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मद्रास में गढ़े गए थे देशभक्त रामनाथ गोयनका

अरुण कुमार त्रिपाठी

भारतीय पत्रकारिता जब आज इतनी लाचार, बेबस, गूंगी और झूठी हो गई है तब उसके पुरोधा रामनाथ गोयनका बहुत याद आते हैं.एक पत्रकार, व्यवसायी, देशभक्त, स्वतंत्रता सेनानी, राष्ट्रनिर्माता और राजनीतिज्ञ के रूप में गोयनका जी अपने जीवन में ही एक किंवदंती बन गए थे.अगर आज वे होते तो क्या भारतीय पत्रकारिता सत्ता के आगे इतना घुटने टेकती? क्या आज शासक दल की चाटुकारिता में बिछे और विपक्ष से बार बार तीखे सवाल पूछने वाले पत्रकार उनके होने पर सत्ता से सवाल पूछने और उसकी नाकामियों को उजागर करने की हिम्मत कर पाते? शायद हां, शायद ना.हां इसलिए कि गोयनका जी जिस मिट्टी के बने थे उसमें डरने और दबने वाले तत्व थे ही नहीं.लेकिन ना इसलिए कि आज पत्रकारिता, पूंजी और सत्ता की वैचारिकी का रिश्ता इतना बदल गया है कि कोई सरकार से टकराने की स्थिति में नहीं है।

बिहार में  3 अप्रैल 1904 को बसंतलाल गोयनका के परिवार में जन्मे रामनाथ गोयनका के निर्माण में बिहार और कलकत्ता का सीमित योगदान है.वे आरएनजी जो बने हैं मद्रास में जाकर.हालांकि उनके भीतर देशभक्ति के अंकुर तो कलकत्ता की आबोहवा और देश की परिस्थितियों के कारण फूट चुके थे.जैसा कि मारवाड़ियों में गोद लेने की व्यापक परंपरा है तो उसी के अनुसार रामनाथ गोयनका को भी एक मारवाड़ी महिला ने गोद लिया था.1919-20 में जब वे सोलह साल के हुए तो अपनी दत्तक मां के भाइयों यानी मामाओं के साथ व्यापार में उतर गए.उनके मामा थे बाबू प्रहलादराय डालमियां और बाबू सागरमल डालमियां.व्यापार के साथ उन्होंने कलकत्ता के सूत और कटपीस के व्यापारी सुखदेव दास रामप्रसाद के सहयोगी सूरजमल नागरमल के साथ अप्रैंटिस करना शुरू किया.यह काम 30 रुपए महीने पर था.लेकिन यह काम काफी थकाऊ और अपमानजनक था, इसलिए वे उसे लंबे समय तक कर नहीं पाए.

रामनाथ जी ने इधर व्यापार शुरू किया उधर देश में आजादी का आंदोलन जोर पकड़ रहा था.उसी साल देश में जलियांवाला बाग का नरसंहार हुआ.रौलेट एक्ट भी आ चुका था और गांधी ने असहयोग आंदोलन शुरू कर दिया था.किशोर रामनाथ भी कैसे उससे अछूते रहते.प्रदर्शन में हिस्सा लिया और गिरफ्तार हो गए.छूटे तो बंगाल के क्रांतिकारियों से सटने लगे.उनकी बढ़ती क्रांतिकारिता से व्यापार करने वाले मारवाड़ी समाज के कान खड़े हो गए.मारवाड़ी समाज अपने एक होनहार युवक को क्रांतिकारी आंदोलन के करीब जाते देखकर बेचैन हो उठा.रामनाथ के मामा प्रहलाद डालमिया का मारवाड़ी समाज में बड़ा रुतबा था.लोग किसी भी जटिल समस्या पर उनकी राय लेते थे और मदद भी.प्रहलाद डालमियां से राय ली गई और मारवाड़ी समाज ने इस युवक को हिंसक गतिविधियों से निकालने के बारे में गंभीरता से विचार किया.तय किया गया कि इस युवक को कलकत्ता से कहीं दूर भेज दिया जाए ताकि वह यहां के क्रांतिकारियों से अलग हो जाए।

इस तरह क्रांतिकारी बन रहे रामनाथ को मद्रास भेज दिया गया बिजनेस करने.उस समय बंगाल अंग्रेज सरकार के विरुद्ध उबल रहा था लेकिन मद्रास शांत था.रामनाथ जब तक बालिग होते तब तक मद्रास पहुंच चुके थे.उनका मद्रास प्रवास 1922 में शुरू हुआ.वे मद्रास में सुखदेवदास रामप्रसाद के एजेंट बने और वाकर एंड कंपनी के दुभाष.दुभाष अलग अलग भाषा बोलने वालों के बीच संवाद कराने वाले व्यक्ति को कहते हैं.लेकिन इसी के साथ ब्रोकर को भी कहते हैं.रामनाथ ने यह दोनों भूमिकाएं निभाईं.अपने मद्रास प्रवास की स्थितियों को वे अपने एक संस्मरण से व्यक्त करते थे जो अपने में एक मुहावरा बन गया था.रामनाथ जी कहते थे कि वे मद्रास एक लोटा और छह हाथ की धोती लेकर आए थे और बाद में जब दुनिया से जाएंगे तो यही छोड़कर जाएंगे.यह एक प्रकार से अनाशक्ति योग का दर्शन था जो उनके जीवन में रम गया था.उनका यह विचार तालस्ताय की उस कहानी से मिलता था जिसमें एक व्यक्ति ज्यादा जमीन की भूख में दिन भर दौड़ता है और थक कर गिर जाता है और दम तोड़ देता है.उस कहानी का संदेश यही है कि मनुष्य को छह फुट और तीन इंच जमीन ही चाहिए.इसलिए इतनी जायदाद खड़ी करने वाले रामनाथ सदैव संपत्ति से अनाशक्त रहे.उन्हें इसीलिए सत्ता से खौफ नहीं लगता था।

बिहार में जन्मे, कलकत्ता में राजनीतिक चेतना प्राप्त करने वाले और व्यवसाय सीखने वाले रामनाथ के लिए मद्रास एक दम नया शहर था.न वे वहां की भाषा से परिचित थे और न ही वेशभूषा और खानपान से.शुक्र मनाइए वहां शोकारपेट वाले इलाके में गुजराती और उत्तर भारतीय समुदाय के व्यापारी रहते थे.उसी के साथ ही सटा था आर्मीनिया स्ट्रीट और चाइना बाजार.शुरू में रामनाथ जी एक चौधरी परिवार के साथ रहे.कुछ दिनों बाद उनकी शादी हुई और पत्नी मूंगीबाई उनके साथ आ गईं.मूंगीबाई के आने के बाद वे दमानी हाउस में चले गए.यह भवन चेन्ना नाइकर स्ट्रीट पर स्थित है.यहीं रामनाथ जी की संतानें पैदा हुईं.बड़ा बेटा भगवान दास, बेटियां राधा और कृष्णा यह तीन संतानें रामनाथ जी और मूंगीबाई को हुईं.बाद में उन्होंने यही भवन लड़कियों के स्कूल के लिए दान कर दिया.इसमें खुला मूंगीबाई गर्ल्स स्कूल.

रामनाथ जी ने 1926 में अपना स्वतंत्र व्यापार शुरू किया.उन्होंने मुरलीप्रसाद मोहनप्रसाद एंड कंपनी के साथ भागीदारी की और बांबे कंपनी के दुभाष बने.दुभाष के तौर पर वे यह सलाह देते थे कि कंपनी किसके साथ व्यापार करे और किसे सामान दे.इसके बदले उन्हें रुपए में एक पैसा यानी 0.5 प्रतिशत का कमीशन मिलता था.रामनाथ जी हिंदी अंग्रेजी और तमिल सीख गए थे और कंपनियों और व्यापारियों के लिए उपयोगी सिद्ध हो रहे थे.लेकिन उनकी देशभक्ति और राजनीतिक प्रतिभा छुपाए छुप नहीं रही थी.सीआर राजगोपालाचारी और जमनालाल बजाज का ध्यान उनकी ओर गया और उन्होंने उन्हें दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा से जोड़ा.गांधी जी ने उनकी ओर ध्यान दिया और उन्हें इस संगठन का आजीवन ट्रस्टी बना दिया।

रामनाथ जी की ओर सीपी रामस्वामी अय्यर की निगाह पड़ी और उन्हें मद्रास विधान परिषद का सदस्य मनोनीत कर दिया.उस समय उनकी उम्र 22 साल की थी.आमतौर पर धारासभाओं के मनोनीत सदस्य सरकार का समर्थन करते हैं.लेकिन रामनाथ जी विपक्ष की ओर से ही बोलते थे.उनकी राजनीतिक निष्ठा से प्रभावित होकर उन्हें इंडिपेंडेंट पार्टी का सचिव बना दिया गया.धाराप्रवाह तमिल बोलने वाले रामनाथ जी वहां के समाज के लिए उपयोगी साबित हो रहे थे.इस दौरान उन्हें लोग प्यार से आरएनजी कहने लगे थे.उनकी मद्रास में एक पहचान बन गई थी.वे खादी का कुर्ता और धोती पहनते थे लेकिन गांधी टोपी नहीं लगाते थे.रामनाथ गोयनका और उनके साथी केएन कोटनीस ने 28 मार्च 1929 को मद्रास के समुद्र तट पर 844 एकड़ का एक प्लाट 60,500 रुपए में खरीदा.यहीं से 1932 में इंडियन एक्सप्रेस समूह की शुरुआत हुई जो बाद में देश का एक प्रमुख समाचार पत्र समूह बना.इस तरह तैयार हुआ एक देशभक्त, विधायक, व्यवसायी और समाज सुधारक जिसने नए भारत के निर्माण में अपना अमूल्य योगदान दिया.  

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