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सपा-बसपा गठबंधन पर उठे सवाल

अंबरीश कुमार 

लखनऊ .उत्तर प्रदेश की राजनीति पर नजर रखने वाले किसी भी राजनैतिक विशेषग्य से अगर यह पूछे कि प्रदेश में सपा बसपा का गठबंधन होगा या नहीं तो वह साफ़ जवाब नहीं दे पाएगा .इन दोनों पार्टी के किसी रणनीतिकार से यही सवाल पूछे तो वह भी साफ़ जवाब नहीं देगा .इंतजार करने को कहेगा .इस चक्कर में सपा और बसपा के लोकसभा उम्मीदवारों की हालत खराब हो गई है .सपा बसपा मिलकर लड़ेंगे तो भी करीब करीब चालीस चालीस सीट पर उम्मीदवार उतारेंगे ही .पर अभी तक किसी भी उम्मीदवार को यह नहीं पता हैं कि उसे चुनाव लड़ना है या नहीं .ये उन उम्मीदवारों की बात हो रही है जो पिछले लोकसभा चुनाव में दूसरे नंबर पर थे .ये तैयारी क्या करेंगे जब चुनाव लड़ना तय ही नहीं है .जानकारी के मुताबिक सपा और बसपा के ज्यादातर लोकसभा उम्मीदवारों की यह स्थिति है .ऐसे में वे चुनावी तैयारी में भी पिछड़ रहे हैं . भाजपा अगड़ा पिछड़ा से लेकर कुंभ तक के राजनैतिक सम्मलेन कर माहौल बना रही है .वैसे भी पार्टी के कुछ रणनीतिकार मानते हैं कि ऐन वक्त पर मजहबी गोलबंदी हो गई तो विकास धरा रह जाता है और लोग धरम करम के नाम पर वोट दे देते हैं .इसलिए वे बेफिक्र भी हैं .पर उनसे ज्यादा बेफिक्र सपा और बसपा का नेतृत्व  नजर आता है .पिछले लोकसभा चुनाव में बसपा का खाता ही नहीं खुला और सपा का सिर्फ परिवार जीता था .इस बार माहौल बदल रहा है .राष्ट्रीय राजनीति में मोदी बचाव की मुद्रा में है और भाजपा के अफ़वाह तंत्र ने जिन राहुल गांधी को पप्पू बना रखा था वह हमलावर हैं .तीन राज्य जीत कर राहुल गांधी ने सीधी चुनौती दी है भाजपा को .सपा और बसपा दोनों ने इन तीनो राज्यों में अपना राजनैतिक बचपना दिखाया और कांग्रेस को निपटाने के चक्कर में खुद निपट गए .वर्ना दर्जन भर से ज्यादा सीटें सिर्फ मध्य प्रदेश में इन दोनों दलों को मिलती .
इन दोनों दलों की मौजूदा राजनीति कोई भी नहीं समझ पा रहा है . राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक विपक्षी एका की किसी भी कोशिश में इनका शीर्ष नेतृत्व शामिल नहीं होता .किसी भी राष्ट्रीय मुद्दे पर ये सत्तारूढ़ दल का विरोध करते नजर नहीं आते .रफाल के मुद्दे को उदाहरण के रूप में लें .या तो ये कोई टिपण्णी नहीं करेंगे या फिर ऐसी जलेबीनुमा टिपण्णी करेंगे जो किसी के समझ में न आए .मायावती की कोई टिपण्णी तो मिलेगी भी नहीं .सारा देश कह रहा है कि सपा बसपा गठबंधन हुआ तो भाजपा साफ़ हो जाएगी .पर क्या कभी मायावती की कोई टिपण्णी इस बारे में सुनी है .कभी मायावती और अखिलेश यादव की कोई साझा प्रेस कांफ्रेंस या साझा चुनावी अभियान देखा है .कुल एक फोटो है इन दोनों नेताओं की .उसी फोटो के आधार पर नेता कार्यकर्त्ता कुछ उम्मीद लगाएं हैं .पर दोनों पार्टियों के पूर्व सांसद या विधायक से बात कर लें तो पता चलेगा वे कितना निराश हैं .पूर्वांचल के एक उम्मीदवार जो कुछ हजार वोट से हारे थे ,बताया कि अभी तक पार्टी ने उनसे चुनाव की तैयारी के लिए नहीं कहा है .अब वे क्या करें .कुछ उम्मीदवार तो ऐसे हैं जो गठबंधन हुआ तो ही लड़ेंगे वर्ना नहीं लड़ेंगे .जानकार बताते हैं कि अभी भी कुछ नेता सीबीआई ओ लेकर केंद्र के दबाव में हैं .वह सीबीआई जिसका तीन महीने से कोई सक्षम मुखिया ही नहीं है .वह सीबीआई जिसका उप मुखिया आए दिन जमानत लेता रहता है .उस सीबीआई से अगर उत्तर प्रदेश के दिग्गज नेता डर जाएं तो ये क्या राजनीति करेंगे .फिर ये गठबंधन करेंगे या नहीं यह भी तय नहीं .और एक तथ्य ध्यान रखे कांग्रेस के मौजूदा अध्यक्ष राहुल गांधी जब अध्यक्ष नहीं बने थे तब वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सपा और बसपा के बराबर लाकर खड़ा कर चुकें हैं .आज के राहुल गांधी अगर इसी अंदाज में चलते रहे तो क्षेत्रीय नेताओं पर भारी पड़ सकते हैं .वजह वे सीधे सत्तारूढ़ दल के नेतृत्व से टकरा रहे हैं .और उत्तर प्रदेश के शीर्ष नेता गौतमबुद्ध नगर से आगे ही नहीं बढ़ रहे .ऐसे में कांग्रेस को वे अपनी ठोस जमीन भी दे देंगे . 
 
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