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नेहरु और राष्ट्रवाद !

नीरज कुमार

 जवाहर लाल नेहरु आधुनिक भारत के एक सुलझे हुए राजमर्मज्ञ थे . नेहरु जी का राजनीति-दर्शन उन जिवंत विचारों में निहित है जो उन्होंने मुख्यतः इतिहास के विवेचन, भारतीय राजनीति के निर्देशन और विश्व राजनीति की समीक्षा के दौरान अपनाए, व्यक्त किए या स्थापित किए . ये विचार इतने सार्थक और महत्वपूर्ण हैं कि उन्हें नेहरु जी के राजनीति-दर्शन के रूप में प्रस्तुत करना सर्वथा युक्तिसंगत होगा . ये विचार उनके आत्मकथा के अतिरिक्त उनकी प्रसिद्ध कृतियों- 'विश्व इतिहास की झलक'(1939), 'भारत की खोज' (1946), तथा उनके असंख्य लेखों, पत्रों और भाषणों में बिखरे पड़े हैं .

  नेहरू जी मार्क्सवादी इतिहास दर्शन के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विशेष रूप से प्रभावित रहे हैं जिसमें धर्मशास्त्र कि मान्यताओं और अंधविश्वासों को कोई स्थान नहीं दिया गया हैं . इतिहास का सतही  विद्यार्थी जिन परिवर्तनों को कुछ तथ्यों या घटनाओं का बेमेल गट्ठर समझता है, मार्क्स के ऐतिहासिक भौतिकवाद के अंतर्गत उन्हें एक-दुसरे से जुड़ी कड़ियों के रूप में देखा जाता है जो मानव के ऐतिहासिक विकास को आगे बढ़ाती हैं . ऐतिहासिक व्याख्या की इस शैली ने नेहरुजी के संवेदनशील मन को विशेष रूप से प्रभावित किया है . दुसरे, मार्क्सवादी दर्शन में जड़-चेतन के भेद को मिटा दिया गया है और इतिहास को परस्पर विरोधी शक्तियों को संघर्ष का परिणाम माना गया है . इस दृष्टिकोण ने भी नेहरु जी को विशेष रूप से आकर्षित किया . परंतु फिर भी उन्हें इतिहास कि मार्क्सवादी व्याख्या अपने-आप में अधूरी लगी . उनके विचार से बीते हुए युगों के बारे में मार्क्सवादी विशलेषण पर्याप्त सही था, परंतु वर्तमान और निकट भविष्य के बारे में यह विश्लेषण उतना उपयुक्त नहीं था . मार्क्सवादी सिद्धांत के अंतर्गत द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के दार्शनिक आधार से भी नेहरु जी का मतभेद था . उन्होंने तर्क दिया कि प्राकृतिक और सामाजिक विज्ञानों के क्षेत्र में मानवीय चिंतन के अंतर्गत जो नवीनतम प्रगति हुई है, उसे देखते हुए उन्नीसवीं शताब्दी का मार्क्सवाद उन्नीसवीं शताब्दी का मार्क्सवाद पुराना पड़ चूका है .


   नेहरु एक महान राष्ट्रवादी नेता थे . नेहरु जी का कहना था कि राष्ट्रवाद का रास्ता व्यक्तिगत स्वतंत्रता का रास्ता भी है और आर्थिक समानता का भी . अपने गहन अध्ययन से उन्होंने राष्ट्र की मूलभूत आवश्यकताओं को समझा और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि देश में जो भी मूलभूत विकृतियाँ हैं उनके मूल में विकृत अर्थव्यवस्था हैं, उन्होंने महसूस किया कि भारत के पास एक महान संस्कृतिक विरासत है किन्तु इसके बावजूद भी वह उन्नति के मार्ग पर चलने में असमर्थ रहा है, इसका एक मुख्य कारण उन्होंने यह बताया कि भारत में धर्मान्धता तथा दकियानुसीपन की वजह से कई सामाजिक कुरीतियों का प्रचालन हो गया है जिससे राष्ट्र की प्रगति में बाधा उत्पन्न हो रही हैं . जीवन दायनी परंपरा का विनाश और रुढ़िवादी कुरीतियों का प्रचार बराबर होता रहा हैं . सामंतवाद, जमींदारी प्रथा और धार्मिक स्वार्थो कि वजह से भारत उन्नति के मार्ग पर नहीं चल सका हैं . उन्होंने महसूस किया कि जब तक इन कुरीतियों को समूल विनष्ट नहीं किया जाएगा, तब तक उन्नति का मार्ग प्रशस्त नहीं हो सकेगा, इसके लिए यह आवश्यक है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण की स्थापना की जाय और भारत के लोगों को यह समझाया जाय कि जब तक आधुनिक विश्व की नयी चेतना से लाभ नहीं उठाया जाएगा तब तक सही अर्थ में समानता नहीं लायी जा सकेगी .

 उन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद की बहुत सशक्त और युक्तिसंगत व्याख्या दी है . 'भारत की एकता' शीर्षक निबंध (1939) के अंतर्गत उन्होंने लिखा है कि भारतीय संस्कृति में अनेक विविधताओं के बावजूद सम्पूर्ण भारतीय इतिहास में बुनियादी एकता के दर्शन होते हैं . नेहरु जी के राष्ट्रवाद का मूल मन्त्र है- सांस्कृतिक बहुलवाद और संश्लेषण . अपनी विख्यात कृति 'भारत की खोज' के अंतर्गत उन्होंने राष्ट्रवाद की अत्यंत मोहक और युक्तिसंगत परिभाषा दी है : "राष्ट्रवाद वस्तुतः अतीत की उपलब्धियों, परंपराओं और अनुभवों की सामूहिक स्मृति है . आज के युग में राष्ट्रवाद की भावना इतनी सुदृढ़ हो गई है कि जितनी पहले कभी नहीं थी . जब भी कोई संकट पैदा हुआ है, (हमारा) राष्ट्रवाद फिर से उभरकर सामने आया है, और लोगो ने अपनी पुरानी परंपराओं में आनंद और शक्ति की तलाश की है . वर्त्तमान युग की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है- अपने खोए हुए अतीत की फिर से खोज ." 1950 में नेहरु जी ने भारतीय संसद में कहा : "राष्ट्रवाद एक महान और जीवंत शक्ति है . अतः यदि हम अपने देश के लोगों की सहज प्रतिभा और बुनियादी परंपराओं के किसी अंश को छोड़ दें तो हम बहुत कुछ गँवा देंगे; हम निराधार हो जाएंगे ." परंतु नेहरु राष्ट्रवाद के अंध-समर्थक नहीं थे . अपनी दूसरी महान कृति 'विश्व इतिहास की झलक' के अंतर्गत उन्होंने राष्ट्रवाद के विकृत रूप के प्रति जोरदार चेतावनी भी दी है : "राष्ट्रवाद अपनी जगह ठीक है, परंतु यह एक अविश्वस्त मित्र और असुरक्षित इतिहासकार है . यह बहुत सारी घटनाओं के प्रति हमारी आँखों पर पट्टी बाँध देता है, और कभी-कभी सच्चाई को तोड़-मरोड़कर पेश करता है, ख़ास तौर पर तब जब इसका सरोकार हमारे अपने देश से हो . राष्ट्रवाद के विकास के साथ-साथ 'मेरा देश, सही या गलत' का विचार भी पनपा है और कई राष्ट्रों ने ऐसे कारनामे करते हुए गौरव अनुभव किया है कि जो व्यक्तियों के मामले में बुरे और अनैतिक समझे जाते हैं ." इस तरह नेहरु जी रचनात्मक राष्ट्रवाद में विश्वास करते थे, ध्वसात्मक राष्ट्रवाद में नहीं . राष्ट्रवाद को आत्म-निर्णय के अधिकार और लोकतंत्रीय प्रक्रिया के सिद्धांत से जोड़ते हुए उन्होंने भारत के लिए संविधान सभा के विचार को बढ़ावा दिया .


 नेहरु जी धर्मनिरपेक्षता पर अपने विचार प्रकट करते हुए लिखते हैं कि हम अपने देश को धर्मनिरपेक्ष कहते हैं . 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द बहुत माकूल नहीं लगता . फिर भी, किसी बेहतर के नहीं रहने पर, हमने इसका इस्तेमाल किया है . इसका ठीक ठीक माने क्या है ? साफ़ तौर पर इसका माने ऐसा देश नहीं, जहाँ धर्म को महत्व दिया जाता . इसका माने धर्म तथा विश्वास के मामले में आजादी है, उन लोगो को भी आजादी जिनका कोई धर्म नहीं हैं . इसका माने हैं कि सब धर्मों को पूरी छूट है केवल इस प्रतिबन्ध के के साथ कि वे एक दुसरे के साथ या देश के मौलिक विचारों के साथ दखलंदाजी नहीं करें . इसका माने है कि धर्म के दृष्टिकोण से अल्पसंख्यक समुदाय इस स्थिति को स्वीकार करें . इससे भी अधिक इसका माने है कि धर्म की मामले में बहुसंख्यक समुदाय इसे खूब ठीक से समझें . क्योंकि संख्या तथा अन्य कई कारणों से बहुसंख्यक समुदाय हैं, उसकी यह जिम्मेदारी है कि वह अपनी स्थिति का ऐसा इस्तेमाल नहीं करे जिससे कि हमारे धर्मनिरपेक्ष आदर्श पर प्रतिकूल प्रभाव डाले .

  5 अगस्त 1954 को डलहौजी से अपने साथियों के नाम पत्र में नेहरु जी लिखते हैं कि मेरे लिए 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द का माने शब्दकोष वाला नहीं है . यह सामाजिक और राजनीतिक बराबरी का भाव रखता हैं . अतः जातीयता से ग्रस्त समाज सही अर्थ में धर्मनिरपेक्ष नहीं है . मैं किसी के विश्वास के साथ दखलंदाजी करना नहीं चाहता, लेकिन ये विश्वास जहां जाकर जातिगत कुनबों में समाप्त हो जाते हैं, तब वे राज्य के सामाजिक ढाँचे पर असर डालते हैं . समानता के आदर्श को प्राप्त करने में वे हमें रोकते हैं जिसे हम अपना लक्ष्य मानने की बात करते हैं . वे राजनैतिक मामलों में दखलंदाजी करते हैं हैं, ठीक वैसे ही जैसे सांप्रदायिकता करती हैं . सांप्रदायिकता का माने हैं एक धार्मिक समुदाय का हावी होना . अगर वह समुदाय अल्संख्यक है तो यह प्रजातंत्र के सारे विचारों के खिलाफ है . लेकिन अगर वह समुदाय बहुसंख्यक है, तब भी एक धार्मिक समुदाय के रूप में दूसरों पर हावी होना एकदम गैर-प्रजातांत्रिक है . एक अल्पसंख्यक समुदाय का प्रजातांत्रिक ढांचें में इस तरह का सर्वोपरि स्थान प्राप्त करने का कोई मौका नहीं है . लेकिन बहुसंख्यक समुदाय के लिए यह स्थान पाना संभव है . अगर ऐसा होता हैं तो यह आसानी से कहा जा सकता है कि बहुमत धार्मिक बहुमत है और उसी के रूप में का कर रहा है .

नेहरु जी की धर्मनिरपेक्षता उनके राष्ट्रवाद के विचार के साथ निकट से जुडी थी . वे स्वयं किसी धर्म को अन्य धर्मों से श्रेष्ठ नहीं मानते थे, और उन्होंने हिन्दू महासभा जैसे प्रतिक्रियावादी संगठनों की कड़ी आलोचना की . उन्होंने यह सुझाव दिया कि भारत कि हिन्दू-मुस्लिम समस्या को धार्मिक विवाद के रूप में नहीं देखना चाहिए बल्कि इसे धनवान-निर्धन वर्गों के विवाद के रूप में देखना चाहिए, और उसी दृष्टि से इसका समाधान ढूंढना चाहिए . अंग्रेजों ने भारतीय  उद्योगों को नष्ट करके जिन जुलाहों को बर्बाद कर दिया था, वे मुसलमान थे . बंगाल में साधारणतः जमींदार, साहूकार और दूकानदार हिन्दू थे, और मुसलमानों की बहुत बड़ी संख्या गरीब काश्तकारों और छोटे-छोटे पट्टेदारों की थी . इससे शोषण की प्रथा को बढ़ावा मिला . यही शोषण हिन्दू-मुस्लिम तनाव का मूल कारण था, उनके पृथक-पृथक धर्म नहीं . धर्मनिरपेक्षता के प्रति नेहरु जी की यह अदम्य निष्ठा भारत के अल्पसंख्यक वर्गों के लिए बहुत बड़ी राहत थी . 1948 में अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय के दीक्षांत भाषण में नेहरु जी ने भारत की धर्मनिरपेक्षता और सार्वभौमवाद पर बल देते हुए ये विचार व्यक्त किए : "जहाँ तक भारत का सम्बन्ध है, मैं इस बारे में कुछ निश्चयपूर्वक बोल सकता हूँ . हम यहाँ अन्तर्राष्ट्रवाद के प्रति सशक्त प्रवृतियों को ध्यान में रखते हुए धर्मनिरपेक्ष और राष्ट्रवादी दिशा में अग्रसर होंगे . वर्त्तमान समय में चाहे कितनी ही भ्रान्ति क्यों न फैली हो, भविष्य का भारत अपने अतीत की तरह अनेक आस्थाओं वाला देश होगा जिन्हें बराबर आदर और सम्मान दिया जाएगा . परंतु यहाँ एक ही राष्ट्रिय दृष्टिकोण को स्वीकार किया जाएगा . मुझे उम्मीद हैं कि यह अपनी छोटी सी दुनिया में सिमटा हुआ राष्ट्रवाद नहीं होगा बल्कि सहिष्णुता से प्रेरित रचनात्मक राष्ट्रवाद होगा जो अपने-आपमें और अपनी जनता की सहज प्रतिभा में विश्वास रखते हुए एक अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था की स्थापना में पूरा-पूरा हिस्सा लेगा . हमारा एक ही अंतिम लक्ष्य हो सकता है- एक विश्व का लक्ष्य ."

   नेहरु जी आर्थिक नीति के मामले में मिश्रित अर्थव्यवस्था का समर्थन किया . 7 अप्रैल 1948 को उद्योग तथा आपूर्ति मंत्री डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा प्रस्तुत किए गए उद्योग नीति प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान संविधान सभा में नेहरु जी ने कहा कि "आज के संवेदनशील लोग मनुष्यों के बीच के भारी अंतर को, उनके बीच की विशाल दुरी, उनके बीच के बड़े फर्क को बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं, जहाँ एक ओर अवसरों का अभाव हैं तो दूसरी ओर अपव्यय की स्थिति है . यह बहुत ही भद्दा दिखाई देता है, और कोई भी देश या व्यक्ति ऐसे भद्देपन को उचित नहीं ठहरा सकता हैं . यदि मैं कहूँ तो 50 या 100 साल पहले ऐसी स्थिति नहीं थी . हालाँकि मुनाफ़ा कमाने की प्रवृति बहुत प्रबल थी और शायद उस समय दुःख-कष्ट भी अधिक थे, फिर भी वह दृष्टिकोण अलग था . शायद सामाजिक मूल्यों के प्रति नजरियाँ अलग था . लेकिन आज की दुनिया के सन्दर्भ में मुनाफ़ा कमाने की प्रवृति न केवल आर्थिक दृष्टि से गलत होती जा रही है, बल्कि संवेदना के किसी भी दृष्टिकोण से निर्लज्ज अशिष्टता का रूप लेती जा रही है . इसलिए बदलाव अवश्यंभावी है . तो फिर आप ये बदलाव किस प्रकार करेंगे ? जैसा मैंने कहा, मैं बिना अधिक सुविचारित ध्वंस या रुकावट के ये बदलाव लाना चाहूँगा, क्योंकि ध्वंस और रुकावट, इनके बाद भविष्य में चाहे कुछ भी घटित हो, निश्चित तौर पर वर्त्तमान के विकास को रोक देते हैं . इनके कारण उत्पादन ठप्प हो जाता हैं . सम्पदा का सृजन रुक जाता है . इसमें संदेह नहीं कि बाद में व्यक्ति को तेजी के साथ किसी काम को कर पाने की स्थिति में आ जाता है, लेकिन यह बात निश्चित नहीं है कि बाद में आप उस काम को उतनी तेजी से कर ही पाएंगे . इसीलिए समझौता करने की आवश्यकता पड़ती है . हालाँकि इस सन्दर्भ में या किसी दुसरे सन्दर्भ में भी मुझे समझौता शब्द पसंद नहीं है, लेकिन हम उसे टाल नहीं सकते हैं . ऐसी स्थिति में हम अर्थव्यवस्था की माध्यमिक अवस्था में पहुँच जाते हैं . आप इसे मिश्रित अर्थव्यवस्था कहें या कोई और नाम भी दे सकते हैं . इसमें चीजें इस तरह से संचालित की जाती हैं कि देश की धन-सम्पति लगातार बढती रहे, और साथ ही देश में धन का वितरण न्यायसंगत ढंग से हो . धीरे-धीरे हम एक ऐसी अवस्था में पहुँचते हैं जहां पूरी अर्थव्यवस्था के गुरुत्वाकर्षण का केंद्र बदल चूका होता हैं . अब, मुझे इस बात को लेकर शंका है कि क्या ये बदलाव टकराव और संघर्ष बार-बार होने वाले संघर्षों के बिना कर पाना संभव है, क्योंकि लोग अपने कुछ निश्चित हितों या विचारों को छोड़ने और नए विचार स्वीकार करने के लिए आसानी से तैयार नहीं होते हैं . कोई भी व्यक्ति जो कुछ उसके पास हो, उसे छोड़ना पसंद नहीं करता है ; कम से कम कोई समूह तो ऐसा करना पसंद नहीं करते हैं; व्यक्ति कभी-कभी ऐसा करने के लिए तैयार हो जाते हैं . ये टकराव लगातार बार-बार होते रहते हैं, लेकिन बात यह है कि, यदि मैं ऐसा कह सकूँ तो, ये झगड़े मूर्खतापूर्ण होते हैं, क्योंकि इनसे घटनाओं का प्रवाह नहीं बदला जा सकता है . इनके कारण प्रक्रिया में देरी हो सकती है, और नतीजा यह होगा कि जो लोग निहित स्वार्थों को पकड़ कर बैठे हैं, अंत में शायद उन्हें ही सबसे ज्यादा नुकसान होगा . "


समाजवाद की ओर नेहरु जी का झुकाव अवश्य था, परंतु मिश्रित अर्थव्यवस्था की नीति के अंतर्गत उन्होंने समाजवाद को वहीँ तक अपनाने का आग्रह किया जहां तक वह कल्याणकारी राज्य के साथ निभ सकता हो . वास्तव में उन्होंने समाजवाद को एक जीवन-दर्शन के रूप में अपनाया, केवल आर्थिक पुनर्निर्माण के साधन के रूप में नहीं . उन्हीं के नेतृत्व में भारतीय संसद ने 1955 में सामाजिक-आर्थिक पुनर्निर्माण के वे प्रतिमान स्वीकार किए जिन्हें सामूहिक रूप से 'समाज का समाजवादी ढांचा' कहा जाता है . इसमें मुख्यतः इन सिद्धांतों का समावेश किया गया था : विकास की नीति ऐसी होनी चाहिए जिससे सम्पूर्ण समाज को लाभ हो, इने-गुने लोगों को नहीं; नियोजन का उद्देश्य केवल राष्ट्रिय आय और रोजगार में वृद्धि तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसके द्वारा आय और सम्पदा में समानता लाने का प्रयत्न करना चाहिए . दुसरे शब्दों में, समाज के पिछड़े हुए वर्गों को आर्थिक विकास का अधिक-से-अधिक लाभ प्राप्त होना चाहिए; और आय, संपदा और आर्थिक शक्ति के जमाव में उत्तरोतर कमी होनी चाहिए . तब से यही सिद्धांत भारत के पंचवर्षीय योजनाओं के आधारतत्व बन गए .

 नेहरु जी का राजनीतिक-दर्शन आधुनिक भारत के निर्माण का दर्शन था जिसमें यहाँ की स्वस्थ परंपराओं के पुनरुत्थान के साथ-साथ नए विचारों, ज्ञान-विज्ञान और तकनीकों को अपनाने की प्रेरणा निहित थी . इसका ध्येय न विश्व शान्ति और मानव-कल्याण के आदर्शों को भी समुचित स्थान दिया गया था .लेखक सोशलिस्ट युवजन सभा के अध्यक्ष हैं .


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