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23 मई के बाद के मसले

 नीरज मनजीत

प्रश्न यह नहीं है कि 23 मई के बाद मोदीजी जाते हैं या आते हैं, प्रश्न यह है कि इन दोनों स्थितियों में भारत देश और देशवासियों से प्यार करने वाले विचारवान लोगों को किन मसलों का सामना करना पड़ेगा ? भारतीय राजनीति के इतिहास में यह पहला आम चुनाव है जब एक प्रधानमंत्री ने अपने महीनों लंबे प्रचार अभियान को, देश की मूल समस्याओं से तकरीबन पूरी तरह कतराते हुए, केवल नकारात्मक मुद्दों पर टिकाए रखा. इन नकारात्मक मुद्दों को उन्होंने खुद गढ़ा और अपनी पार्टी की विचारधारा को भी तिलांजलि दे दी. उनकी पार्टी के ही पुरोधा दीनदयाल उपाध्याय ने कहा था कि आर्थिक विकास का फायदा अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना भाजपा का पहला मक़सद है. लेकिन, मोदीजी ने ऐसी तमाम बातों को भुलाकर अपने अभियान की परिभाषा खुद तय की तथा इस अभियान में उनके साथ एक व्यक्त्ति और था-- अमित शाह. ये दोनों महानुभाव पिछले पाँच वर्षों से देश की राजनीति के केन्द्र में हैं और इन्होंने ही देश की राजनीति को एक तयशुदा दिशा में मोड़ा है. बात-बात में गांधी और नेहरू को कोसनेवाले इन महामानवों को और उनकी इस दिशा को इतिहास में किस तरह याद किया जाएगा, इसका आंकलन तभी हो सकेगा जब मोदीजी सत्ता में नहीं रहेंगे. 


दो साल पहले की बात है. अमित शाह विधानसभा चुनावों में अपनी पार्टी की तैयारी का जायजा लेने रायपुर के दौरे पर आए थे. उन्होंने प्रदेशभर के प्रबुद्धजनों को रायपुर आमंत्रित किया था. मुझे भी बुलाया गया था. इन्हें संबोधित करते हुए अमित शाह ने कांग्रेस के साठ वर्षों के कार्यकाल की खामियों का ब्यौरा देते हुए भाजपा की खूबियों को रेखांकित किया था. उन्होंने उन्होंने मोदी और अपनी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा था कि हम देश की बुनियादी समस्याओं-- गरीबी, बेरोजगारी, खराब शिक्षा-व्यवस्था, बिगड़ी स्वास्थ्य सेवाओं--को हल करते हुए भारत की प्राचीन गौरवशाली विरासत को विश्व समुदाय के सामने रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं. उनकी शब्दावली काफी आकर्षक थी. प्रथम दृष्टया वे एक वैकल्पिक विचारधारा रखते हुए प्रतीत हो रहे थे. उनकी बातों का कुछ मित्रों ने निष्कर्ष निकाला था कि आगामी आम चुनाव में मोदीजी के लिए अगर सबकुछ ठीक न रहा, तो इस स्वघोषित राष्ट्रवाद को वे अपनी कमियों-खामियों को छुपाने के लिए एक आवरण और विपक्ष को दबाने का एक हथियार भी बना सकते हैं. आज हम देख रहे हैं कि यह निष्कर्ष कई गुना ज्यादा खतरनाक अहंकारी रूप से हमारे सामने एक चुनौती के रूप में मौजूद है. इससे भी कहीं ज्यादा भयानक बात यह है कि मीडिया का एक ताकतवर तबका तकरीबन योजनाबद्ध तरीके से इस समूचे परिदृश्य को भस्मासुर बनाने के प्रयोग में शामिल है.


अब यह साफ हो गया है कि मोदीजी और अमित शाह की जोड़ी ने देश की राजनीति को नकारात्मकता की दिशा में मोड़ दिया है. साथ ही उन्होंने पूरी योजना बनाकर विपक्ष के प्रचार अभियान को भी नकारात्मकता की ओर ले जाने की पूरी कोशिश की है, ताकि नेगेटिविटी की इस लड़ाई में वे विजयी होकर निकलें. देश की राजनीति को योजनाबद्ध तरीके से विचारहीनता के दौर में धकेल दिया जाएगा, यह शायद हमने नहीं सोचा था. बहुत से प्रश्न देश की राजनीतिक फ़िज़ां में तैर रहे हैं-- राजनीति अब तक गंभीर विमर्श और आम जनता के हितों के लिए जारी बहस का क्षेत्र रही है, इसे सत्ता बचाए रखने के अंधे खेल में क्यों और कैसे तब्दील कर दिया गया ? वैकल्पिक विचारधारा का दंभ भरने वाली पार्टी को क्या इस जोड़ी ने सारे वरिष्ठजनों को धता बताकर सत्ता लोलुप पार्टी में नहीं बदल दिया है ? क्या अंतिम रूप से यह मान लिया गया है कि घृणा झूठ और छल ही सत्ता में बने रहने के उपाय रह गए हैं ? क्या सत्ता ही सर्वोपरि है और इसे बनाए रखने के लिए 'अकल्पनीय रूप से किसी भी हद तक चले जाना' ही एकमात्र अभीष्ट रह गया है ? प्रश्न और भी हैं, लेकिन देश का बहुसंख्य मतदाता इन सवालों से विमुख किसी और ठिकाने में अपनी मुक्त्ति ढूंढ रहा है. और यही शायद इस तमाम कसरत का उद्देश्य भी था.


नकारात्मकता और भ्रम का विस्तार खड़ा करने के इस पूरे दौर में मीडिया के एक खास तबके के स्टैंड और उसके परिणामों पर नज़र डालना जरूरी है. भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि कुछ न्यूज़ चैनलों ने योजनाबद्ध तरीके से सत्ताधारी पार्टी के साथ मिलकर उसके झूठ को सच में बदलने की कोशिश की है. लगता है कि जिस 'क्रोनी कैपिटलिज्म' को मोदी-शाह की जोड़ी ने पिछले पांच सालों में बढ़ावा दिया है, उसमें इस खास मीडिया की हिस्सेदारी भी तय हो चुकी है. जब तक मोदीजी कामयाबियों की मंजिलें तय कर रहे थे, तब तक सबकुछ दबे-ढंके तरीके से चल रहा था. किंतु, जैसे ही मोदी सरकार की नाकामियां सामने आईं, सत्ता की दीवारें दरकने लगीं और विपक्ष ताकतवर-हमलावर होते दिखा, तो सारे आवरण तोड़कर यह मीडिया मोदीजी के अभियान में कहीं और ज़्यादा हिंसक रूप अख्तियार करके शामिल हो गया. सबसे पहले ऐसे तरीके से युद्धोन्माद फैलाया गया और सारे विपक्ष को राष्ट्रविरोधी ठहराया गया कि इस धुंध में सारे बुनियादी सवाल खो जाएं. उसके बाद मीडिया के इस खास तबके ने पाकिस्तान को युद्ध के लिए उकसाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. साफ है कि युद्ध छिड़ने से जो परिस्थितियां पैदा होतीं, वह उस पार्टी के लिए फायदेमंद हो सकती थीं, जो सामने खड़े चुनाव में अपनी पतली हालत देखकर आत्मविश्वास खो चुकी थी. उसके बाद विपक्ष पर व्यक्तिगत हमले किए गए. चुनाव के आखिरी चरण में राजीव गांधी पर किया गया हमला इसी योजना का अंग था कि कांग्रेस अपना-आपा खोकर कुछ नकारात्मक बयान दे, तो बाकी दिनों का अभियान उन्हीं पर टिका दिया जाए. गांधी परिवार जब उनकी चाल में नहीं फंसा, तो मोदीजी गालियों का पोथा खोलकर बैठ गए, जिनमें से अधिकांश का अविष्कार उन्होंने खुद किया था.

मोदीजी और अमित शाह की जोड़ी यदि सत्ता में नहीं आती है तो हम उम्मीद रख सकते है कि जो विभाजनकारी विध्वंसक विष फैलाया गया है, उसे साफ किया जा सकेगा. और यदि यह जोड़ी सत्ता में लौट आती है तो षड़यंत्रों और छल-प्रपंच की राजनीति का मुकाबला करने के लिए हमें हर वक़्त अपनी आँखें खुली रखनी पड़ेंगी.

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