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बस पर राजनीति और उड़ने की तैयारी !

संजय कुमार सिंह 

देश में संक्रमितों की संख्या जब 500 थी तो चार घंटे की सूचना पर 21 दिन का लॉक डाउन और जब संक्रमितों की संख्या 50,000 हो गई तो उसमें ढील, सरकारी निर्णय की तार्किकता की पोल खोलता है. ताली-थाली बजाने वालों की प्रशंसा करने वाला मीडिया तबलीगी जमात पर तो खूब शोर मचाता है संक्रमितों को कोरोना फैलाने वाला बताता है और खुद के दफ्तर में संक्रमितों को प्रतिबद्ध पेशेवर बनाकर उनका बचाव करता है. कुल मिलाकर, मीडिया वही कर रहा है जो सरकार चाहती है. खुल्लम खुल्ला. ऐसी हालत में स्वास्थ्य मंत्रालय की प्रेस ब्रीफिंग बंद है. हेडलाइन मैनेजमेंट जारी है. गुरुवार के अखबारों इसका असर साफ नजर आ रहा था. उत्तर पूर्व भारत में आया तूफान साधारण नहीं है. दैनिक भास्कर की खबर के अनुसार 12 लोगों की मौत हो चुकी है और पांच हजार घरों को नुकसान हुआ है पर दिल्ली के हिन्दी अखबारों की लीड 25 मई से घरेलू उड़ान शुरू होने की खबर है. निश्चित रूप से यह हेड लाइन मैनेजमेंट का असर है. इससे बस राजनीति में पूरी तरह नंगी हो चुकी डबल इंजन की सरकार काम करती नजर आ रही है. 

दैनिक भास्कर कोबिड-19 और उसके प्रभाव की खबर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छाप रहा है और हिन्दी अखबारों के पहले पन्ने से कोविड राउंड अप (देसी) गायब हो चुका है. मूल खबर छोड़कर प्रचार टॉप बॉक्स में छप रहा है. दैनिक जागरण में सात कॉलम की लीड है, "30 लाख मरीजों के एक साथ इलाज के लिए तैयार भारत". अव्वल तो 135 करोड़ की आबादी में पैदल चलते लाखों लोगों के लिए जब जीरा बराबर इंतजाम है तो यह इंतजाम क्या और कितना होगा यह चर्चा का विषय ही नहीं है. और ऐसा नहीं है कि सरकार ने इसकी कोई विज्ञप्ति जारी की है. खबर कहती है, स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल के अनुसार ..... इस खबर में नहीं बताया गया है कि लव अग्रवाल प्रेस कांफ्रेंस में बोल रहे थे या किसी रैली में. संवाददाता को सड़क पर मिल गए या एक्सक्लूसिव बातचीत के लिए बुलाया था. आगे यह खबर स्वास्थ्य मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी जैसे अनाम सूत्रों के अनुसार है. दावा किया गया है, देश अब कोरोना से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है. जैसे पैदल जाने वाले लोगों के लिए किसी व्यवस्था की जरूरत ही नहीं है या फिर वह 'देश' का काम नहीं हो. इस खबर को इससे ज्यादा झेलना संभव नहीं है. हो सकता है इसमें और भी एक्सक्लूसिव जानकारी हो पर खबर लिखने का भी कोई तरीका होता है और पढ़ने के लिए कुछ न्यूनतम आवश्यकताएं होती हैं पर हिन्दी पत्रकारिता राम नाम सत्य है करते हुए जी रही है.  

हिन्दी के जो सात अखबार मैं देखता हूं उनमें समुद्री तूफान अम्पन (इसपर आगे) की खबर सबमें पहले पन्ने पर है लेकिन लीड सिर्फ दैनिक भास्कर ने बनाया है. 25 मई से उड़ान शुरू होने की खबर भी सबमें पहले पन्ने पर है. इस सरकारी और हेडलाइन मैनेजमेंट वाली खबर को लीड बनाने वाले अखबार हैं - नवोदय टाइम्स, अमर उजाला, नवभारत टाइम्स और हिन्दुस्तान टाइम्स. लेकिन बस राजनीति की खबर दैनिक हिन्दुस्तान और नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर है. राजस्थान पत्रिका में अंदर पेज सात पर होने की सूचना पहले पन्ने पर जरूर है. नवोदय टाइम्स में लीड होने के बावजूद इसका शीर्षक है, उड़िए-उड़िए .... मगर संभल के. इससे पता चलता है कि मामला सीधा नहीं है और एक खासियत तो इसके उपशीर्षक में ही है, हरदीप पुरी (नागरिक उड्डयन मंत्री) ने किया ट्वीट. अगर ट्वीट से लीड बनने लगे चक्रवात से 12 मरने के बावजूद तो आप समझ सकते हैं कि रिपोर्टिंग की क्या स्थिति है और रिपोर्टिंग के बिना अखबार या पत्रकारिता का क्या महत्व है.  

बसों की राजनीति बेहद गंभीर और शर्मनाक है. पर नवोदय टाइम्स को छोड़कर किसी ने इसे पहले पन्ने लायक नहीं माना. नवोदय टाइम्स में शीर्षक है, पॉलिटिक्स में बसों का पहिया पन्चर (पंक्चर होना चाहिए). असल में यह मुद्दा नहीं है कि बसों का क्या हुआ. मुद्दा यह है कि गरीबों को बस नहीं मिली या मिलने दी गई. आजकल किसी के पक्ष में लिखना किसी का समर्थक और दूसरे का विरोधी होना हो गया है. इसलिए अखबारों पर भी ‘निष्पक्ष’ रहने का दबाव है. यह शीर्षक और बाकी उपशीर्षक या हाईलाइट्स इसीलिए हैं. अव्वल तो कोई सरकार के खिलाफ होना नहीं चाहता है, होने नहीं दिया जाता है पर अगर कोई हो तो उसपर निष्पक्ष रहने का ऐसा दबाव डाला जाता है कि हर कोई पत्रकारिता तो क्या खबर भी भूल जा रहा है. सारी प्रतिभा निष्पक्ष शीर्षक में लग रही है. जैसे, हिन्दुस्तान में शीर्षक है, श्रमिकों की मदद पर सियासी खींचतान के बाद बसें वापस (दैनिक हिन्दुस्तान).  

राजस्थान पत्रिका में अंदर के पन्ने पर छपी खबर का शीर्षक भी हेडलाइन मैनजमेंट से प्रभावित लगता है. फ्लैग शीर्षक है, यूपी : कांग्रेस और भाजपा में चलता रहा आरोप-प्रत्यारोप का दौर. मुख्य शीर्षक है, सियासी रार के बीच खाली लौटीं बसें, घर के भीतर ही कांग्रेस पर उठे सवाल. बेशक ये सारी बातें इस खबर से जुड़ी हैं पर मुद्दा यह है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने बसें नहीं चलने दीं, प्रियंका गांधी इसपर गंभीर थीं. एफआईआर के बावजूद जो बसें ठीक थीं उन्हें नहीं चलने देना साधारण नहीं है और मुख्य मुद्दा वही है. पर संतुलन बनाकर रिपोर्टिंग करनी हो तो पत्रकारिता अलग होगी.  

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