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पीएमओ ने रक्षा मंत्रालय को भी ठेंगा दिखाया

संजय कुमार सिंह 

नई दिल्ली .द हिन्दू अखबार में आज एन राम की खबर का शीर्षक है, रफाल सौदे में प्रधानमंत्री कार्यालय की भूमिका पर रक्षा मंत्रालय ने एतराज किया था. एन राम ने ट्वीटर पर जो खबर शेयर की है उसका इंट्रो है, फ्रेंच पक्ष ने पीएमओ की कोशिशों का फायदा उठाया और इससे भारतीय टीम की स्थिति कमजोर हुई. इस खबर से रफाल सौदे में प्रधानमंत्री क भूमिका बिल्कुल साफ हो जाती है और इसपर राहुल गांधी के आरोपों की भी पुष्टि हो गई है. वैसे तो राहुल गांधी इस मामले में लंबे समय से सीधा सवाल पूछते रहे हैं और हां या ना में जवाब देने के लिए कहते रहे हैं. पर कोई जवाब नहीं आया और मूल मुद्दे को भटकाने की कोशिशें भी खूब हुईं. अभी तक हिन्दी अखबारों में यह मुद्दा नहीं बना है. 
खबर के मुताबिक, रफाल पर जब सौदेबाजी शिखर पर थी तो रक्षा मंत्रालय ने पीएमओ द्वारा समानांतर सौदेबाजी पर सख्त एतराज किया था और कहा था कि इससे रक्षा मंत्रालय और भारतीय टीम की स्थिति कमजोर हुई है. 24 नवंबर 2015 के रक्षा मंत्रालय के इस आशय के नोट के जरिए उस समय के रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर  का ध्यान खींचने की कोशिश की गई थी. इस नोट में कहा गया था कि प्रधानमंत्री कार्यालय को अगर सौदे के नतीजे पर भरोसा नहीं है तो प्रधानमंत्री कार्यालय उपयुक्त स्तर पर इस मामले में संशोधित शर्तों के तहत चर्चा कर सकता है. 
अखबार ने लिखा है कि अक्तूबर 2018 में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि रफाल विमान से संबंधित सौदा सात सदस्यों की टीम ने किया था और इसका नेतृत्व वायुसेना के उप प्रमुख (डिप्टी चीफ) कर रहे थे. इसमें प्रधानमंत्री कार्यालय की किसी भूमिका का कोई उल्लेख नहीं है. हालांकि, हिन्दू ने लिखा है कि उसके पास उपलब्ध आधिकारिक दस्तावेज बताते हैं कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने जो स्थिति बनाई थी वह रक्षा मंत्रालय और वार्ता करने वाली टीम के स्टैंड के उलट थी. उस समय के रक्षा सचिव जी मोहन कुमार ने यह टिप्पणी अपने हाथ से की है. 
अखबार के मुताबिक उन्होंने लिखा था, रक्षा मंत्री कृपया देखें. यह अपेक्षा की जाती है कि पीएमओ ऐसी चर्चा से बचे क्योंकि इससे वार्ता करने की हमारी स्थिति गंभीरता से कमजोर होती है. रक्षा सचिव के इस विरोध को 24 नवंबर 2015 के एक नोट में दर्ज किया गया था. इसे एसके शर्मा डिप्टी सेक्रेट्री (एयर-टू) ने तैयार किया था और दूसरे अधिकारियों ने इसकी पुष्टि की थी. अखबार ने आगे लिखा है, नए रफाल सौदे की घोषणा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अप्रैल 2015 में की थी जिसका पहले की लंबी सौदेबाजी के बाद हुए करार से मामूली मेल था. इसके बाद 2016 के गणतंत्र दिवस पर जब फ्रांस के उस समय के प्रेसिडेंट फ्रांक्वा ओलांदे भारत आए थे तब करार पर दस्तखत हुए थे. 36 रफाल विमानों के लिए दोनों देशों की सरकार के बीच आखिरकार 23 सितंबर 2016 को दस्तखत हुए थे.     
रक्षा मंत्रालय के नोट के मुताबिक पीएमओ द्वारा चलाई जा रही समानांतर वार्ता का पता मंत्रालय को तब चला जब फ्रेंच टीम के प्रमुख जनरल स्टीफन रेब की 23 अक्तूबर 2015 की चिट्ठी मिली. इसमें पीएमओ में संयुक्त सचिव जावेद अशरफ और फ्रांस के रक्षा मंत्री के डिप्लोमैटिक सलाहकार श्री लुइस वैस्सी के बीच फोन पर हुई वार्ता का जिक्र था. रक्षा मंत्रालय ने इस पत्र की जानकारी पीएमओ को दी भारतीय टीम के प्रमुख एसबीपी सिन्हा ने भी इस बारे में श्री अशरफ को पत्र लिखा. अपने जवाब में श्री अशरफ ने माना कि उनकी बात हुई थी और जनरल रेब के पत्र में जो मुद्दे उठाए गए हैं उसपर चर्चा हुई थी. 
आपको याद होगा, और अखबार ने भी याद दिलाया है कि सितंबर 2018 में राष्ट्रपति ओलांदे ने कहा था कि रिलायंस समूह का नाम नए फार्मूला के भाग के रूप में आया था और इस संबंध में मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद निर्णय किया था. सब जानते हैं कि यह अनिल अंबानी के स्वामित्व वाले रिलायंस डिफेंस के बारे में था.    
 
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