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यूपी के लिए प्रियंका की रणनीति

यशोदा श्रीवास्तव

लखनऊ. यूपी में कांग्रेस कहां से कहां पंहुच गई, आलाकमान की यह चिंता ही है कि उसे यूपी की कमान प्रियंका गांधी को सौंपना पड़ा.यूपी में 1989 से कांग्रेस खत्म होना शुरू हुई जब इसके 95 सदस्य मुलायम सिंह को समर्पित कर दिए गए थे.उसके बाद से अबतक के विधानसभा चुनाव में पार्टी की सदस्य संख्या कभी 55 तो कभी 44,कभी 27 और अब मात्र सात में पंहुच गई.

कांग्रेस का सबसे बड़ा नुकसान गठबंधन से हुआ.इसकी शुरुआत 1996 से शुरू हुई जब यह बसपा से मिलकर चुनाव लड़ी.2017 के चुनाव में तो गजब हो गया. यूपी की जनता ने राहुल और अखिलेश का साथ नापसंद कर दिया.इस विधान सभा चुनाव के ठीक पहले यूपी में जोर शोर से प्रचार हुआ कि 27 साल यूपी बेहाल.कांग्रेस की ओर से धूंआधार किए गए इस प्रचार से ऐसा लगने लगा था कि पार्टी यूपी में सपा बसपा का विकल्प बन सकती है. तभी चुनावी रणनीति कार प्रशांत किशोर का पार्टी में प्रवेश होता है. कांग्रेस ने यू ट्रन लिया और बीच चुनाव में सपा से गठबंधन का ऐलान हुआ.राहुल गांधी का बहुचर्चित खाट सम्मेलन और यूपी बेहाल जैसा कांग्रेसी स्लोगन पर्दे के पीछे कर अखबारों में अखिलेश और राहुल के संयुक्त फोटो के शानदार विज्ञापन का जन्म हुआ,यूपी को ये साथ पसंद है.

बहरहाल यूपी ने इस साथ को सिरे से खारिज कर दिया.सपा तो जैसे तैसे अपनी विपक्षी नेता के ओहदे तक पंहुच गई लेकिन कांग्रेस! मात्र सात सीट.नितांत क्षेत्रीय पार्टी अपना दल से भी दो सीट पीछे. यूपी जो कभी कांग्रेस का गढ़ रहा है, जहांके हर विधानसभा क्षेत्र में चुनाव हारने के बाद भी कांग्रेस का जनाधार बना रहता था.लेकिन आज तो जीती हुई कुछ सीटों को छोड़कर उसके हारे प्रत्याशी जमानत गंवाकर हारने के आदी हो गए. सैकड़ों कांग्रेस उम्मीदवार तो पांच हजार वोटों तक में ही सिमटने लगे.

अब जनाधार की दृष्टि से ऐसे जर्जर जनाधार वाले प्रदेश में कांग्रेस को मजबूत करने की जिम्मेदारी प्रियंका के कंधे पर डाल दी गई. चुनौती बहुत कठिन है लेकिन प्रियंका के जज्बे की दाद देनी पड़ेगी जो उन्होंने इसे स्वीकार किया.यह प्रियंका की हिम्मत ही है कि यूपी कांग्रेस के धुरंधर रहे डा संजय सिंह, रत्ना सिंह जैसे राजा रजवाड़ों के कांग्रेस के अलविदा कहने के बावजूद वे हताश नहीं हैं.और अब सात में से एक विधायक रायबरेली की आदिति सिंह भी पार्टी छोड़ रही हैं. 

संजय सिंह,रत्ना सिंह या फिर आदिति सिंह जैसे लोग यदि कांग्रेस को अलविदा कह रही हैं और प्रियंका इसका नोटिस तक नहीं ले रहीं तो इससे कांग्रेस छोड़ने वाले लोग ही बेचैन हो रहे.दरअसल यूपी की राजनीतिक तस्वीर बदलने लगी है. अभी लाकडाउन के चलते सड़क पर चल रहे श्रमिकों की पीड़ा से बेफिक्र सत्ता धीशों को प्रियंका से कड़ी चुनौती मिलती हुई देखने को मिली है.श्रमिकों के बहुचर्चित बसों को लेकर.दो तीन दिन तक यूपी सरकार से चली चिट्ठी की जंग में प्रियंका हार गईं लेकिन जीती योगी सरकार भी नहीं.  मौजूदा सत्ता द्वारा विपक्ष को कैसे प्रताड़ित किया गया,इसे सारे देश ने दखा.कांग्रेस पर श्रमिकों पर राजनीति करने के योगी सरकार के आरोप के कांग्रेस के  पलटवार के इस अंदाज से यूपी सरकार निरुत्तर दिखी जब प्रियंका ने कहा बीजेपी चाहे तो बसों पर अपना झंडा लगा ले लेकिन श्रमिकों को आने दे.श्रमिकों के लिए कांग्रेस की बस पर यूपी सरकार की हरकत से बीजेपी के ऐसे तमाम नेता भी हैरान दिखे जो दूसरे दलों से आए हैं. आखिर लोजपा के युवा सांसद चिराग पासवान खुद को नहीं रोक सके.उन्होंने साफ कहा कि श्रमिकों को ले जाने के मामले में अड़ंगा लगाना उचित नहीं है. कांग्रेसी बसों को लेकर अपनी ही सरकार से सवाल तो बीजेपी के कई नेताओं के सीने में भी कैद है. इस बीच योगी सरकार को कांग्रेस के बस प्रकरण में रायबरेली की कांग्रेस विधायक आदिती सिंह का साथ मिल गया.उन्होंने इस मामले वही सारे सवाल उछालकर प्रियंका पर तंज कसा जो योगी सरकार ने उठाते हुए कांग्रेस को घेरने की कोशिश की.बहरहाल आदिति सिंह को पार्टी से निलंबित किया जा चुका है.

यूपी में कांग्रेस के मजबूत होने का रास्ता योगी सरकार के उसके नेताओं के प्रताड़ित व अन्य तमाम बेवजह की कानूनी कार्रवाई से ही आसान होगा.कांग्रेस ने यह ठान लिया है कि योगी सरकार की जनविरोधी नीतियों का विरोध ऐसा हो कि सरकार उसके नेताओं पर सरेआम लाठियां बरसाए और उन्हें जेल भेजे.बस प्रकरण में कांग्रेस का कुछ ऐसा आक्रामक तेवर देखने को मिला.प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू को लखनऊ पुलिस द्वारा बेरहमी से खींच कर ले जाते हुए पूर्वांचल के उस समाज ने भी देखा जिस समाज से लल्लू आते हैं. दो बार से लगातार सेवरही विधानसभा सीट से जीत हासिल कर रहे लल्लु मदेशिया समाज से आते हैं.जाहिर है उन्हें अपने समाज के नेता के साथ यह पुलिसिया बदसलूकी अच्छा नहीं लगा होगा.वे यह भी जानते हैं कि यह सब किसके इशारे पर हुआ?

कांग्रेस की नजर लाकडाउन के बाद हर तबके पर पैदा हुए संकट पर है लेकिन उसका सबसे अधिक फोकस मध्यमवर्गीय परिवारों पर है जिसे किसी भी तरह के सरकारी इमदाद नहीं मिलने वाली है. ये वह तबका है जिसकी मौजूदा समय की हालात न जीने जैसी है और न मरने जैसी.कांग्रेस यूपी में तो कुछ नहीं कर सकती लेकिन छत्तीसगढ़ में न्याय योजना की शुरूआत कर वह यूपी के मध्यवर्गीय परिवारों तक पहुंचना चाहेगी.कांग्रेस कोरोना से माहौल ठंडा होने के बाद केंद्र सरकार के बीस लाख करोड़ के पैकेज का मुद्दा गरमाएगी.कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता व आर्थिक विशेषज्ञ सुप्रिया श्रीनेत इसकी शुरुआत सीएम के शहर गोरखपुर से कर सकती हैं. वहीं योगी शासन में ब्राह्मणों की प्रताड़ना व हत्या की घटनाओं को मुद्दा भी उठेगा.कांग्रेस के अपराजेय नेता प्रमोद तिवारी तथा उनकी विधायक बेटी आराधना इस आंदोलन की ध्वज वाहक हो सकती हैं.कांग्रेस फिलहाल बसों का मुद्दा हर हाल में ठंडा नहीं होने देना चाहेगी.पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत कहती हैं कि सांगठनिक रूप से कमजोर होने के नाते यूपी में कांग्रेस का जनाधार गुम हुआ,हमें आक्रामक तेवर अपनाते हुए उसे हासिल करना ही है. वहीं कांग्रेस के पूर्व विधायक ईश्वर चंद शुक्ल कहते हैं कि गठबंधन की वजह से पार्टी कार्यकर्ता छिटक गए थे.अब जुटने लगे हैं तो कांग्रेस के एक बड़े ब्राह्मण नेता नर्वेदश्वर शुक्ल कहते हैं कल हमारा है.


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