जनादेश

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बांग्लादेश से घिरा हुआ है मेघालय

सतीश जायसवाल 

ऊपर की तरफ लगने वाले भूटान के बॉर्डर को छोड़ दिया जाए तो मेघालय बांग्लादेश से घिरा हुआ है. चेरापूंजी से १०० किलोमीटर के भीतर एक तरफ-- शीला प्वाइन्ट है और एक तरफ-- डावकी प्वाइन्ट है,जहां से बांग्लादेश अपनी आंखो के सामने होता है. शीला प्वाइन्ट बिलकुल पहाड़ी कगार पर है. यहां से कोई साढ़े ३ हजार फ़ीट नीचे बांग्लादेश के घरों की टीन वाली छतें, सड़कें, सडकों पर चल रहे लोगों और वाहनों को देखना ऐसा लगता है जैसे किसी ऊंची हवेली के छज्जे से झांकते हुए उस देश को ठीक अपनी आँखों के नीचे देख रहे हैं. यह मेरा देखा हुआ है. ''डावकी प्वॉइन्ट'' भी सरहद पर है. अपने इस प्रवास में मैंने वह भी देख लिया.

डावकी एक सुन्दर नदी है जो भारत-बांग्लादेश की सरहद रेखा भी है. इसके आधे पर भारत का और आधे पर बांग्लादेश का अधिकार है. हम बहुत दूर तक इस नदी के साथ साथ चले. बताया गया था कि अपने नीले तलदर्शी पानी के लिए यह नदी दर्शनीय भी है. लेकिन बारिश भी हमारे साथ-साथ चल रही थी. और उसकी वजह से नदी का पानी मटमैला हो रहा था. नदी से कोई किलोमीटर भर पर, तामाबिल में बॉर्डर का चेकपोस्ट है. तामाबिल एक गांव है लेकिन दो देशों में बंटा हुआ है. इसका आधा भारत में और आधा बांग्लादेश में है. उस तरफ वाला तामाबिल सिलहट जिले में है. मेरे अपने मित्रों में एक - मिहिर गोस्वामी हैं जिनका पैतृक गांव सिलहट जिले में ही है. वापस लौटकर मिहिर को बताऊंगा. शायद वह मुझे बता सकेगा कि इस तामाबिल से उसका अपना पैतृक गांव कितनी दूर होगा. दोनों तरफ के लोगों का आना-जाना भी यहाँ होता रहता है. परमिट मिल जाता है.

नारियल और सुपाड़ी के पेड़ दोनों तरफ एक जैसे हैं. बांस और कदली वनों की हरियाली दोनों तरफ एक जैसी है. अनानास की फसलें भी दोनों तरफ हैं. और यह अनानास के फलने का मौसम है. फर्क है तो बस इतना कि इधर भारत के स्वागत वाक्य हिन्दी और अंग्रेज़ी में और उधर बँगला और अंग्रेज़ी में लिखे हुए हैं. सामने, बैरियर के उस तरफ काले रंग की कार खड़ी हुयी है. उसकी नंबर प्लेट भी बांग्ला में ही लिखी हुयी है. दो सुन्दर महिलाएं उस कार से उतरीं. और उन्होंने भी हमारी तरह की सुखद विस्मितियों के साथ उधर से इधर देखा. फिर ''बैरियर'' पार करके इधर चली आईं. शायद वो माँ और बेटी होंगी. मैंने उनसे बात करनी चाही. मैं उनकी आवाज़ सुनना चाहता था. क्योंकि वो दोनों उस तरफ से आ रही थीं, जिधर हम नहीं जा सकते थे. क्योंकि उस तरफ जाने के लिए हमारे पास वो ज़रूरी कागजात नहीं थे, जो इधर आने के लिए उन दोनों के पास होंगे.चेकपोस्ट पर तैनात जवानों ने मुझे उनके साथ बात नहीं करने दिए. और विनम्र परहेज़ के साथ मुझे अपनी तरफ की ज़मीन पर वापस ले आये. अर्थात ''ज़ीरो प्वॉइंट'' से इस तरफ.फोटो साभार 

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