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तटीय अंचल में बस गए यहूदी

सतीश जायसवाल 

मस्जिदों या चर्चों से अलग,यहूदियों के सायनागागों के निर्माण किसी एक निर्धारित स्थापत्य शास्त्र से बंधे हुए नहीं मिलते. इस समय भारत में कोई ३३ सायनागॉग हैं. लेकिन सभी अलग-अलग स्थापत्य के भव्य निर्माण हैं. और दर्शनीय भी. इज़राइल से बाहर,पुणे के सायनागॉग को एशिया का सबसे बड़ा सायनागॉग माना जाता है. इसकी स्थापत्य शैली 'नव- गोथिक' काल की है. ईरान और इराक से आने वाले बग़दादी यहूदियों ने कोलकता से पहले मुम्बई में अपने सायनागॉग का निर्माण कराया था. मुम्बई के फोर्ट इलाके का वह सायनागॉग अंग्रेजी परम्परा में 'नव गोथिक' स्थापत्य शैली का है. कोलकता में, कैनिंग स्ट्रीट का यह, नेवेन शलोम या नबी सलाम सायनागॉग पुनर्नव-जागरण काल के स्थापत्य वाली, गैरिक रंग की एक भव्य और दर्शनीय ईमारत है.

लेकिन फुटपाथ पर अपना रोजगार-धंधा फैलाये हुए क़ब्ज़ाधारिओं ने इसे घेर लिया है. और इसके भीतर पहुँचने का रास्ता ढूंढ पाना अब एक मुश्किल का काम है. उनकी किसी एक दुकान के बीच से, दो लोगों के गुजरने लायक एक पतली गली जैसी, किसी तरह बच गयी है. वही सायनागॉग की सीढ़ियों तक पहुंचाती है. ये बाहरी सीढ़ियां हैं.


सायनागॉग के मुख्य भाग तक पहुँचाने वाली सीढ़ियां ईमारती लकड़ी की हैं. इसे हम उनके गर्भगृह की तरह समझ सकते हैं. यह एक बहुत बड़ा हाल है. इसके ठीक बीच में ईमारती लकड़ी का ही एक प्लेटफॉर्म या चबूतरा अलग से बना हुआ है. चौकोर घेरे में बंधा हुआ. इस घेरे के भीतर बैठने के लिए दोनों तरफ कुर्सियां रखी हुयी हैं. स्त्रियों और पुरुषों के लिए अलग- अलग. दोनों के बीच एक मुख्य आसन 'रब्बी' या उनके पुरोहित के लिए है. जन्म से लेकर विवाह तक के, यहूदियों के सभी विशिष्ट धार्मिक संस्कार इस घेरे के भीतर संपन्न होते हैं. इन विशिष्ट संस्कारों में 'खतना' या 'खितना' प्रमुख है. 

नियमित प्रार्थनाओं और अन्य अवसरों पर की जाने वाली धार्मिक सभाएँ भी इस मुख्य हाल में ही होती हैं. लेकिन इस घेरे से बाहर. घेरे से बाहर, बेंचों की खड़ी कतारें लगी हुयी हैं. और ऊपर,दोनों तरफ निकली हुयी बालकनी में भी कतार से कुर्सियां लगी हुयी हैं. पुरुष नीचे बैठते हैं और स्त्रियाँ ऊपर,बालकनी में. 

यहूदी,एक अत्यन्त प्राचीन धर्म को मानने वाला परम्परावादी जाति-समुदाय है. इनके धर्मग्रन्थ,संभवतः दुनिया की एक सबसे प्राचीन लिपि -- हिब्रू में हैं. 'तोरा' इनका प्रमुख धर्मग्रन्थ है. यह हिब्रू में ही लिपिबद्ध है. इसे हज़रत मूसा ने सीधे ईश्वर से सुना और लिपिबद्ध किया था. सीधे ईश्वर से प्राप्त 'तोरा' को अत्यंत पवित्र माना जाता है. इसके पदों को धातु की मञ्जूषा में उत्कीर्ण करके सुरक्षित रखा जाता है. यहूदियों में मान्यता है कि 'तोरा' की विद्यमानता पृथ्वी के अस्तित्व से भी पहले थी. इसके पदों का पाठ यहूदी धर्माचरण का एक प्रमुख आधार है.


भारत में पारम्परिक रूप से कोचीन के अतिरिक्त, गोवा, मुम्बई,चेन्नई और कोलकता को यहूदी बसाहटों के केंद्र माना जाता रहा है. लेकिन, १९४८ ई० में इज़राइल के अस्तित्व में आने के बाद मिजोरम और मणिपुर से भी वहाँ के यहूदियों के इज़राइल जाने का सिलसिला शुरू हुआ. तब उधर ध्यान गया. और परम्परावादियों ने मिजोरम और मणिपुर के लोगों को यहूदी मूल का मानने से मना कर दिया. सन २००३-०४ में उनका डीएनए परीक्षण भी कराया गया. लेकिन परीक्षण में वो कोई लक्षण नहीं मिले जो उन लोगों के मध्य-पूर्वीय मूल को प्रमाणित कर सकते. अलबत्ता, सन २००५ में कोलकता में हुए एक उदारवादी अध्ययन के लिए उनके यहां की कुछ स्त्रियों के डीएनए परीक्षण किये गए. और उनमें मध्यपूर्वी आनुवंशिकी के लक्षण बताये गए. लेकिन परम्परावादियों की ओर से इस अध्ययन की काफी आलोचना की गयी.

आखिर, सन २००५ में ही,इज़राइल से 'रब्बियों' या उनके पुरोहितों को आमंत्रित किया गया. और एक धार्मिक व्यवस्था दी गयी. मुख्य 'रब्बी' की उपस्थिति में 'मिकवेह' या पवित्र स्नान की रस्में पूरी करने के बाद उन लोगों का विधिवत धर्मान्तरण किया गया. इसके बाद ही उन्हें समुदाय शामिल किया गया. लेकिन उन्हें एक 'विलुप्त जनजाति' की मान्यता प्रदान की गयी. 'मिकवेह' या पवित्र स्नान की यह क्रिया धर्मान्तरण के लिए अनिवार्य होती है. 


सामान्य तौर पर यहूदियों की पहिचान एक समृद्ध व्यापारिक समुदाय की है. ये लोग बहुमूल्य रत्नों के अच्छे पारखी होते हैं. और कोलकता के चाय व्यवसाय और जूट उद्योग के विकास मे इस समुदाय का बड़ा हिस्सा रहा है. लेकिन इनका अपना इतिहास उद्योग और व्यापार के अतिरिक्त भी है. वह,इनके यहां की विलक्षण प्रतिभाओं की उपलब्धियों से समृद्ध है. 

सन १९४७ में चुनी गयी पहली 'मिस इंडिया' या भारत सुन्दरी,एस्टर विक्टोरिया अब्राहम, भारतीय मूल की नहीं बल्कि कोलकता के बग़दादी यहूदी समुदाय की थीं. लेकिन उनका भारतीय नाम -- प्रमिला था. प्रमिला उन दिनों की हिंदी फिल्मों की तारिका भी रहीं. एस्टर विक्टोरिया या प्रमिला को जब 'मिस इंडिया'' घोषित किया गया, उस समय वह 'मिस' या कुमारी भी नहीं थीं, बल्कि गर्भवती थीं. और अपनी पांचवीं सन्तान की प्रतीक्षा में थीं. पारसियों की तरह यहूदियों के यहां भी अपने जातीय समुदाय के भीतर ही विवाह की परम्परा है. लेकिन कोलकता में जन्मी एस्टर विक्टोरिया अब्राहम पारसी मूल की थीं

और बग़दादी यहूदी मूल के सय्यद हसन अली ज़ैदी से विवाह करके यहूदी हुयी थीं. यह उनका दूसरा विवाह था. बाद में, सन १९६३ में सय्यद हसन अली ज़ैदी पकिस्तान चले गए. लेकिन प्रमिला ने भारत में ही रहने का फैसला किया.


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