जनादेश

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यह मैन्युफैक्चर्ड जनादेश है

आशुतोष कुमार 

नई दिल्ली .यह पूरी तरह मैन्युफैक्चर्ड यानी विनिर्मित जनादेश है. इसे पिछले पांच वर्षों में टीवी और व्हाट्सएप के सहारे बनाया गया.इस प्रक्रिया की शुरुआत जेएनयू को देशद्रोह के अड्डे के रूप में प्रचारित करने से हुई और यह पुलवामा में उरूज पर पहुंची.

जेएनयू और पुलवामा कैसे घटित हुए, कोई नहीं जानता. जानना जरूरी भी नहीं है. जनादेश के विनिर्माण में महत्व घटना का नहीं, उसके विरचित वृतांत का होता है.

वृत्तांत चूंकि वृत्तांत है, वह घटना पर निर्भर नहीं है. वह घटना को परिकल्पित कर सकता है. वृत्तांत को विश्वसनीय बनाने के लिए जरूरत सिर्फ़ सक्षम माध्यम की है. टीवी और सोशल मीडिया के रूप में यह माध्यम मौज़ूद था और मोदीजी की मुट्ठी में था.


वृत्तांत यह रचा गया कि देश संकट में है. वह भीतरी और बाहरी दुश्मनों से घिरा हुआ है. दोनों तरह के दुश्मन एक दूसरे के साथ तालमेल में काम कर रहे हैं. इस महान संकट से देश को केवल मोदी जैसा छप्पन इंच वाला बचा सकता है.विपक्ष के पास इसकी कोई काट न थी. हो भी नहीं सकती थी, क्योंकि टीवी और सोशल मीडिया पर वर्चस्व के मामले में वह मोदी जी का मुक़ाबला नहीं कर सकता था.


देश ख़तरे में के वृत्तांत की काट विपक्ष ने रोजगार, राफेल और किसान प्रश्न के वृत्तांत से करनी चाही. उसने इसे नागरिक ख़तरे में का वृतांत बनाना चाहा. इस काट को नाकाम होना ही था.निजी संकट कभी भी देश के संकट से बड़ा नहीं हो सकता. इसीलिए इस चुनाव में बारबार यह सुनने को मिला कि एक जून खाएंगे पर मोदी को जिताएंगे.विपक्ष कुछ भी कर लेता, वह राज्य के इशारे पर मीडिया द्वारा निर्मित संकट के इस वृतांत की काट नहीं कर सकता था. ऐसे विरचित वृत्तांतों की काट केवल जमीनी जनांदोलनों से हो सकती है.


लेकिन पिछले पांच वर्षों में आपने विपक्ष को किसी जनांदोलन की तैयारी करते देखा? राजनीतिक विपक्ष था कहाँ? सिर्फ़ छात्रों, बुद्धिजीवियों और किसानों ने विपक्ष का कुछ आभास पैदा किया, लेकिन वे राजनीतिक विपक्ष की जगह नहीं ले सकते थे.जहां तक वाम की भूमिका का सवाल है, बंगाल में वाम के कम से कम 20 फ़ीसद वोट बीजेपी को गए. यह विडंबना बंगाल में वाम राजनीति के खोखलेपन के बारे में बहुत कुछ कह देती है.


आंदोलन कौन करेगा? सामाजिक न्याय की राजनीति अपनी आन्दोलनी धार खो चुकी. कांग्रेस जमाने पहले आंदोलन से उपराम हो चुकी. वाम आंदोलन की रही सही ऊर्जा भी खो चुका.नहीं तो मौका सामने है. बेरोजगारी और मॉब लिंचिंग पर आंदोलन खड़े कीजिए. मोदी जीते हैं, मगर पहले से कमजोर हैं.विपक्ष हारा, मगर पहले से मजबूत है.साभार 

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