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संघ वालों मोदी हटाओ ,हिंदू बचाओ

हरि शंकर व्यास

संभव है अपनी गलतफहमी हो लेकिन मेरा विश्वास है कि इंसान अंततः अनुभव में भविष्य का फैसला लेता है. मैं क्यों नरेंद्र मोदी के साठ महीने के राज पर आज प्रायश्चित मुद्रा में हूं? इसलिए क्योंकि 40 साल की पत्रकारिता में राष्ट्र-राज्य के पिछले 55 महीने में झूठ, फर्जी शोर और तमाशों के अनुभव ने मुझे यह खतरा समझाया है कि यदि मोदी दोबारा प्रधानमंत्री बने तो भारत कही जिंब्बावे, सीरिया या वेनेजुएला, सूडान का ऐसा मिक्स न बने कि 15-20 साल बाद इस देश के 150 करोड़ लोगों को पृथ्वी का सर्वाधिक शापित माना जाए. अब इतनी दूर की सोचना, अंतरदृष्टि, सभ्यताओं के संर्घष के वैश्विक लक्षणों की ऐसे थाह ले सकना भला औसत हिंदू बुद्धि के लिए कैसे संभव है? बावजूद इसके हिंदू हित की बात करने वाले लोगों को छोटे-छोटे अनुभवों के तात्कालिक मायने तो बूझने चाहिए. इनके दिल-दिमाग में भी अनुभव बोलता हुआ होना चाहिए. पिछले 55 महीने के अनुभव में समझ का इतना अहसास तो बने कि नरेंद्र मोदी ने भारत राष्ट्र, उसकी आर्थिकी, उसके लोकतंत्र, उसकी संस्थाओं, उसकी राजनीति, उसके नैरेटिव- बौद्धिकता, उसके सैन्य बल, उसके समाज- सौहार्दता को जैसा जर्जर बनाया है तो यदि वे दोबारा प्रधानमंत्री बने तो आने वाला वक्त ज्यादा (जीत से अधिक अंहकार, ज्यादा मूर्खताओं के चलते) सत्यानाशी होगा.
 
सोचें ऐसा यदि अगले 5-10-15 साल चले, चुनाव स्थायी तौर पर देशद्रोही बनाम देशभक्त, हिंदू बनाम मुस्लिम वाली पानीपत की तीसरी, चौथी, पांचवी लड़ाई में कन्वर्ट होता रहा तो क्या होगा? यह बेसिक सवाल है मगर क्या यह देश, समाज के अस्तित्व से नाता लिए हुए नहीं है? जान लें तब मुमकिन है कि दस-बीस सालों बाद दूरगामी परिणाम वहीं निकलें, जिसका असंभव सपना 1940 में मोहम्मद अली जिन्ना ने देखा था. हां, सनद रहे एक अंग्रेज को इंटरव्यू में जिन्ना का कहा यह वाक्य – मैं हर जिले में, हर शहर में, हर गांव में पाकिस्तान चाहता हूं. यह डरावनी कल्पना है लेकिन इसके अलावा कोई चारा नहीं है (इस पर विस्तार से फिर कभी आगे). 
 
अब आरएसएस या हिंदुवादी इतना सोचें, संभव नहीं. वे सोचने की नहीं, बल्कि संगठन शक्ति, हवा में लट्ठ चलाने की अपूर्वता में जीते हैं! बावजूद इसके मोहन भागवत, उनके पदाधिकारी और गौरक्षा, धर्मादा जैसे संस्कारों वाले सामान्य हिंदू, बनियों-ब्राह्मणों में तो उठते-बैठते हैम. तब क्यों नहीं इनके दिल-दिमाग में यह अनुभव बोल रहा है कि नोटबंदी से देश बरबाद हुआ है. छोटे-लघु कारोबारियों से ले कर बेरोजगार, परेशान हुए लोगों की बरबादी के दस तरह के अनुभव हैं. न यह छिपा हुआ है कि किसान की कैसी और कितनी बरबादी हुई? जीएसटी को लेकर सोचा क्या था और उसे झेलना कैसे पड़ा? सोचा था कि मोदी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे हैं तो आते ही पाकिस्तान, जम्मू-कश्मीर के मामले में देश की रीति-नीति बदली मिलेगी. लेकिन हुआ क्या? पहले ही दिन, शपथ के दिन नवाज शरीफ को दिल्ली बुला कर उनको चाय पिलाई. अपने को अंतरराष्ट्रीय नेता दिखला हिंदुओं को मूर्ख बनाने के प्रपंची तमाशों का ऐसा श्रीगणेश किया कि तमाशा-दर-तमाशा का सिलसिला 55 महीने में दिन-प्रतिदिन लगातार है!
 
अनुभव बता रहा है कि कभी नवाज शरीफ को दिल्ली बुला गले लगाने, फिर एक दिन अचानक बिना न्योते के लाहौर जा कर उनके घर पकौड़े खाने, कश्मीर में जा कर पहले इंसानियत की बात करने, अलगाववादियों के सुर से सुर मिलाने वाली पीडीपी, मेहबूबा मुफ्ती के साथ साझा सरकार बनाने  और बाद में फर्जी हल्ला बना मेहबूबा सरकार को बरखास्त करने की तमाम घटनाएं तमाशों की भरपूर झांकी हैं. झूठमूठ विश्व नेता बनने और बिना रीति-नीति के खुद भटकने, देश को भटकाने का प्रमाण है. तभी सोचें कि आरएसएस और उसके कार्यकर्ताओं ने 55 महीने में नवाज से मोदी के गले मिलने से ले कर कश्मीरियत,  मेहबूबा के साथ सरकार बनाने के घटना-दर-घटना अनुभव को अपने में कैसे समेटा हुआ होगा? क्या वाह, मोदी वाह के भाव में या इस ग्लानि में कि क्या सोचा था और कैसी नौटंकी हुई?
 
मतलब अनुभव की हकीकत में नरेंद्र मोदी को ले कर आंखे खुलनी चाहिए या आंखों पर यह पट्टी रहनी चाहिए कि सिर्फ नरेंद्र मोदी ही योग्य हैं? जैसे आम, बिना पढ़ा-लिखा व्यक्ति प्रचार-प्रोपेगेंडा में बहका है कि मोदी को वोट नहीं दिया तो हिंदू व 130 करोड़ लोगों का देश खत्म हो जाएगा तो वैसे ही अंधविश्वास में क्या मोहन भागवत, संघ भी जीयें या प्रायश्चित में बैचेन बनें? 
 
संदेह नहीं कि आरएसएस के लिए गौरव की बात है जो उसका एक प्रचारक भारत का प्रधानमंत्री है. पर उस प्रचारक प्रधानमंत्री से संघ को 60 महीने के अनुभव में जम्मू-कश्मीर, अनुच्छेद 370, 35 ए का धोखा क्या नहीं मिला? क्या नहीं लगा कि अलगाववादी सोच वाली पार्टी के साथ मोदी ने सत्ताखोरी कराई? पाकिस्तान के साथ तमाशेबाजी हुई? आंतकियों के बार-बार हमले हैं तो कश्मीर घाटी में हालातों के ज्यादा बेकाबू होने की हकीकत भी है. अनुभव की इतनी निर्मम सच्चाईयां तब भी संघ और उसके हिंदू न सोचें कि बहुत हुए साठ महीने अब किसी और हिंदू नेता, प्रचारक या नितिन गडकरी, राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज, शिवराज सिंह, रमन सिंह आदि में दूसरे को मौका मिले! मई 2014 के ऐतिहासिक जनादेश के बाद भी यदि आरएसएस और उसके अन्य संगठन अपने प्रचारक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मूल एजेंडे का एक भी काम नहीं करा पाए हैं तो संघ को क्या हाथ खड़े कर मोदी से  नहीं कहना चाहिए कि बस बहुत हुआ. अब आप रिटायर हों और भाजपा की दूसरी बंद मुट्ठी को मौका मिलेगा.
 
पचपन महीने का अनुभव बोल रहा है कि स्वदेशी संगठन वाले पांच साल रोते रहे और विदेशी, महाबली अमेरिकी कंपनियां मजे से भारत आ कर ऑनलाइन व्यापार, खुदरा कारोबार सबमें छा गईं. किसान संघ वाले रोते रहे लेकिन उनके कहने के अनुसार काम नहीं हुआ. ऐसे ही मजदूर संघ वाले छंटनी, बेरोजगारी समस्याओं पर स्यापा करते रहे लेकिन मोदी-शाह ने चिंता नहीं की. भक्त हिंदुवादी गोकशी, गोहत्या के मामले में बावले हो कर मॉब लिंचिंग में उतर आए, पूरी दुनिया में हिंदुओं की बदनामी करवाई लेकिन मोदी-शाह में हिम्मत नहीं कि जब प्रदेशों में अलग-अलग कानून बन रहे हैं तो अखिल भारतीय गोहत्या पाबंदी कानून क्यों न संसद से पास करवा लिया जाए? विश्व हिंदू परिषद वाले राम मंदिर का हल्ला करते ऱहे, इसके चलते प्रवीण तोगड़िया संगठन से आउट हो गए लेकिन मोदी-शाह वोट मांगने की नौबत आने तक देवालय की जगह शौचालय की जुमलेबाजी करते रहे. 
 
बात यहीं खत्म नहीं होती है. संघ को इस हकीकत से सचमुच कंपकंपाना चाहिए कि मोदी-शाह के राज में हिंदू समाज एकजुट होने के बजाय उलटे बिखरा है. मोदी राज ने हिंदू को जाति में ज्यादा बांटा. मनमोहन के राज में या आजाद भारत के इतिहास की किसी भी सरकार में ऐसा समाज विग्रह (वीपी सिंह के समय में भी नहीं) पहले कभी नहीं हुआ, जितना मोदी राज में हुआ. तभी इतने आरक्षण आंदोलन, फारवर्ड जातियों में धोखे की फील तो दलित-आदिवासी- ओबीसी में ऐसे ऐसे संदेह कि कोई माने या न माने अपना मानना है कि दलित और खास कर दलित नौजवान आज हिंदू धर्म के खिलाफ वह कट्टरता लिए हुए है, जो आजादी के 70 सालों में पहले कभी नहीं दिखी. दलित, आदिवासी ने पांच सालों में अपने को जितना उपेक्षित, प्रताड़ित मान हिंदू धर्म के विरोध में जितना सोचा है वह बहुत चिंताजनक है. 
 
ऐसा भी मोदी-शाह के तमाशों से हुआ. मैंने पहले कभी नहीं सुना लेकिन पहली बार उज्जैन के कुंभ में मैने अनुभव किया कि हिंदू धर्म में साधु भी जाति में बंटा होता है. अमित शाह का दलित साधुओं के साथ कुंभ स्नान का प्रचार अपने लिए सूचना थी कि साधु दलित भी होता है! उससे पहले तक मैंने हमेशा सुना-जाना कि हिंदुओं की सनातनी परंपरा जात न पूछो साधु की है. मगर अमित शाह ने नौटंकी, तमाशे, मैसेजिंग के लिए दलित साधु की अलग जमात बनवा डाली तो योगी आदित्यनाथ ने हनुमानजी को दलित बना डाला. भला हिंदू धर्म में देवी-देवताओं, साधु-संतों का ऐसा जातिकरण इतिहास में पहले कब हुआ जैसा 55 महीने में हुआ?
 
क्या ये गलत तथ्य हैं? क्या ये अनुभव में जमा नहीं होने चाहिए? संघ और उसकी प्रतिनिधि सभा, उसके प्रचारकों, स्वंयसेवकों के लिए क्या यह विचारणीय नहीं होना चाहिए कि उनकी जैसी जो सोच है उस पर उनकी सरकार तमाशा, झूठ-दिखावा करे तो उसकी पूजा करें या विरोध? लेकिन संघ तमाशों, झूठ-दिखावे, फर्जीवाड़े से फिलहाल वैसे ही वशीभूत दिख रहा है, जैसे आम हिंदू है. मोदी-शाह जैसे गुजरात में हिंदू-मुसलमान की पानीपत लड़ाई बना कर संघ को मजूबर करते थे वैसे ही आज फिर पानीपत की तीसरी लड़ाई का अखिल भारतीय हल्ला बना मोहन भागवत और उनके पदाधिकारियों को बांध दे रहे हैं कि लड़ाई हिंदू अस्मिता की है तो मोदी के साथ ही जीना और मरना है.नया इंडिया
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  • भाजपा ने हारी हुई सीटें जदयू को दी
  • तो शत्रुघ्न सिन्हा अब कांग्रेस के साथ
  • प्रियंका गांधी से कौन डर रहा है ?
  • तो अब धरोहरों से मुक्त हुई भाजपा
  • विदेश में तो बज ही गया डंका
  • साढ़े तीन दर्जन दलों की नाव पर सवार हैं मोदी !
  • यह दौर बिना सिर पैर की ख़बरों का भी है
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  • इस अहलुवालिया ने तो हवा ही निकाल दी !
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