मायावती और अखिलेश से ज्यादा चतुर नीतीश निकले

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मायावती और अखिलेश से ज्यादा चतुर नीतीश निकले

विभूति नारायण राय 

नई दिल्ली .लोकसभा चुनाव के नतीजों ने उत्तर भारत में विपक्ष की सोशल इंजीनियरिंग को बड़ा झटका दिया है .उत्तर प्रदेश में मुलायम ,अखिलेश और मायावती को ऐसा झटका लगेगा यह किसी को उम्मीद नहीं थी .इसी तरह बिहार में लालू यादव के राष्ट्रीय जनता दल का जिस तरह सफाया हुआ उससे हर कोई हैरान है .कन्नौज और बदायूं जैसी सीट समाजवादी पार्टी हार जाएगी यह कोई सोच भी नहीं सकता था .यूपी ,बिहार से मिल रही खबरों के मुताबिक दलित और अहीर नेतृत्व को गैर जाटव और गैर अहीर पिछड़ी जातियों ने बड़ा झटका दिया है . जबकि बिहार में ही नीतीश कुमार ने अपनी सोशल इंजीनियरिंग से बड़ी जीत हासिल की है .ऐसे क्यों हुआ यह समझना होगा . 


अस्मिता की राजनीति या आइडेंटिटी पोलिटिक्स एक दुधारी तलवार की तरह होती है . ख़ास तौर से भारत जैसे बहु धार्मिक या बहु जातीय समाज मे आप इससे किसी दीर्घ क़ालीन सफलता की उम्मीद नही कर सकते . 2019 के लोकसभा चुनावों के नतीजे इसी तरफ़ इशारा करते हैं . हम सिर्फ़ दो – उत्तर प्रदेश और बिहार के परिणामों का विश्लेषण करें तो इस स्थापना को समझने मे सुविधा होगी . मैंने इन दो राज्यों का चयन इस लिए किया है कि इन्ही दोनो राज्यों मे पिछड़े और दलितों की एकता के बल पर पिछले तीन दशकों से मुलायम सिंह यादव, लालू यादव, कांशीराम और मायावती ने राजनीति की और लम्बे समय तक राज्य सत्ता परउनका क़ब्ज़ा रहा है .

सत्तर के दशक मे ग़ैर कांग्रेसवाद के साथ ही डाक्टर लोहिया ने अस्मिता की राजनीति की शुरुआत की थी . उनके “पिछड़ा पाये सौ में साठ” के नारे मे पिछड़ों की राजनीति के अंकुर छिपे थे . पर डाक्टर लोहिया के पिछड़े मे आज की पिछड़ी या ओबीसी जातियाँ तो थी हीं उनमे दलित भी थे और स्त्रियाँ भी थीं . 

1967 में जब ग़ैर कांग्रेसवाद की परिकल्पना फलीभूत हुई और उत्तर प्रदेश तथा बिहार दोनो मे संविद सरकारें बनी तो पिछड़ों की राजनीति का एक युग शुरू हुआ . उत्तरप्रदेश मे चौधरी चरण सिंह मुख्यमंत्री बने . शुरू मे वे सिर्फ़ जाटों के नेता नही थे , उनके साथ यादव , कुर्मी , गूजर इत्यादि जातियाँ भी थीं . इतना ज़रूर था कि उस दौर का पिछड़ा नेतृत्व दलित और महिला विरोधी था .बिहार मे कर्पूरी ठाकुर और रामसुंदर दास जैसे लोगों के हाथ में नेतृत्व आया . ये भी किसी एक जाति के नही वृहत्तर पिछड़े समाज के नेता थे . 1990  मे मंडल कमीशन की सिफ़ारिशें लागू होते ही पिछड़ों की एकता और अगड़ी जातियों से उनके हिंसक विरोध का स्तर एक दम बढ़ा . पर इसी के साथ पिछड़ों की अलग अलग जातियों के अपने नेतृत्व खड़े होने शुरू हो गये . पिछड़ों मे आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक रूप से अगड़ी जाति अहीर या यादव को उत्तर प्रदेश मे मुलायम सिंह यादव और बिहार मे लालू प्रसाद यादव के रूप में बड़ी क़द काठी के नेता मिले . मंदिर आंदोलन के दौरान मुसलमानों के साथ खड़े होकर इन दोनो ने मुस्लिम -यादव दोस्ती की एक मज़बूत नीव डाली जो आजतक चुनावों में कमोबेश उनके काम आ रही है .शनै शनै यह नेतृत्व संकीर्ण होता गया . 

लोहिया से उलट यह नेतृत्व दलित और स्त्री विरोधी था .महिला आरक्षण बिल संसद मे मुख्य रूप से इन्ही दोनो के विरोध के कारण नही पास हो सका . दोनों का यादव प्रेम इस हद तक बढ़ गया कि दूसरी पिछड़ी जातियाँ धीरे धीरे उनसे छिटकती गयीं . पिछड़ों मे एक मज़बूत सामाजिक और आर्थिक आधार वाली कुर्मी जाति ने बिहार मे नीतीश कुमार और उत्तर प्रदेश मे सोने लाल पटेलजैसे प्रभावी नेता खड़े कर दिये . दोनोमे अधिक चतुर नीतीश जातियों के भारतीय यथार्थ को साधते हुये लगातार बिहार की राजनीति की धुरी बने हुये हैं .

उत्तर प्रदेश मे संकीर्ण यादव सोच को समझने के लिये एक ही उदाहरण काफ़ी है . अखिलेश यादव ने मुख्य् मंत्री की हैसियत से एक यादव को उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की कमान सौंपी . उसने बड़ी बेशर्मी के साथ अनारक्षित पदों पर तो  यादव उम्मीदवार चुने ही , पिछड़ी जातियों के लिये आरक्षित पदों पर भी सिर्फ़ यादव भर दिये .इस लिये किसी को आश्चर्य नही होना चाहिये कि जब उसके ख़िलाफ़ इलाहाबाद मे छात्र सड़कों पर उतरे तो उनमे बड़ी संख्या मे ग़ैर यादव पिछड़ी जातियों  के लड़के लड़कियाँ शरीक थे . इस चुनाव के दौरान भी जब अखिलेश यादव ने भारतीय सेना मेअहीर रेजीमेंट खड़ी करने की माँग की तो निश्चित रूप से दूसरी पिछड़ी जातियों को निराशा ही हुई होगी .जारी 

(लेखक अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्विद्यालय वर्धा के पूर्व कुलपति और जानेमाने साहित्यकार हैं )  

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