जनादेश

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आचार्य हजारी प्रासाद द्विवेदी

गिप्पी से मिलने आया है बांगड़ू .

आचार्य हजारी प्रासाद द्विवेदी

- प्रणाम

आशीर्वाद के लिए चश्मा दुरुस्त हो , इसके पहले ही सफेद मूछों के नीचे से एक मुस्कुराहट फैल गयी .

-गिप्पी से मिलना था.पंडित जी हंसते हंसते रुक गए - ' सुनती हो ! गिप्पी से मिलने आया है बांगड़ू . '

बस इतने की ही दरकार होती , 'सुनती हो ' तक पहुंचना . गिप्पी मिलें या न मिलें . रविन्द्रपुरी वाले मकान के आंगन में मचिया पर बैठी माँ अब भी घूंघट में रहती हैं . उनकी भाषा वही भोजपुरी . पर समझती कई भाषा है .बैठ.- अम्मा कल वाला कुछ बचा है .

यह कोई नई बात नही होती थी . जिस रात माछ भात बनता दूसरे दिन अल सुबह किसी न किसी बेटे के दोस्त का आमद तय रहता . मां का प्यार सोर्सेबाटा के तीखेपन में मिल कर आंगन को महका जाता . पंडित जी के साथ शांतिनिकेतन की गुरूपल्ली की लंबी रिहाइश ने भाषा , भोजन और बसुधैव कुटुम्बकम तो दिया ही . पंडित जी और मां दोनो जन आजीवन इसे जीते रहे . खुद शाकाहारी रहे लेकिन बच्चों के लिए मां जी ' रन्ना घोरे ' सिलबट्टे पर खस खस और सरसों खुद पिसती रहीं .हमने एक छोटा सा प्रकरण इसलिए सुना दिया कि पंडित जी का लेखन इसी सोच में बड़ा हुआ है . कितनी भी बड़ी दिक्कत आई , पंडित जी डिगे नही , हंस कर उसे ठहाके में ढाल देते थे . एक वाक्या सुन लीजिए

आचार्य जी विश्वविद्यालय के रेक्टर बना दिये गए . रेक्टर विश्व विद्यालय का कुलपति के बाद दूसरे नम्बर का प्रशासनिक ओहदा होता है . एक दिन अपनी मांग को लेकर छात्र नेताओं ने उनका घेराव कर दिया . आचार्य जी ने कभी पुलिस सुरक्षा को पसंद नही किया . छात्र अपनी मांग पर अड़े रहे ,आचार्य जी समझाते रहे. थोड़ी देर में आचार्य जी अपनी कुर्सी से उठे और बोले - हम तुम लोंगो को आशीर्वाद देना चाहता हूं . अचानक आशीर्वाद ? छात्र नेताओं में सन्नाटा पर जिज्ञासा के साथ . एक ने गला ठीक किया और बोला फिर दे दीजिए न . आचार्य जी मुस्कुराये और जोर से बोले - तुम लोग इतना पढ़ लिख लो कि रेक्टर और कुलपति बन जाओ . जोर का ठहाका लगा . छात्र नेताओं ने रेक्टर साहब का पैर छुआ और प्रणाम करके बाहर निकल गए . मानवीय समाज की बहुत अनोखी शख्सियत हिंदी के बटवारे में दर्ज हो गई .

प्रणाम

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