जनादेश

बिहार में कोरोना से फैली दहशत नेपाल में अब इमरजेंसी की भी आहट एक सवाल कभी नहीं मर सकता अति राष्ट्रवाद की राजनीति का परिणाम अखबारों की मोतियाबिंदी नजर राजनीतिशास्त्र अपराधशास्त्र की ही एक शाखा है उत्तर प्रदेश में फिर लॉक डाउन ,फ़िलहाल तीन दिन का विकास दुबे की कहानी में कोई झोल नहीं है ? बिहार में राजनीति तो बंगाल में लापरवाही का नतीजा सामने तो बच्चों के दिमाग से लोकतंत्र हटा देंगे ? अपना वादा भूल गए नीतीश दलाई लामा से यह बेरुखी क्यों ? बारूद के ढेर पर बैठा है पटना विदेश नीति में बदलाव करना चाहिए जब तक जिए शान से जिये चन्द्रशेखर असली समस्या तो बुद्धि है सादगी में मुस्कुराता चेहरा यानी चंद्रशेखर गांव ,गरीब और पेड़ के लिए सत्याग्रह गुजर जाना एक दरख्त का जोमैटो में चीन का निवेश रुका

डब्लूएचओ ने हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन के ट्रायल पर रोक लगा दी

गिरीश मालवीय 

विश्व स्वास्थ्य संगठन  ने आज COVID-19 के इलाज के तौर पर हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन के ट्रायल पर फिलहाल रोक लगा दी है, कुछ दिन पहले ही दुनियाभर के रिसर्च प्रकाशित करने वाली मशहूर पत्रिका द लैंसेट ने कहा था कि क्लोरोक्वाइन और HCQ से फायदा मिलने का कोई सबूत नहीं मिला है.कमाल की बात है कि दो दिन पहले ही देश मे कोविड 19 से लड़ने वाली सर्वोच्च संस्था आईसीएमआर ने कोरोना वारियर्स को हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन लेने की गाइडलाइंस जारी की हैआईसीएमआर के ऐसे ही उल्टे पुल्टे आदेशों से परेशान होकर हमारे मित्र पीयूष जोशी ने आईसीएमआर के नाम एक अपील जारी की है

डॉ पीयूष जोशी ने आईसीएमआर से सवाल पूछा है . माननीय आईसीएमआर आपके द्वारा हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन को लेकर कल ही नई गाइडलाइन्स जारी की गई हैं, जिनमें इस दवा के उपयोग का दायरा बढाने की सिफारिश करी गई है. पिछले एक माह में अंतर्राष्ट्रीय शोधपत्रों के द्वारा यह बात सामने आ चुकी है कि इस दवा का कोरोना के इलाज में कोई फायदा नहीं है, बल्कि नुकसान होने की संभावना ज्यादा है. इस परिस्थिति में सभी शोधपत्रों को दरकिनार को दरकिनार करते हुए भारत की शीर्ष चिकित्सकीय शोध की संस्था आईसीएमआर द्वारा हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन के उपयोग का दायरा बढाने की सिफारिश किस वैज्ञानिक या चिकित्सकीय शोध के आधार पर करी गई है?

क्या यह जनसाधारण में प्लेसिबो प्रभाव पैदा करने के लिए तो नहीं है? अब जबकी यह बात साफ हो चुकी है कि HCQS के उपयोग के दुष्परिणाम ज्यादा हैं, तो क्यों नहीं आईसीएमआर  के मुखिया अपने गैर वैज्ञानिक दृष्टिकोण को फैलाने के लिए, अंतर्राष्ट्रीय शोध को नजरअंदाज़ करने के लिए, और भारत की जनता एवं चिकित्सा समुदाय को गलत राह दिखाने के लिए जिम्मेदार ठहराए जाएं? आपको घोर लापरवाहीपूर्ण गैरवैज्ञानिक रवैये के लिए क्यों न बर्खास्त किया जाए? यदि उपरोक्त में से कोई कार्यवाही नहीं होती है, तो क्या यह न माना जाए कि उपरोक्त सिफारिशें भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय के दबाव में जनता की आंखों में धूल झोंकने के लिए की गई थीं, जबकि शुरूआत से HCQS दवा के असर के संबंध में संशय था? देश आपसे शीघ्र और सही जवाब की उम्मीद करता है.

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