जनादेश

जब तक जिए शान से जिये चन्द्रशेखर असली समस्या तो बुद्धि है सादगी में मुस्कुराता चेहरा यानी चंद्रशेखर गांव ,गरीब और पेड़ के लिए सत्याग्रह गुजर जाना एक दरख्त का जोमैटो में चीन का निवेश रुका कोई क्यों बनती है आयुषी क्या समय पर हो जाएगा वैक्सीन का ट्रायल हरफनमौला पत्रकार की तलाश काफ़्का और वह बच्ची ! कोरोना ने चर्च भी बंद कराया सरकार अपनी जिम्मेदारियों से क्यों भाग रही है? वसूली का दबाव अलोकतांत्रिक विपक्षी दलों ने कहा ,राजधर्म का पालन हो पुर्तगाल ,गोवा और आजादी कब शुरू हुई बाबाओं की अंधविश्वास फ़ैक्ट्री कोरोना से बाल बाल बचे नीतीश आंदोलनकारी या अतिक्रमणकारी ओली के बाद प्रचंड की भी राह आसान नही खामोश हो गई सितारों को उंगली से नचाने वाली आवाज

क्या सरकारों के खैरख्वाह बन गए हैं अख़बार ?

अरुण कुमार त्रिपाठी

आज हिंदी पत्रकारिता 194 वर्ष पुरानी हो गई.30 मई 1826 को कलकत्ते से हिंदी के पहले साप्ताहिक अखबार `उदंत  मार्तंड’ का प्रकाशन हुआ था.संपादक थे पंडित जुगलकिशोर शुकुल.इस शब्द का अर्थ है समाचार-सूर्य.यह अखबार सचमुच हिंदी समाचार जगत का सूर्य ही था.पत्र का उद्देश्य था हिंदुस्तानियों के हित हेतु उन्हें परावलंबन से मुक्ति दिलाकर स्वतंत्र दृष्टि प्रदान करना.यह पत्र प्रति मंगलवार को प्रकाशित होता था.लेकिन यह पत्र लंबा नहीं चल सका.पंडित अंबिकाप्रसाद वाजपेयी लिखते हैं, `` सरकार `जामे जहानुमा’ नाम के फारसी पत्र और `समाचार दर्पण’ नाम के बंगला पत्र को आर्थिक सहायता देती थी.इसी के भरोसे जुगल किशोर ने `उदंत मार्तंड’ निकाला था.परंतु वह न मिली और किसी धनी मानी से सहायता मिलने की आशा न रही.तब यह मार्तंड अस्तांचल को चला गया।’’ कुल मिलाकर यह पत्र डेढ़ साल ही चला और 4 दिसंबर 1827 को बंद हो गया.पंडित जी ने भारी मन से 4 दिसंबर के अंतिम अंक में यह पंक्तियां लिखीं ------

आज दिवस लौ उग चुक्यौ मार्तंड उदंत

अस्तांचल को जात है दिनकर दिन अब अंत

डा राम रतन भटनागर ने इस अखबार की कथा के बारे में लिखा है , `` उन दिनों सरकारी सहायता के बिना किसी भी पत्र का चल पाना असंभव था.कंपनी सरकार ने मिशनरियों के पत्र को डाक आदि की सुविधाएं दे रखी थीं.परंतु चेष्ठा करने पर भी उदंतमार्तंड को यह सुविधा प्राप्त नहीं हो सकी. हालांकि उस पत्र की भाषा को आज के पाठकों के लिए समझ पाना कठिन है फिर भी जो लोग पछाहीं और बंगला को जानते हैं वे उसका अर्थ निकाल ही लेंगे.पत्र की अंतिम विज्ञप्ति में शुक्ल जी लिखते हैं कि पछाहियों में इस बात की तड़प थी कि अंग्रेजी, फारसी और बंगला के पत्र तो हैं लेकिन हिंदुस्तानियों का कोई पत्र नहीं है.इसलिए वे इसकी सहायता के लिए आगे आए भी.उन्होंने बही में सही किया लेकिन असली जरूरत थी सरकार अंग्रेज कंपनी महाप्रतापी की कृपा की.शुक्ल जी चाहते थे कि जैसे वह कृपा औरों पर पड़ रही है वैसे ही उन पर भी पड़े लेकिन वह नहीं हो सका.

हालांकि शुक्ल जी हार मानने वाले नहीं थे.उन्होंने 23 वर्ष बाद 1850 में `सामदंत मार्तंड’ नामक एक और पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया जो पहले वाले की तरह की अल्पजीवी रहा.नवंबर 1931 के पहले तक लोगों की धारणा थी कि हिंदी का पहला अखबार बनारस अखबार है.इसका प्रकाशन राज शिव प्रसाद की सहायता से 1845 में बनारस से हुआ था.लेकिन बंगला के प्राचीन ग्रंथों के अन्वेषी ब्रजेंद्रनाथ बंदोपाध्याय को कुछ प्राचीन पत्र मिले और उन्होंने यह साबित किया कि हिंदी का पहला पत्र `उदंत मार्तंड’ ही था.उन्होंने मार्च 1931 में विशाल भारत में हिंदी का प्रथम समाचार पत्र शीर्षक से लेख लिखकर यह सिद्ध किया कि `उदंत मार्तंड’ ही पहला पत्र है हिंदी का.

`उदंत मार्तंड’  का यह इतिहास आज फिर इस की याद दिला रहा है कि सरकारी सहायता के बिना पत्रों का चलना कितना कठिन है.जो पत्र सरकारी नीतियों के गुणगान नहीं करता और उसकी आलोचना करता है उसके लिए  निकल पाना बहुत मुश्किल है.तकरीबन 200 वर्षों की इस यात्रा में हिंदी पत्रकारिता ने बहुत सारे उतार चढ़ाव देखे हैं.वह अंग्रेजी राज से लोहा भी लेती रही है और आजाद भारत में राष्ट्रनिर्माण का काम भी करती रही है.वह खूब फली फूली और राजकुमारी और महारानी की तरह सजी धजी भी.

अंग्रेजी अखबारों के मुकाबले हिंदी अखबारों ने ज्यादा मजबूती से आजादी की लड़ाई लड़ी और अंग्रेजी शासन का विरोध किया.लेकिन आज हिंदी अखबारों की स्थिति उल्टी हो चली है.कभी बागी होने वाले अखबार आज सरकारों के ज्यादा खैरख्वाह हो गए हैं और सच्चाई से दूर रह कर अपना व्यावसायिक हित साध रहे हैं.अगर युगलकिशोर शुक्ल ने अपना अखबार हिंदुस्तानियों के हित हेतु स्वतंत्रता की चेतना जगाने के लिए अखबार निकाला था तो आज धन कमाने और अपनी हैसियत बनाने के लिए पत्र निकाले जा रहे हैं.हिंदी अखबार सवाल नहीं करते.वे लगभग वैसे ही हो चले हैं जैसे कि तमाम हिंदी चैनल.बल्कि अखबार चैनलों की नकल में अपना टीवीकरण कर रहे हैं.उनके शीर्षक उनकी समाचारों का प्रस्तुति और खबरों को सनसनीखेज बनाने का उनका तरीका चैनलों से मिलता जुलता है.

हिंदी अखबारों और पत्रिकाओं ने हिंदी की जातीय चेतना और खड़ी बोली के विकास का काम अब छोड़ दिया है.वे बाजार के माध्यम से पूंजीवाद के विकास में लगे हैं.इस बात को भारत की समाचार पत्र क्रांति में राबिन जैफ्री ज्यादा साफ तरीके से व्यक्त करते हैं.इसका एक कारण तो यह है कि ज्यादातर मालिक स्वयं ही संपादक बने हुए हैं और दूसरा कारण यह है कि कई संपादक मालिक बन बैठे हैं.पर इसके पीछे अखबारों के उत्पादन पर होने वाला भारी खर्च भी है.उनमें लगने वाला कागज, स्याही, छपाई का खर्च, दफ्तर और प्रेस की बिल्डिंग का खर्च, कर्मचारियों के वेतन का बजट और उसके वितरण का व्यय सामान्य नहीं है.इसी के साथ असमान्य है उनकी कमाई भी.

यह ऐसा समय है कि जब अखबारों और उसके मालिकों का चिंतनशील और अध्ययनशील संपादकों और पत्रकारों से बिगाड़ हो चला है.उन्हें ऐसे संपादक और पत्रकार चाहिए जो सत्ताधारियों से जनसंपर्क बनाकर रखें और व्यवसाय में मददगार हो सकें.उन्हें शोधपरक और सत्य के अन्वेषी और साहसी पत्रकार नहीं चाहिए.अखबार मालिकों को न सिर्फ विज्ञापन चाहिए बल्कि सत्ता का साथ भी चाहिए.इसलिए सभी अखबारों को वैसी ही आज के सरकार की महती कृपा चाहिए जैसी कि युगलकिशोर शुल्क जी कंपनी की महाप्रतापी कृपा चाहिए थी.हालांकि शुक्ल जी उसके लिए किसी भी तरह का समझौता करने को तैयार नहीं थे लेकिन आज के अखबार और उसके मालिक कोई भी समझौता कर सकते हैं.अखबारों की मौजूदा स्थिति देखकर बाबूराव विष्णु पराड़कर की 1926 की संपादकों के सम्मेलन की वृंदावन में की गई वह भविष्यवाणी याद आती है कि आने वाले समय में अखबार बहुत सुंदर कागज पर रंगीन तरीके से निकलेंगे और संपादकों की तनख्वाहें बहुत ऊंची होंगी.लेकिन उनके पास वह स्वतंत्रता नहीं होगी जो आज है.इन स्थितियों को देखते हुए कहा जा सकता है कि आज हिंदी पत्रकारिता को फिर से युगलकिशोर शुक्ल, श्यामसुंदर सेन, अंबिका दत्त वाजपेयी, माखनलाल चतुर्वेदी, माधवराव सप्रे, बाबूराव विष्णु पराड़कर, गणेश शंकर विद्यार्थी, धर्मवीर भारती, अज्ञेय, रघुवीर सहाय, राजेंद्र माथुर, प्रभाष जोशी, अशोक जी, चंद्रोदय दीक्षित और सुरेंद्र प्रताप सिंह की आवश्यकता है तभी उसकी खोई हुई गरिमा उसे मिल सकेगी और तभी इस पत्रकारिता दिवस को मनाने की सार्थकता होगी.


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