जनादेश

बिहार में कोरोना से फैली दहशत नेपाल में अब इमरजेंसी की भी आहट एक सवाल कभी नहीं मर सकता अति राष्ट्रवाद की राजनीति का परिणाम अखबारों की मोतियाबिंदी नजर राजनीतिशास्त्र अपराधशास्त्र की ही एक शाखा है उत्तर प्रदेश में फिर लॉक डाउन ,फ़िलहाल तीन दिन का विकास दुबे की कहानी में कोई झोल नहीं है ? बिहार में राजनीति तो बंगाल में लापरवाही का नतीजा सामने तो बच्चों के दिमाग से लोकतंत्र हटा देंगे ? अपना वादा भूल गए नीतीश दलाई लामा से यह बेरुखी क्यों ? बारूद के ढेर पर बैठा है पटना विदेश नीति में बदलाव करना चाहिए जब तक जिए शान से जिये चन्द्रशेखर असली समस्या तो बुद्धि है सादगी में मुस्कुराता चेहरा यानी चंद्रशेखर गांव ,गरीब और पेड़ के लिए सत्याग्रह गुजर जाना एक दरख्त का जोमैटो में चीन का निवेश रुका

माफिया की शुरुआत कांग्रेस ने की तो सपा ने आगे बढ़ाया

बृजलाल

लखनऊ.राजनीति का अपराधीकरण रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का  स्वागत है.उम्मीद की जानी चाहिए कि अब अपेक्षाकृत चुनावों में आपराध प्रवृत के कम लोग हिस्सा ले सकेंगे. हालांकि राजनितिक दलें अपने अपराधी शुभचिंतकों के कोई न कोई आब्सन निकाल ही लेंगे.  राजनैतिक लोगों ने पहले अपराधियों का उपयोग किया और उन्होंने अपने बाहुबल से उन्हें चुनाव जिताया. अस्सी के दशक़ में बाहुबलियों ने राजनीति की परिभाषा बदल दी.राजनीति के आपराधीकरण की शुरुआत पश्चिमी उत्तर प्रदेश से हुई लेकिन बाद में पूर्वी उत्तर प्रदेश भी इसमें अव्वल निकला.इसकी शरुआत नेपाल सीमा के लक्ष्मीपुर विधानसभा सीट से हुई जब बाहुबली  वीरेंद्र शाही निर्दल चुनाव जीतने में कामयाब हुए.यह 1981का उप चुनाव था.मुकाबले में कांग्रेस और संयुक्त कम्युनिस्ट पार्टी के साझा उम्मीदवार बाहुबली हरिशंकर तिवारी के करीबी अमर मणि त्रिपाठी थे.उस वक्त यूपी में कांग्रेस की सरकार थी और करीब करीब पूरी सरकार अमरमणि के पक्ष में उतर आई थी.यह वह दौर था जब चुनाव आचार संहिता अमल में नहीं थी.इसके बाद हरिशंकर तिवारी भी चिल्लूपार विधानसभा सीट विधायक होते रहे.बाद में अमरमणि भी लक्ष्मीपुर से विधायक हुए.लक्ष्मीपुर अब नौतनवां विधानसभा सीट के नाम से हुआ.इस सीक अमरमणि के पुत्र अमनमणि निर्दल विधायक हैं.

   बाद की हालत यह हुई कि अपराधियों ने राजनैतिकों की मदद के बजाय खुद माननीय बनना शुरू कर दिया और उनके क्षेत्र में अच्छे लोगों का चुनाव लड़ना मुश्किल कर दिया.अपराधी से विधायक बन बैठे माननियों ने विरोधियों के कत्ल तक करवाने शुरू कर दिए.इसकी शुरुआत पश्चिमी यूपी से हुई जब 1980 में एटा के बाहुबली विधायक लटूरी सिंह यादव ने अपने पाले गये डकैत महावीर यादव से अपहरण करा कर अपने विरोधी विधायक सतीश शर्मा की हत्या करके शव खेत में गड़वा दिया. डकैत राम प्रकाश अपनी प्रेमिका फूलश्री के साथ पकड़ा गया , तब शर्मा  की लाश आठ महीने बाद बरामद हुई.

      1990 की दशक के बाद तो बाहुबली विधायकों की बाढ आ गयी.सबसे अधिक इन बाहुबलियों को मुलायम सिंह यादव अपनी पार्टी में लाये. दुर्दांत अतीक अहमद, मुख़्तार अंसारी , मदन भैया , ओम् प्रकाश पासवान,डीपी यादव, अमर मणि त्रिपाठी ,फूलन,अरुण शंकर अन्ना, राम गोपाल मिश्रा,धनंजय सिंह, बालेश्वर यादव,अभय सिंह ,बृज़भूषण शरण सिंह ,राजा भैया, राम सेवक पटेल , अभिमन्यु यादव,अखिलेश सिंह, अजीत सिंह , बृजेश सिंह आदि कुछ नाम बहुचर्चित है.फेहरिस्त बहुत लंबी है.

  मुलायम सिंह ने अंर्तराज्यीय डकैत ददुवा के भाई बाल कुमार को सांसद,उसके पुत्र वीर सिंह और  भतीजे को विधायक बना दिया. ददुवा और डकैत ठोकिया के परिवार के लोग ज़िला पंचायत, ब्लॉक प्रमुख आदि बन बैठे.बीड़ी व्यापारी श्यामाचरण गुप्ता सहित वहां के कई लोग ददुवा के आशीर्वाद से सांसद और विधायक बने.

   चम्बल के डकैतों छबिराम यादव , महाबीरा यादव , पोथी यादव, अनार सिंह यादव, निर्भय गूजर का आशीर्वाद लेकर बहुत से लोग मान्यवर बन गये.चम्बल के कुख्यात निर्भय गूजर ने तो मीडिया में बयान दिया कि उसने समाजवादी पार्टी के कई शीर्ष नेताओं को सोने- चांदी के मुकुट पहनाकर उनका स्वागत किया.टीवी चैनलों में उसका थोबड़ा आने के साथ ही  उसके परलोक का मार्ग भी प्रशस्त हुआ और अंततः वह एक मुठभेड़ में मारा गया. यूपी ही क्यों बिहार भी राजनीति के आपराधीकरण करण में फीछे नहीं रहा.

 कुख्यात शहाबुद्दीन, सूरजभान , पप्पू यादव , आनंद सिंह आदि दर्जनों के सांसद और विधायक बनने का रास्ता अपराध ही रहा. यही नही इनमें से कई की पत्नियां भी सांसद और विधायक बन गईं.राजनीति के अपराधीकरण का आलम यह रहा कि चुनाव में डकैतों के अपने आकाओं को मतदान के लिए फ़रमान तक जारी होने लगे. राजनैतिक लोग अपनी जीत के लिए उनकी जी हुज़री करने और आशीर्वाद के लिए पीछे- पीछे घूमने लगे.और इस तरह संसद और विधान सभाएं अपराधियों के अड्डे बन गए.राजनीति पर माफिया के रंग का आलम यह रहा कि उत्तर प्रदेश में बहुचचर्चित गेस्ट हाउस कांड की गूंज से देश की राजनीति थर्रा उठी थी.आज भी इस घटना को लोग भूले नही है जिसमें समाजवादी पार्टी के बाहुबली विधायकों ने बीएसपी के विधायकों का अपहरण कर लिया था और मायावती की हत्या का प्रयास हुआ था.

  कितनी शर्म की बात है कि जिस पुलिस को देखकर अपराधियों की सिट्टी पिट्टी गुम हो जाती थी विधायक व सांसद बनने के बाद इन्हीं अपराधियों को  पुलिसकर्मी सलाम ठोकने लगे.

   सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद थोड़ी उम्मीद जगी है कि देश की जनता को इन सफ़ेदपोश अपराधियों से कुछ राहत मिले.लेकिन इसमें भी सबसे बड़ी बाधा-जब तक सजा न हो जाय तबतक चुनाव लड़ने से वंचित नही किए जाने की वाध्यता है. यदि सजा हो गयी तो पत्नी,बेटा चुनाव जीतेगा और इस तरह भी राज उसी अपराधी का चलेगा.

(यूपी के पूर्व डीजीपी रहे लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

  


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