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लोहिया के सच्चे उत्तराधिकारी नरेंद्र मोदी ?

कुरबान अली 

दो मई को राजेंद्र राजन ने एक लेख लिखा है जिसका शीर्षक है  'मोदी, लोहिया को चुनावी मौसम में क्यों भुनाना चाहते हैं? वे लिखते हैं:

'प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मार्च में एक ब्लॉग लिख कर कहा था कि अगर डॉक्टर राममनोहर लोहिया जीवित होते, तो उनकी सरकार पर गर्व करते.मोदी और उनकी पार्टी, लोहिया की राजनीति और विचारधारा के वारिस नहीं हैं. इसलिए मोदी ने जो कहा है वह एक असामान्य या विचित्र दावा ही कहा जाएगा. सवाल यह है कि आखिर लोहिया को अपने पाले में दिखाने की जरूरत मोदी को इस वक्त क्यों महसूस हुई, जब आम चुनाव सिर पर था. क्या इसका चुनाव से कोई वास्ता हो सकता है? क्या पता हो! मोदी जैसे राजनीतिक दांव-पेच के धुरंधर खिलाड़ी ने इस वक्त अचानक लोहिया का नाम उछाला है तो चुनावी रणनीति से इसका कुछ संबंध हो भी सकता है'.



इससे पहले सोशलिस्ट पार्टी के अध्यक्ष और दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के अध्यापक डा. प्रेम सिंह ने इसी विषय पर लिखे अपने लेख 'और अंत में लोहिया! पर विमर्श' में प्रतिक्रया व्यक्त करते हुए लिखा था,

"इस बार लोहिया जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अपने ब्लॉग पर लोहिया को याद किया जिस पर  मेरे एक मित्र ने  ध्यान दिलाया और कहा कि मुझे  इसका जवाब लिखना चाहिए. मैंने मित्र से पूछा कि मोदी पिछले पांच सालों से गांधी, अम्बेडकर, पटेल, भगत सिंह जैसी मूर्धन्य हस्तियों के बारे में जो कहते आ रहे हैं, क्या उनका जवाब दिया जा सकता है? क्या जवाब दिया भी जाना चाहिए? मेरे मित्र बोले, लेकिन डॉक्टर साहब (लोहिया) की बात अलग है; वे अभी तक बचे हुए थे; मोदी को उन पर कब्ज़ा नहीं करने देना चाहिए! मैंने कहा इस विवाद में पड़ना मोदी की पिच पर खेलना है, जिससे मैं भरसक बचने की कोशिश करता रहा हूं. मित्र थोड़ा नाराज हो गए. मैंने उनसे निवेदन किया कि मोदी और आरएसएस न गांधी, अम्बेडकर, पटेल, भगत सिंह आदि पर और न ही लोहिया पर कब्ज़ा जमा सकते हैं. जो व्यक्ति या संगठन न आज़ादी के संघर्ष के मूल्यों को मानता हो और न संविधान के मूल्यों को, वह भला स्वतंत्रता के संघर्ष में तपी इन हस्तियों को कैसे अपना सकता है? दोनों के बीच मौलिक विरोध है.मोदी और आरएसएस केवल उनका सत्ता के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं, और वही कर रहे हैं. लोहिया के बारे में या बचाव में मोदी या आरएसएस के संदर्भ में कुछ भी कहने का औचित्य नहीं है.मित्र ने हामी भरी लेकिन मोदी का खंडन करने की बात पर अड़े रहे. हार कर मैंने उनसे कहा कि लोहिया के अपहरण के लिए मोदी और आरएसएस को दोष देने का ज्यादा औचित्य नहीं है.दोष उन 'समाजवादियों' का ज्यादा है जो आरएसएस/भाजपा परस्त नेताओं की अगुआई में लोहिया जयंती अथवा पुण्यतिथि के अवसर पर कभी गृहमंत्री राजनाथ सिंह और कभी राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को मुख्य अतिथि के रूप में बुला कर लोहिया का व्यापार करते हैं! मित्र सचमुच खिन्न हुए और यह कहते हुए फोन रख दिया कि ऐसे लोग निश्चित रूप से सफल हो गए हैं. देख लेना इस बार अगर मोदी जीतेंगे तो उनकी सरकार लोहिया को जरूर भारत-रत्न देगी. वह लोहिया का अभी तक का सबसे बड़ा अवमूल्यन होगा. बहरहाल, सुबह अखबार देखा तो मोदी के ब्लॉग पर लोहिया के बारे में लिखी गई टिप्पणी पर अच्छी-खासी खबर पढ़ने को मिली. पता चला कि मोदी ने लोकसभा चुनावों के मद्देनज़र अंत में लोहिया को हथियार बना कर विपक्ष पर प्रहार किया है. पूरी टिप्पणी में बड़बोलापन और खोखलापन भरा हुआ है. एक स्वतंत्रता सेनानी और गरीबों के हक़ में समानता का संघर्ष चलाने वाले दिवंगत व्यक्ति का उनकी जयंती के अवसर पर चुनावी फायदे के लिए इस्तेमाल अफसोस की बात है. तब और भी ज्यादा जब ऐसा करने वाला शख्स देश का प्रधानमंत्री हो! जैसा कि मैंने ऊपर कहा है, लोहिया की विचारधारा, सिद्धांतों, नीतियों पर मोदी के ब्लॉग के संदर्भ में चर्चा करने की जरूरत नहीं है. केवल उनके गैर-कांग्रेसवाद, जो मोदी के मुताबिक उनके मन-आत्मा में बसा हुआ था, पर थोड़ी बात करते हैं. यह पूरी तरह गलत है कि लोहिया के 'मन और आत्मा' में कांग्रेस-विरोध बसा था. मोदी ने नॉन-कांग्रेसिज्म को अपने ब्लॉग में एंटी-कांग्रेसिज्म कर दिया है.




इसके अलावा कोलकाता के एक प्रतिष्ठित समाजवादी परिवार से जुडी सामाजिक कार्यकर्त्ता रुचिरा गुप्ता ने भी इसी विषय पर एक लेख लिखा है जिसका शीर्षक है ' प्रधानमंत्री श्री मोदी, राममनोहऱ लोहिया बीजेपी सरकार पर फ़ख़्र नहीं करते क्यूंकि वह फ़ासीवादी विरोधी थे. 

वह लिखती हैं, "26 मार्च को, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ब्लॉग पोस्ट में दावा किया कि गांधीवादी समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया (यदि जीवित होते तो) तो उन्हें भाजपा सरकार पर गर्व होता.शायद प्रधानमंत्री को इस बात की जानकारी नहीं है कि लोहिया उग्र रूप से फासीवादी विरोधी, साम्राज्यवाद-विरोधी और अधिनायकवाद के विरोधी थे, और उन्होंने हमेशा इन वादों  को  खारिज किया.




हमारे समजवादी मित्रों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ये  शिकायत है की उन्होंने उनके नेता राममनोहर लोहिया के बारे में अपने ये उद्गार क्यों  व्यक्त किये? और चूंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी डा. लोहिया की राजनीति और विचारधारा के वारिस नहीं हैं, इसलिए उन्हें प्रधानमंत्री मोदी का यह दावा असामान्य या विचित्र मालूम होता है।वे सवाल करते हैं कि 'आखिर (उन्हें) लोहिया को अपने पाले में दिखाने की जरूरत इस वक्त क्यों महसूस हुई?और इसका जवाब देते हुए ये लोग खुद ही कहते हैं की "क्यूंकि वे लोग (मोदी और उनकी पार्टी), लोहिया की राजनीति और विचारधारा के वारिस नहीं हैं इसलिए वे ऐसा नहीं केर सकते.




मेरी राय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया को श्रद्धांजलि देते हुए जो श्रेय लेने की कोशिश की है और कहा है यदि वे जीवित होते तो उनकी सरकार पर गर्व करते.उसमें कुछ भी ग़लत नहीं है.दरअसल मोदी ने ऐसा क्यूँ कहा उसके कुछ ऐतिहासिक कारण हैं और उनपर विस्तार से चर्चा करने की ज़रूरत है.50 और 60 के दशक में  डा. राममनोहर लोहिया पर अक्सर यह आरोप लगे कि उन्होने पंडित नेहरु और कांग्रेस पार्टी के अंध विरोध में हिन्दू  सांप्रदायिक  शक्तियों  के साथ सांठगाँठ की और गैर-कांग्रेसवाद के नाम पर  सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया जिससे जनसंघ और बाद में उसकी परवर्ती बीजेपी  मजबूत हुई और 1967 तथा 1977 में जनसंघ के लोगों ने ही गैर कांग्रेसवाद के नाम का सबसे ज्यादा फायदा  उठाया और अपना राजनीतिक आधार मज़बूत किया.




1934 से लेकर 1947 तक की यदि डा. राममनोहर लोहिया की राजनीति और उनके विचारों और सिद्धांतों पर गौर करें तो वे कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के ज़िम्मेदार नेता होने के साथ साथ कांग्रेस पार्टी के वरिष्ट नेता भी थे.कांग्रेस की  विदेश नीति बनाने के साथ साथ सांप्रदायिकता के सवाल पर उन्होने कांग्रेस पार्टी की रीति-नीति और सिद्धांत को भी बहुत मुखर रूप से पेश किया और राष्ट्रीय एकता तथा सांप्रदायिक सदभाव को राष्ट्रीय आंदोलन का एक प्रमुख स्तंभ बताया.मुस्लिम लीग के द्विराष्ट्रवाद  के सिद्धांत की पुरजोर मुखालिफत  करते हुए डा. लोहिया ने मौलाना अबुल कलाम आजाद और खान अब्दुल गफ्फार खान जैसे मुस्लिम कांग्रेसी नेताओं का समर्थन किया और उनके नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन को मजबूत किया.सही मायनों में वह एक सच्चे राष्ट्रवादी नेता थे और 1947 में भारत विभाजन के बाद हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान कई बार उन्होने अपनी जान जोखिम में डालकर मुसलमानों की जान बचायी.लेकिन 1947 में सोशलिस्ट पार्टी के  कानपुर  सम्मेलन के बाद जिसकी अध्यक्षता स्वयं डा. लोहिया ने की थी और जिस सम्मेलन के बाद समाजवादियों ने  कांग्रेस से अलग होने का फैसला किया, सरहदी गाँधी, खान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान को छोड़कर लगभग सभी तत्कालीन कांग्रेसी नेताओं के बारे में डा. लोहिया की राय बदलने लगी.जारी 

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