गांधी की पाठशाला की तरफ लौटने की ज़रुरत

किसानों को सुरक्षा की गारंटी दे सरकार हर महीने 1000 रुपए देने का वादा पूरा करो कृषि बिल - ड्राफ्ट बनाया वीपी सरकार ने , पेश किया मोदी सरकार ने राजागोपाल पीवी ने उपवास रखा संसद भवन में धरने पर विपक्ष विपक्ष की आवाज सुनी जाएगी, तभी मजबूत होगा लोकतंत्र क्यों किसान विरोध कर रहे हैं हीरो बने रहने की वजहें तलाशिए हरिवंश जी किसानों की बात हरिवंश ने तो शतरंज की बाजी ही पलट दी समाजवादी फिर सड़क पर उतरेंगे मोदी के जन्मदिन पर व्याख्यान माला असाधारण प्रतिभावान सोफिया लॉरेन ! खाने में स्वाद, रंगत और खुशबू ! प्रधानमंत्री ने महत्वपूर्ण योजनाओं का किया शुभारंभ चर्चा यूपी की पालटिक्स पर ऐसा बनकर तैयार होता समाहरणालय पालतू बनाना छोड़ें, तभी रुकेगी वन्यजीवों की तस्करी बाजार की हिंदी और हिंदी का बाजार उपचुनाव की तैयारियों में जुटने का निर्देश

गांधी की पाठशाला की तरफ लौटने की ज़रुरत

अमिताभ श्रीवास्तव

काबे को जा रहा हूँ निगह सू ए दैर है/मुड़ म़ुड़ के देखता हूँ  कोई देखता न हो 

क़ाबा और दैर के प्रतीकों के इस्तेमाल की गहराई तक न पहुँच पाने वाला भी सरसरी निगाह में इस शेर में इतना तो समझ ही सकता है कि कहने वाला जिधर जा रहा है, उस तरफ न देखकर कहीं और देख रहा है . जो दरअसल किसी भी चलते हुए इन्सान के लिए खतरनाक ग़लती साबित हो सकता है . शेर में इस ग़लती का एहसास भी दिखता है और अपनी इस ग़लती को लेकर मन में बने एक अपराध बोध की तरफ़ भी इशारा है तभी बार-बार पीछे मुड़ कर देखने की बात आई है कि काबे जैसे पवित्र गंतव्य की तरफ़ बढ़ते हुए यह भटकाव कहीं किसी की नज़र में , किसी की पकड़ में तो नहीं आ रहा.

लेकिन इस  गड़बड़ी के स्वीकार और उससे जुड़े अपराध बोध की अभिव्यक्ति के बावजूद चलने वाले के रुकने का कोई संकेत नहीं है.इस शेर के दायरे से बाहर यह अंदाज़ा लगाने की पूरी गुंजायश है कि सफ़र जारी ही रहता है -पाँव कहीं निगाह कहीं- की गड़बड़ी के साथ.यानि कुछ तो ऐसा है जिसका खिंचाव गंतव्य की पवित्रता पर भारी है. ग़ालिब के एक मशहूर शेर में इस तरफ़ इशारा है-

ईमां मुझे रोके है तो खींचें है मुझे कुफ़्र /क़ाबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे 

स्थूल अर्थ में कलीसा यानि गिरजाघर ईसाइयत के प्रति उत्सुकता का प्रतीक हो लेकिन गहराई में यह उन मनोवृत्तियों का प्रतीक है जो इन्सान के ईमान को भटकाती रहती हैं. 

जीवन भर यह खेल चलता रहता है . सामाजिक जीवन में सक्रिय लोग महत्वाकांक्षा और प्रतिबद्धता के दो सिरों के बीच संतुलन बनाये रखने की क़वायद में लगे रहते हैं. जो ईमानदार हैं, वे प्राय: दुविधाग्रस्त पाये जाते हैं-इधर जाऊँ या उधर जाऊँ . बहुत से अच्छे और समाज के काम आ सकने वाले जीवन भी इसी दुविधा में चले जाते हैं. निजी महत्वाकांक्षाओं को चुनने वाले दुनियादारी के पैमाने पर सफल सुखी, संपन्न दिखते हैं . जीवन में विचार और आदर्श की पवित्रता का चुनाव करने वाले कम से कम आज के समाज में तो हाशिये पर हैं. 

ग़ालिब ने जिस विडम्बना की तरफ़ संकेत किया था, मौजूदा सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में चर्चा करते समय वह और गहरी दिखती है. समाजवाद ही नहीं, किसी भी विचारधारा के वाहक होने का दावा करने वाले अगुआ दस्ते के लोगों को अपने समय और उसके बाद समाज के लिए प्रस्तावित आदर्शों को व्यवहार में  ढालकर दिखाना पड़ता है. यह सामाजिक जीवन की शर्त है, उसकी क़ीमत है. गांधी जी को अगर आज भी महात्मा माना जाता है तो इसकी एक बड़ी वजह है उनकी कथनी और करनी में भेद न होना, सादे जीवन के विचार को ख़ुद अपनी ज़िंदगी में ढालना और उस पर आजीवन टिके रहना. जब उन्होंने कहा था कि मेरा जीवन ही मेरा संदेश है तो यह कोई गर्वोक्ति नहीं थी. इस वाक्य के ज़रिये अपने समूचे जीवन को उन्होंने दूसरों के सामने पड़ताल और चीर-फाड़ के लिए खुला छोड़ दिया था. आज भी लोग अपने-अपने ढंग से महात्मा गांधी के व्यक्तित्व की व्याख्याएँ कर रहे हैं. महात्मा गांधी ने अपने प्रत्यक्ष आचरण से लाखों लोगों में सादगी से जीने की प्रेरणा जगाई . वह श्रंखला पीढ़ी दर पीढ़ी जारी रहती तो हमारे समाज और राजनीति की तस्वीर शायद कुछ और ही होती. पिछले 72 वर्षों में वैसे प्रेरक व्यक्तित्व लगातार कम होते गये हैं. अब तो हाल यह है कि राजनीति और सामाजिक कर्म के क्षेत्र में जिन्हें त्याग का आदर्श स्थापित करना चाहिए था, वे भोगविलास की भोंडी प्रतिमाओं में बदल गये हैं. दुखद यह है कि इसको लेकर कहीं कोई शर्मिंदगी भी नहीं दिखती.हम तात्कालिकता में इतने उलझे हुए हैं कि दीर्घकालिक सपनों, आदर्शों की बात भी एक तरह का डिस्टरबेंस लगती है.



गोरख पांडे ने 1978 में कविता लिखी थी- समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई.

समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई

समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई

हाथी से आई, घोड़ा से आई

अँगरेजी बाजा बजाई, 

नोटवा से आई, बोटवा से आई

बिड़ला के घर में समाई, 

गाँधी से आई, आँधी से आई

टुटही मड़इयो उड़ाई, 

काँगरेस से आई, जनता से आई

झंडा से बदली हो आई, 

डालर से आई, रूबल से आई

देसवा के बान्हे धराई, 

वादा से आई, लबादा से आई

जनता के कुरसी बनाई, 

लाठी से आई, गोली से आई

लेकिन अंहिसा कहाई, 

महंगी ले आई, ग़रीबी ले आई

केतनो मजूरा कमाई, 

छोटका का छोटहन, बड़का का बड़हन

बखरा बराबर लगाई,..

परसों ले आई, बरसों ले आई

हरदम अकासे तकाई, 

धीरे-धीरे आई, चुपे-चुपे आई

अँखियन पर परदा लगाई

समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई

समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई


तब से 42 साल बीत चुके हैं. समाजवादी पार्टी तो अस्तित्व में आ गई,समाजवाद की अब भी प्रतीक्षा है. कविता के मारक व्यंग्य में छुपे मसले अब भी समाजवाद का सपना देखने वालों के लिए गंभीर चुनौती बने हुए हैं. 

समय के साथ साथ समाज बहुत बदला है. सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक परिस्थितियाँ बहुत बदली हैं. आम आदमी, सामाजिक कार्यकर्ता का मन भी बदला है. तकनीक ने लोगों के व्यवहार पर ज़बरदस्त असर डाला है. लोग भयानक उपभोक्तावाद के शिकंजे में हैं. सुविधाभोगी जीवनशैली का प्रबल आकर्षण सभी आदर्शों की पवित्रता को नष्ट कर रहा है. 


दुष्यंत ने लिखा था-

न हो क़मीज़ तो पांवों से पेट ढक लेंगे

ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफर के लिए  

देश की सड़कों पर पैदल मीलों की दूरी नापते ग़रीब लोगों को देख कर ऐसा लगता है दुष्यंत ने किसी भविष्यवक्ता की तरह बरसों पहले वो कड़वी सचाई  लिख दी थी जिसे महान मध्य वर्ग के लोग अपनी आँखों के आगे घटित होता देख रहे हैं और सच पूछिए तो कुछ खास कर नहीं रहे हैं क्योंकि उनकी अपनी चिंताएं, असुरक्षाएं और स्वार्थ उन पर इस कदर हावी हैं कि उनके दायरे के बाहर कुछ भी देख पाने की न तो हिम्मत है, न इच्छा है और न ही ज़रुरत है. हाँ, ज़ुबानी हमदर्दी दिखाने में दरियादिली फूटी पड़ रही है.  

गोरख पांडेय ने समझदारों का एक गीत भी लिखा था जो हमारे बुद्धिजीवी वर्ग की बहुत सटीक तस्वीर पेश करता है.वो कवि के उस समय के चित्रण में जैसा तब था , वैसा ही आज भी है -  


हवा का रुख कैसा है,हम समझते हैं

हम उसे पीठ क्यों दे देते हैं,हम समझते हैं

हम समझते हैं ख़ून का मतलब

पैसे की कीमत हम समझते हैं

क्या है पक्ष में विपक्ष में क्या है, हम समझते हैं

हम इतना समझते हैं

कि समझने से डरते हैं और चुप रहते हैं.


चुप्पी का मतलब भी हम समझते हैं

बोलते हैं तो सोच-समझकर बोलते हैं हम

हम बोलने की आजादी का

मतलब समझते हैं

टुटपुंजिया नौकरी के लिये

आज़ादी बेचने का मतलब हम समझते हैं

मगर हम क्या कर सकते हैं

अगर बेरोज़गारी अन्याय से

तेज़ दर से बढ़ रही है

हम आज़ादी और बेरोज़गारी दोनों के

ख़तरे समझते हैं

हम ख़तरों से बाल-बाल बच जाते हैं

हम समझते हैं

हम क्यों बच जाते हैं,यह भी हम समझते हैं.


हम ईश्वर से दुखी रहते हैं अगर वह

सिर्फ़ कल्पना नहीं है

हम सरकार से दुखी रहते हैं

कि समझती क्यों नहीं

हम जनता से दुखी रहते हैं

कि भेड़ियाधसान होती है.


हम सारी दुनिया के दुख से दुखी रहते हैं

हम समझते हैं

मगर हम कितना दुखी रहते हैं यह भी

हम समझते हैं

यहां विरोध ही वाजिब क़दम है

हम समझते हैं

हम क़दम-क़दम पर समझौते करते हैं

हम समझते हैं

हम समझौते के लिये तर्क गढ़ते हैं

हर तर्क गोल-मटोल भाषा में

पेश करते हैं, 

हम समझते हैं

हम इस गोल-मटोल भाषा का तर्क भी

समझते हैं.


वैसे हम अपने को किसी से कम

नहीं समझते हैं

हर स्याह को सफे़द और

सफ़ेद को स्याह कर सकते हैं

हम चाय की प्यालियों में

तूफ़ान खड़ा कर सकते हैं

करने को तो हम क्रांति भी कर सकते हैं

अगर सरकार कमज़ोर हो

और जनता समझदार

लेकिन हम समझते हैं

कि हम कुछ नहीं कर सकते हैं

हम क्यों कुछ नहीं कर सकते हैं

यह भी हम समझते हैं.

रिज़र्व बैंक के गवर्नर शक्ति कांत दस ने शुक्रवार को अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में विस्तार से बताया कि आर्थिक मोर्चे पर किस सेक्टर का क्या हाल है. लुभावने सपनों की जगह नहीं बची है.     

कोरोना संक्रमण के बाद बन रहे समाज में अर्थव्यवस्था का जो बुरा हाल होने वाला है, उसमें सादगी, किफ़ायत ,  कम संसाधनों  के साथ ज़िन्दगी गुज़ारना कोई अमूर्त आदर्श नहीं, व्यवहारिक ज़रुरत हो जाएगी. मध्य वर्ग दीवार पर लिखी इस इबारत को देखकर भी शायद स्थिति की गंभीरता को ठीक से समझ नहीं रहा है.नेता भी खुलकर, साफ़ शब्दों में हालात समझा नहीं रहे हैं. आज आदर्शों की बात कह कर बताने से आगे बढ़कर कर के दिखने की ज़रुरत है लेकिन आम लोगों को आदर्शों की तरफ प्रेरित करने वाले व्यक्तित्व अब लुप्तप्राय हैं, सार्वजनिक जीवन में उँगलियों  पर गिनने लायक बचे हैं और वे भी हमारे मुख्यधारा के मीडिया की नज़र से ओझल है. मीडिया की दिलचस्पी समाज के निर्माण में नहीं , उसके विध्वंस में है. मीडिया अगर सादगी का उपदेश देने लगेगा तो उन उपभोक्तावादी विज्ञापनों का क्या होगा जिनकी बदौलत कमाई होने की उम्मीद रहती है.

 लोग विकल्प चाहते हैं लेकिन विकल्प देने की ज़िम्मेदारी जिनकी है,  वे क्या कर रहे हैं?  यह सवाल क्यों न उठे कि जब लाखों की तादाद में मज़दूर तपती धूप में भूखे-प्यासे  मीलों का फैसला पैदल नाप रहे हैं , लोगों की जानें जा रही हैं , तब दलितों, पिछड़ों, गरीबों की अगुआई का दावा करने वाली मायावती ट्विटर पर बयानबाज़ी के अलावा क्या कर रही हैं? जिस पार्टी के नाम में समाजवाद है, वह भी क्या कर रही है? जब ऐसा विपक्ष लोगों को संकट के समय ज़मीन पर नज़र ही नहीं आएगा तब उसका वजूद कब तक बना रहेगा?  

विकल्प की राजनीति और सामाजिक कर्म में लगे सभी लोगों , संगठनों और राजनीतिक दलों के लिए एक बड़ी समस्या यह है कि आम जनता से संवाद की प्रक्रिया ठप पड़ी हुई है. डिजिटल टेक्नोलॉजी और सोशल मीडिया के नए दौर में पुराने तौर तरीके काफी नहीं है.नए माध्यमों को अपनाना पड़ेगा. समाज के सभी वर्गों, समूहों से संवाद के प्रयासों का विस्तार करना पड़ेगा. 

संवाद के ज़रिये लोगों को बदलने की कोशिशें लगातार करनी पड़ेंगी. लेकिन दूसरों को बदलने से पहले ख़ुद को बदलना ज़रूरी है. चमकदमक का मोह छोड़ना होगा. गांधी, लोहिया, जयप्रकाश, नरेंद्र देव की जीवन शैली हमारे सामने है. गांधी जी ऐसी लकीर खींच गये हैं जिसको लाँघना कठिन है. दूसरों का उपहास करके या उन पर ग़ुस्सा दिखाकर उनमें बदलाव नहीं लाया जा सकता. व्यवहार में  में आत्मीयता , करुणा , धैर्य और प्रेम लाने की ज़रूरत है. गांधी ने संवाद के लिए किसी से परहेज़ नहीं किया. लोगों से अलगाव के बजाय उनसे नज़दीक़ी की रिश्ता बनाने का रास्ता चुना. आज के नेता, कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी इसलिए भी बेअसर दिखते हैं क्योंकि उनमें से अधिकांश का इस देश की आमजनता से, उसके सुख-दुख से लगाव का कोई रिश्ता नहीं रह गया है. 

देश-समाज को बनाने-बढ़ाने का काम, समाजवाद के सपने को हक़ीक़त में बदलने का काम कोई सरकारी पंचवर्षीय योजना नहीं है, न हो सकती है, न होनी चाहिए. यह पीढ़ियों की खपत माँगता है . जो जीवन दाँव पर लगाने का हौसला दिखाएँगे, वही समाज का नेतृत्व कर पाएँगे . राजनीति समाज से जुड़ाव का जरिया है.उसे पैसा और रसूख कमाने वाले एक बेरहम पेशे में बदल दिया गया है. यह दस्तूर बदलना होगा. समाज ने त्याग का आडंबर करके सत्ता की दौड़ लगाने वालों को भी देखा है, उन पर भरोसा भी किया है, छला हुआ भी महसूस किया है. लोगों का भरोसा जीतने के लिए मेहनत करनी पड़ेगी. गाँधी की पाठशाला की तरफ लौटने की ज़रुरत है.आदर्शों को आचरण में ढाल कर दिखाना पड़ेगा. यह एक बड़ी चुनौती है . निजी स्तर पर भी और संगठनों के स्तर पर भी.

  • |

Comments

Subscribe

Receive updates and latest news direct from our team. Simply enter your email below :