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एक महीने तक चलते रहे ये मजदूर

गिरधारी लाल जोशी

 भागलपुर .अब सरकारें अपने राज्यों में संक्रमण के आंकड़े की बढ़ोतरी का ठीकरा भी मजदूरों पर ही फोड़ने में लगी है. कह रही हैं कि कोरोना के नए मरीजों में बाहर से आए मजदूर ज्या दा‍ हैं. लेकिन, वे यह नहीं बतातींं कि इसके लिए जिम्मेेदार वही हैंं. श्रमिक ट्रेन चलाने के पहले  वह कहती रही  कि लक्षण वाले मजदूरों को ट्रेन में नहीं चढ़ने दिया जाएगा. फिर कहती है कि राज्यी में आने पर उन्हेंं आइसोलेशन में रखने का पूरा इंताजम है. सरकार कहती है दो गज दूरी सबसे जरूरी. इसका  पालन कीजिए. वही सरकार कहती है कि ट्रेन की एक-एक सीट बेचेंगे.  ऑटो में दो सवारी बैठा सकते हैं, बगैरह. इतनी दुविधा  में पहले से परेशान मजदूरों पर अपनी गैरजिम्मेेदारी का ठीकरा सरकार क्याै यही सोच कर फोड़ रही है कि बेचारे मजदूर हैं, झेल लेंगे‍? 

 मजदूर मजबूर है. लाकडाउन के बाद हरेक तरह की जलालत झेलने को विवश है. सड़क पर चले तो पुलिस ने रोका. पैसे वसूले. पटरियों पर चले तो रेलवे पुलिस ने लूटा. कई वीडियो वायरल हुए. सरकार ने इन्हें घर पहुंचाने के लिए ट्रेन न दी तो तो पटरियों पर थककर सोए पैदल मुसाफिरों को ही कुचलने ट्रेन आ गई. ट्रक वालों ने मुंबई, कोलकता, पंजाब, दिल्ली जहां-तहां से इन्हें बिहार पहुंचाने के नाम पर मनमाना पैसे वसूले. जानवरों की तरह लाद दिए गए. सड़क हादसों में सैकड़ों मारे गए. ट्रेन पर सवार होने के नाम पर इन्हें दलालों ने ठगा. रेलवे ने भाड़ा वसूला. इन लोगों ने टिकटें दिखाई. सरकारें 85 और 15 फीसदी के चक्कर मे फंसी रही. हर तरह से पिसाया तो मजदूर ही?

दसअसल असंगठित कामगारों का कोई नहीं,  यह साबित हो गया. हजारों पैदल ही अपने घर पहुंच गए. मुंबई से 35 दिनों तक पैदल चलकर कई भागलपुर और बगल के राज्य झारखंड के  गोड्डा आए. माताएं  एक बच्चे को गर्भ और दूसरे को कंधे पर लेकर चल पड़ी. एक बेटी अपने पिता को साइकिल की सवारी कर दिल्ली से दरभंगा पहुंच गई. यह घर पहुंचने का उनका जज्बा है. मगर किसी भी सरकार को दया नहीं आई.यह नहीं सोचा कि ये कहां खा रहे है. इनके पास पैसे है या नहीं. चलते-चलते चप्पलें टूट गई. नंगे पांव चले तो पैर फट गए. अब  सुशासन बाबू कहते है जो प्रखंड के पृथक शिविर में रहेंगे उन्हें विदाई के वक्त 500 से एक हजार दिया जाएगा. क्या इसे हम आने वाले बिहार चुनाव में वोट खरीदना नहीं कहें? आपको पसीजना ही था तो लाकडाउन की योजना बनाने के पहले इन्हें घर पहुंचाने की योजना बनाते. 


 लाकडाउन-4 में थोड़ी सी ढिलाई ने दिल्ली से भागलपुर बाजार गुलजार कर दिया. कपड़े की दुकानें अंतराल पर खुलेगी. ओड-इवन फार्मूला कह सकते है. सुबह थोक कपड़ा. शाम को रेडीमेड कपड़ा. सामने रमजान-ईद का त्योहार व्यापारियों को दिख रहा है. त्योहार तो हरेक साल आएंगे. मगर जान बचेगी तभी हम देख पाएंगे और खुशहाली से मना पाएंगे.  लाकडाउन-3 और लाकडाउन-4 में थोड़ा अंतर दुकानें खोलने में भले हो. मगर सुरक्षित दूरी की धज्जियां उसमें भी उड़ रही थी और इसमें  भी उड़ रही है. तो ऐसे में कैसे हम अपने को सुरक्षित महसूस कर सकते है. इतना ही नहीं डॉक्टर्स, स्वास्थ्यकर्मी, पुलिस, सफाईकर्मी , बैंककर्मी ,  पत्रकार सभी चपेट में आ रहे है. ये लोग तो कोरोना वैरियर्स है. ये  वैरियर्स आपके लिए बने है . वैरियर्स मतलब कोरोना को आपतक पहुंचने में बाधा. लेकिन आप घरों से निकलोगे तो इनकी 60 दिनों की लगातार मेहनत पानी हो जाएगी.

 बिहार में कोरोना अपने पांव तेजी से पसार रहा है. इसकी रफ्तार बाहर से अपने घरों को लौटे सजदूरों की वजह से तेज हुई बताई जा रही है. अभी भी लाखों आने बाकी है. राज्य सरकार ने आपको बचाने के लिए प्रखंडों में इनके लिए पृथक शिविर बनाए है. ताकि इनकी देखभाल हो. किसी के ये संपर्क में न आए . ये खुद भी बचे और परिवार, ग़ांव, मोहल्ले के लोगों को बचाए. सुशासन बाबू की यह योजना काबिले तारीफ है. यहां व्यवस्था कैसी है?यह अलग मुद्दा है. आपदा अधिकारियों के लिए नकद खेती कही जाती है. मगर पृथक शिविर बनाने की सोच वाकई यहां रह रहे बिहारियों को संक्रमण से  बचाने की जरूर है. तो थोड़ा आप भी विचार करिए. सरकार की बात मानिए. 

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