बस्तर की इमली खाई है कभी ?

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बस्तर की इमली खाई है कभी ?

अल्लू चौबे 

बस्तर .इमली का नाम आते हैं मुंह में खट्टे का एहसास होता है लेकिन दरभा घाटी की इमली खट्टी नहीं बल्कि हल्की मीठी- खट्टी होती है . जिसकी मांग देश और विदेश में सबसे अधिक  रहती है.इस वजह   से सबसे महंगी इमली दरभा घाटी की बिकती है .दरभा घाटी वही घटी  है जहां पूरे देश को  दहलाने वाली घटना झीरम हत्या  कांड हुआ था. इसमें कांग्रेस  की अगले पंक्ति के करीब-करीब सभी  नेताओं की हत्या नक्सलियों द्वारा की गई थी ,सूत्रों के अनुसार  इस घाटी की  इमली पर भी नक्सलियों का  कबजा है जानकार बताते हैं कि नक्सली इन इमली को तोड़ कर दक्षिण भारत के जरिए पूरे देश  और विदेश में भेजते हैं जिससे उन्हें अच्छी खासी इनकम होती है . इसलिए भी इस इलाके में अपना सख्त नेटवर्क और दबदवा  कायम करने के लिए प्रतिबद्ध हैं यह पूरा इलाका  कांगेर वैली के नाम से जाना जाता है जिसमें दुर्लभ जड़ी बूटियां अभी मिलती है राज्य पक्षी मैना भी इस इलाके में अपना घोंसला बनाकर वंश वृद्धि करती है.


 बस्तर संभाग वैसे तो वन उपज के नाम से पूरे देश में जाना जाता है लेकिन इमली को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसने अपनी एक अलग पहचान बना ली है .बस्तर की इमली  थाईलैंड ,अफगानिस्तान ,श्रीलंका सहित खाड़ी के कई देशों में मशहूर है . बस्तर से हर साल सैकड़ों टन इमली विदेश में भेजी जाती है . लेकिन इस बार लॉक डाउन के चलते बस्तर की इमली विदेशों में तो दूर देश में भी नहीं पहुंच पा  रही है इससे यहां के आदिवासियों और इमली व्यापार से जुड़े व्यापारियों को  घाटा ना तय है.

 हर वर्ष दक्षिण बस्तर ,बस्तर ,नारायणपुर ,दंतेवाड़ा से करीब 11 सो करोड़ का  इमली व्यापार होता है.भारत में ही 300 करोड़ की इमली  बस्तर से दूसरे  राज्यों में जाती थी  लेकिन इस बार कारोबार ठप पड़ा है . बस्तर की इमली की खासियत यह है कि इस इमली में गूदा बहुत अधिक होता है रेशे कम होते हैं जिसके कारण इसकी मांग सबसे तेज होती है .बस्तर की दरभा घाटी में पाए जाने वाली इमली मीठी भी होती है .इसलिए उत्तर भारत और विदेशों में मुख्यतःथाईलेंड , श्रीलंका दुबई और यूएई में दरभा घाटी की इमली की मांग हमेशा तेज  रहती है .इससे यहाँ के आदिवासी और निजी व्यापारियों को अच्छी खासी कीमत इसकी मिल जाती है.

 लॉक डाउन के चलते ना तो आदिवासी बाजारों में इमली लेकर आप आ रहे हैं और ना ही व्यापारी इमली खरीद पा रहे हैं इमली के  व्यापारियों संगठन ने कहा है कि इस बार राज्य के व्यापारियों से भी संपर्क नहीं हो पाया है विदेश के व्यापारियों की तो बात ही छोड़ दीजिए लाक  डाउन के चलते इस बार इमली व्यापार को 1000 करोड़ से ऊपर का नुकसान होना तय है. पिछले दो दशकों से जिस तरीके से इमली  की मांग देश और विदेश में हुई है .उसको लेकर ट्रायफेक ने यहां  स्थानीय स्तर पर लघु उद्योग लगाकर इमली की चपाती बनाने का काम भी शुरू किया है इस काम में बस्तर की 500 से अधिक महिलाएं लगी हुई है इमली को पेड़ से तोड़कर अपने आंगन में सुखाकर ऊपर का छिल्का   रेशा और बीज मशीनों द्वारा निकाल कर बचे  गूदा  की चपाती और  चिकी  बनाकर  साफ-सुथरी पैकिंग की जाती है .. मांग के अनुसार तैयार की जा रही चपाती की मांग बहुत है . इस तरह की साफ-सुथरी चपाती की मांग सबसे ज्यादा थाईलैंड दुबई और श्रीलंका से आती है जिससे स्थानीय स्तर पर इन महिलाओं को काफी अच्छी कीमत मिल जाती लेकिन इस बार इमली कारोबारी महिलाएं  घोर निराशा  दौर से गुजर रही है .

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