जनादेश

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मजबूरी में पलायन होने लगा-शिव कुमार

शिव कुमार

शहर की चकाचोंध ने/ना गांव  को गांव ही रहने दिया/ना शहर ही बन पाये/शहरों में भी जो छोटे मोटे गांव  थे, वे भव्य अट्टालिकाओं एवं  बहुमंजिली इमारतों के नीचे दब गये /उस जमीन का मालिक, जो पैसा मिला उसे अनाप शनाप खर्च कर  जिस कंपनी को जमीन बेची वहाँ का  चौकीदार हो गया /किसी लेखक ने बहुत सुंदर शब्दों में शहर की चकाचौंध का गाँवों में क्या असर पड़ा उसका चित्रण किया है :

 मकान चाहे कच्चे थे,लेकिन रिश्ते सारे सच्चे थे /चारपाई पर बैठते थे,सोफे औऱ डबल बैड आ गये,दूरियां हमारी बढ़ा गये/छतों पर अब ना सोते हैं,बात बतंगड़ अब ना होते है/आंगन में वृक्ष थे ,सांझे सुख दुख थे,दरवाजा खुला रहता था,राही भी आ बैठता था,कव्वे भी कोवते थे,मेहमान आते जाते थे,एक साईकल ही पास थी,फिर भी मेल जोल था,अब गाड़ियों का रेल पेल है,फिर भी मेल जोल नही,पहले गांव स्वामलम्बी होते थे,सारी चीजें गांव में ही उपलब्ध होती थी,जैसे बढ़हि, लोहार, पत्थर गढ़ने वाले श्रमिक,मटके बनाने वाले कुम्हार,चमड़े की मशक बनाने वाले,सब मे मेल जोल था,रिश्ते नाते निभाते थे

एक दूसरे पर वक़्त जरूरत काम आते थे.


पुराने ज़माने में राजा महाराजा किले इमारते बनाने के लिए सारे कामगारों को इकट्ठा कर लेते थे  एवम उनकी सेवाएं लेते थे, वे उनकी रहने खाने एवम समस्त जरूरतों , दवा इत्यादि का खयाल रखते थे, उनके जन्म मरण विवाह इत्यादि अन्य समारोह की पूर्ति करते थे, उनकी समस्त जिम्मेदारियों को राजा स्वयं उठाता था, उनका पलायन कभी नही होने दिया, उनको हमेशा अपने साथ जोड़े रखा, उन्हें वही बसाया , रोजगार उपलब्ध कराया  वे सभी लोग वहां साथ रह कर सुखमय जीवन व्यतीत करते थे.


आज सारे देश से कामगार पलायन कर रहा है, लाखों की संख्या में पैदल चल कर अपने गांव जाना चाहते है, क्योंकि उसका यहाँ रहने का न कोई ठिकाना है ना ही कोई आसरा है , न खाने की कोई सुविधा, पैसा भी पास नही. तो उन्होंने मौत से ठान ली और निकल पड़े, अपने गंतव्य की ओर, पैदल, अपने छोटे से परिवार सहित, नंगे पांव, खाली पेट, और ठान लिया कि अपने गांव ही जाना है, सैकड़ो किलोमीटर की पैदल यात्रा पर निकल पड़े है, तपती धूप, आंधी, नदी नालों की मुश्किलें पार करते. तय कर लिया है कि अगर मरना ही है तो अपनी गांव की मिट्टी में मरें. अगर मरना ही है, तो अपने लोगो के बीच मे ही देह क्यों न त्यागे, इसी निमित्त वो लगातार एवम निरंतर सफर कर रहे है. सर पे बोझा, गोद मे बच्चा, हाथ मे घर का सामान, ये बड़ा दयनीय दृश्य है, 

अगर व्यवस्था चाहती कि इनका पलायन न हो, तो प्रथम लॉक डाउन के मध्य ये कामगार जहाँ थे वही पर उनके रहने खाने की व्यवस्था की जा सकती थी, ये हो नही सका, इसलिए पलायन होने लगा.

एक कर्मवीर ने प्रवासी मजदूर की व्यथा कथा, के संबंध में  एक कवित्व लिखा.

ट्रकों में भरकर आ रहे प्रवासी

ज़िंदा रहे तो फिर से आएंगे बाबू


तुम्हारे शहरों को फिर से आबाद करने, वही मिलेंगे, गंगनचुम्बी इमारतों के नीचे, प्लस्टिक के त्रिपाल से ढकी झुग्गियों में, चौराहे पर अपने औज़ारों के साथ, फैक्ट्रीयों से निकलते हुए काले धुंए जैसे, होटलों  और ढाबो पर खाना बनाप्राप्त किया था लते, बर्तन धोते, हर गली हर नुक्कड़ पर रिक्शा चलाते, पसीनो में तरबतर हो कर तुम्हे तुम्हारी मंजिलों तक पहुंचाते, हर कहीं फिर हम, मिल जायेंगे तुम्हे, पानी पिलाते, गन्ना पेरते, कपड़े धोते, प्रेस करते, सेठ से किराए पर ली हुई रेहड़ी पर समोसे तलते , या पानी पूरी बेचते. पंजाब के हरे भरे लहलहाते खेतों से लोहा मंडी गोविंदगढ़ तक , चाय बागानों से लेकर अनाज मंडियों में माल ढोते हर जगह होंगे हम, 

बस सिर्फ एक मेहरबानी कर दो बाबू हम पर,  इस बार हमें अपने घर पहुंचा दो, घर पर बूढ़ी अम्मा है, जवान बहन है, सुन कर खबर महामारी की वे बहुत हलकान है, बाट जो रहे है सब हमारी, काका काकी ताया ताई, मत रोको हमे बस अब जाने दो,विश्वास हमारा जो शहर वालो से टूट चुका है , उसे वापस लाने में थोड़ा हमे समय दो, हम भी इंसान है तुम्हारी तरह, हमारे तन पर पसीने की गंध के फटे पुराने कपड़े है, तुम्हारे जैसे चमकदार उजले नही, वैसे अब जीने की उम्मीद तो कम है, अगर मर भी गए तो इतना तो हक़ दे दो हमे, अपने ही इलाके की मिट्टी में समा जाने दो, क्यों नही जाने देते हो हमे अपने गांव तुम्हे मुबारक हो तुम्हारा ये चकाचौंध वाला ये शहर, हम को तो हमारी जान से भी ज्यादा प्यार है, भोला भाला गांव हमारा, गांव  मे कुएं का मीठा जल, पीपल बड़ की छांव, चोपाल पर बतियाते, बड़े बूढ़े लोग , पास में अठखेलिया करते बच्चे, कुछ कमाने को निकले थे , आज सब कुछ लुटा कर जा रहे है.मीडिया स्वराज 

(लेखक भारतीय जनता पार्टी  के राज्य सभा सदस्य रहे हैं. वह पूर्व प्रधान मंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी के अभिन्न सहयोगी रहे हैं.)

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