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नेहरु परिवार, तब और अब

के विक्रम राव 

प्रियंका वाड्रा जब अपने पति राबर्ट के साथ जामनगर हाउस- स्थित प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) गईं थीं तो वे पुराने दिन याद आ गये जब स्वाधीनता-सेनानी, कांग्रेस के सिपाही जवाहरलाल नेहरु, उनकी बहन विजयलक्ष्मी पंडित, जीजा रंजीत पंडित आदि ब्रिटिश जेल ले जाये जाते थे. आज वाड्रा दम्पति आर्थिक अपराधों (काला धनशोधन, अकूत संपत्ति बटोरना, फर्जीवाड़ा आदि) के कारण पुलिसिया जाँच के दायरे में हैं. अग्रिम जमानत की अर्जी पर राबर्ट वाड्रा को राजस्थान उच्च न्यायालय ने निर्दिष्ट किया कि वे जाँच में सहयोग करें. दिल्ली की एक अदालत का भी उन्हें ऐसा ही आदेश है. न्यायिक प्रक्रिया अभी तक तो निष्पक्ष है. चाहकर भी मोदी सरकार उसे प्रभावित नहीं कर सकती. संभव होता तो यह सरकार जरूर ऐसा कर बैठती. आखिर शत्रुता सियासी जो है. नरेंद्र मोदी और अमित शाह के प्रति भी तो सोनिया-मनमोहन सरकार ने अपार कृपादृष्टि की थी!
पर प्रियंका वाड्रा गांधी का बयान (कि “दुनिया जानती है कि परिवार को क्यों तंग किया जा रहा है)” सत्य से परे है. एक संभावित प्रधानमन्त्री की बहन को ऐसा गैरजिम्मेदाराना बयान देने से बचना चाहिये था. मसलन नेशनल हेराल्ड घोटाले के मामले में उनकी माता और भाई को जमानत पर रिहा करने में दिल्ली उच्च न्यायालय पर मोदी सरकार का कोई दबाव कदापि नहीं था. धन उगाही करी परिवार ने, तो उसे खामियाजा भी भुगतना पड़ेगा ही .
अब राबर्ट वाड्रा ने लन्दन में आलीशान भवन खरीदे, बीकानेर और हरियाणा में भू-संपत्ति अर्जित की, अन्य धनराशियाँ उनके खाते में पायी गईं, तो यह सब कानूनी प्रक्रिया के तहत तफ्तीश के दायरे में है. यदि यह आरोप भाजपायी प्रयास के फलस्वरूप है तो वह निराधार सिद्ध होगा और वाड्रा निर्दोष साबित जायेंगे. मगर यह कहना कि राजनीतिक कारणों से उन्हें फंसाया गया है तो यह बहाना हर भ्रष्ट राजनेता आमतौर पर बनाता है. राबर्ट वाड्रा का चन्द वर्षों में ही सत्तासीन परिवार से बहू पाकर अपार धन अर्जित करना संदेह के घेरे में तो आयेगा ही. मुरादाबाद के एक सामान्य पीतल व्यापारी का पुत्र राबर्ट वाड्रा आज अरबपति हो जाय तो मानना पड़ेगा कि उनके पास अलादीन का चिराग है, अथवा उसे हारून का खजाना मिल गया है या फिर दहेज में विशाल संपत्ति मिली होगी. 
मगर एक तारीफ तो प्रियंका वाड्रा की करनी होगी. माँ द्वारा मनोनीत कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने बहन को महासचिव नामित किया तो कौटुम्बिक परम्परा निभाई. तब 1929 में पिता मोतीलाल नेहरू ने कांग्रेस अध्यक्ष पद का मुकुट पुत्र जवाहरलाल नेहरु के सर पर रख दिया था. पार्टी पदाधिकारी के नाते अपना पहला सार्वजानिक कार्य प्रियंका ने किया कि वे अपने अभियुक्त पति को ईडी की पेशी में पहुँचाने जामनगर हाउस खुद गयीं. पतिव्रत धर्म बखूबी निभाया. यह काफी हद तक सुखद और धर्मपारायण लगा. उनकी दादी और दादा दिल्ली में रहकर भी सहवास नहीं करते थे. दादी मायके (तीन मूर्ति भवन) में थीं तो दादा अपने सांसद फ्लैट में. दोनों के संवाद या सम्बन्ध भी अनजाने रहे. यह विषय सर्वविदित है. 
अर्थात् प्रियंका ने इंदिरा गांधी से बेहतर पत्नी होने की भूमिका निभाई. यह श्लाघ्य है. अब तो दोनों की सूरत में भी लोग साम्य खोजते हैं. सिलसिला पुराना रहा कि इंदिरा गांधी भी दिल्ली पुलिस की कैद और तिहाड़ जेल में संसदीय मर्यादा को भंग करने के दंडस्वरुप रहीं. प्रियंका के चाचा (संजय गांधी) भी अदालत का सरेआम मखौल उड़ाते रहे. कानून में इसे खानदानी अपराध-प्रवृत्ति कहा जायेगा.
एक बात गमनीय है कि जो भी राजनेता आर्थिक जुर्म जैसे गबन, जालसाजी, राजकोष की लूट आदि में जेल जाता है तो वह पुलिस की बस पर सवार होकर जिस स्टाइल में अपने लगुओं-भगुओं का अभिवादन स्वीकार करता है, (उदाहरणार्थ लालू यादव) उससे लगता है कि मानो कोई स्वतंत्रता सेनानी राष्ट्रप्रेम के अपराध में कैद हुआ हो. शायद युगधर्म का यही नया रूप हो. 
एक सादृश्य घटना याद आई, जब मैंने जाना कि युवा कांग्रेसी लोग प्रियंकापति के समर्थन में नारा लगा रहे थे, “राबर्ट तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं.” पहले कभी नहीं जाना गया कि वाड्रा दंपत्ति की जद्दोजहद अवैध संपत्ति अर्जित करने हेतु है या जनहित में ! हमलोगों को इमर्जेंसी में पुलिस बख्तरबंद बसों में तिहाड़ जेल से हथकड़ी में तीस हजारी अदालत ले जाया जाता था. हम सब (जार्ज फ़र्नान्डिस, कवि कमलेश, विजय नारायण सिंह आदि) भी नारा गुंजाते थे कि “इंदिरा तेरी जेल अदालत देखा है, और देखेंगे” तथा “दम है कितना दमन में तेरे” आदि. मगर ये नारे तानाशाही के विरुद्ध थे न कि आर्थिक जुर्म के पक्ष में.
 
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