारगर उतना है नहीं. सत्ताभोगी वर्ग के लिए तो इस बीमारी से बचाव के लिए अंतर्राष्ट्रीय समाधान उपलब्ध है. और अगर नहीं है तो किसी तरह जुटाया जा सकता है. सवाल यह है वह प्रजा क्या करें जो सत्तासीन वर्ग की कृपा से वंचित है. अस्पताल में दाखिला करीब असंभव ही है. ऐसा बताया जाता है सल्तनत काल में उत्तर भारत में अकाल की घटनाएं होने लगी थीं. तब फिरोज़ तुगलक ने स्थाई सिंचाई के लिए शिवालिक की तराई से एक नहर निकाली थी. ऐसा कहा जाता है कि हरियाणा-पंजाब के जिस क्षेत्र में सिंचाई उपलब्ध कराई गई, उस इलाके में अन्य दुष्प्रभाव के साथ-साथ कालाजार का भी अतिक्रमण हुआ था. तब बतौर समाधान प्रजा और राजा ने संयुक्त निर्णय किया था कि फिरोज नहर को दफनाना ही स्थाई समाधान है. ऐसी मान्यता है कि फिरोज़पुर नाम की बस्ती उसी नहर के अंतिम छोर पर बसी थी. फिरोजपुर अब बड़ा शहर है. लेकिन उस नहर के कहीं कोई अवशेष आमतौर पर देखने सुनने में नहीं आते.
 
अंग्रेजी राज की एक खास उपलब्धि यह भी है कि स्थानीय इतिहास की परंपरा ही खत्म हो गई और अभी गुलाम सोच से मुक्ति की तो चर्चा भी शुरू नहीं हुई है. इसके बावजूद स्थानीय परंपराएं बड़े पैमाने पर बची हैं. हरियाणा, हिसार, राजस्थान के ढूंढणा (जयपुर) से लेकर मारवाड़ के उत्तरी पश्चिमी छोरों तक (बीकानेर, जैसलमेर तक) हमें भोजन की ऐसी अनेक परंपराएं मिलती है जो मौसमी बीमारियों का समाधान तो हैं ही मगर अंतर्राष्ट्रीय महंगाई की मार से बचाने में भी मददगार सिद्ध हो सकती हैं. एक नुस्खा दाना मेथी की सब्जी का है. सब्जी बनाने से तीन दिन पहले 4-5 सदस्यों के परिवार के लिए एक छोटी कटोरी (50-75 ग्राम) मेथी अच्छी तरह धोकर पानी में भिगो दीजिए. परिवार में जिस सदस्य (बुजुर्ग) के घुटने दर्द करते हों अगली सुबह उन्हें मेथी का पानी पिला दीजिए. दाना मेथी को गीले कपड़ों में बांधकर लीटका दीजिए. बीच-बीच में दाना मेथी धो-धोकर पानी का उपयोग करते रहें. चौथी सुबह तक मेथी पूरी तरह अंकुरित हो जाएगी.
 
अंकुरित मेथी को दो बड़े चम्मच ताजे तिल तेल में एक बड़ी चम्मच अजवाइन तड़का करके सब्जी की तरह सारी पत्तियों में छौंक दीजिए. सब्जी चढ़ाने से कुछ घंटे पहले 25 ग्राम साबुत लाल मिर्च (बीज झड़ी) और 25-25 ग्राम साबुत सौंफ व धनिया, 50 ग्राम सुखी कचरी, 25 ग्राम अमचुर पानी में भिगो कर रखिये और सब्जी के साथ चढ़ा दीजिए. सब कुछ गलने लगे तो लकड़ी के सोंटे से कूटकर उसे बारिक बना लें. नमक स्वादानुसार डालें. महीने में चार-पांच बार इस साल का उपयोग करेंगे तो अनुभव से जान लेंगे आपकी रोग प्रतिरोधक शक्ति कायम है.
 
ठीक इसी तरह दालें भी साबुत अंकुरित करके खाना शुरु करें. बनाने में ईंधन की बचत होगी और प्रोटीन और आवश्यक खनिज उपलब्ध भी होंगे और पचेंगे भी और दाम की बचत होगी.मलेरिया, डेंगू, मियादी बुखार (टाइफाइड) की संयुक्त महामारी का समाचार गंभीर चिंता का विषय है. भादो शुक्ल चतुर्थी को समूचा देश गणपति (गणेश चतुर्थी) का त्योहार मनाता है. उससे एक दिन पहले जो तृतीय होती है, उस दिन हरियाणा, पंजाब, राजस्थान का जैन संप्रदाय मात्र अपनी प्रथा के अनुसार ‘रोटतीज’ मनाता है. हमें ऐसा सूझ रहा है कि ‘रोटतीज’ का विशेष महत्व बरसाती बीमारियों के इलाज का है.
 
‘रोटतीज’ नाम से ही स्पष्ट है कि उत्सव का अकेला व्यंजन एक विशिष्ट रोट यानी भरपूर अजवाइन डालकर हाथ पिसे मोटे आटे की एक सेंटीमीटर मोटी रोटी. पूरे परिवार के लिए एक सेर/किलो आटा गूथें तो 200 ग्राम आजवाइन और स्वाद के हिसाब से सेंधा नमक मिलाकर, डेढ़ सौ ग्राम तिल का तेल या शुद्ध घी का मोयन डालें. आटा काफी देर तक भिगोकर मुलायम गूंथ लें, मोटी रोटी मिट्टी के तवे पर देर तक सेंकने के बाद कच्चे कोयले की आंख पर खस्ता होने तक उलटते-पलटते रहें. गरम-गरम परोसेंगे. एक रोटी छंटाक भर घी में चूर कर बुरा और नमक-जीरे के दही के साथ खाएंगे. असंभव न हो तो तोरी का रायता बना लें- यानी तोरी उबालकर दही में डालें.
बेलने के बाद रोटी के किनारे माठ की तरह हाथ से बांधने होते हैं. हाथ की चक्की से अपरिचित हैं तो चक्की वाले के यहां से बेढमी का आटा या दलिये का पिसा ले लें. इस नुस्खे में मोटा आटा, उचित मात्रा में अजवाइन और पर्याप्त सिंकाई तीन ही सूत्र हैं. और यह प्रयास तो सबको मिलकर करना होगा कि देश फिर गौ-सेवा, गौरस, गौ-घृत की दिशा में अग्रसर हो.मलेरिया-डेंगू से बचने के लिए तुलसी और लेमन ग्रास (ज्वर हर बूटी) की चाय का नियमित सेवन अवश्य करें.
 
 
 
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