जनादेश

बिहार में कोरोना से फैली दहशत नेपाल में अब इमरजेंसी की भी आहट एक सवाल कभी नहीं मर सकता अति राष्ट्रवाद की राजनीति का परिणाम अखबारों की मोतियाबिंदी नजर राजनीतिशास्त्र अपराधशास्त्र की ही एक शाखा है उत्तर प्रदेश में फिर लॉक डाउन ,फ़िलहाल तीन दिन का विकास दुबे की कहानी में कोई झोल नहीं है ? बिहार में राजनीति तो बंगाल में लापरवाही का नतीजा सामने तो बच्चों के दिमाग से लोकतंत्र हटा देंगे ? अपना वादा भूल गए नीतीश दलाई लामा से यह बेरुखी क्यों ? बारूद के ढेर पर बैठा है पटना विदेश नीति में बदलाव करना चाहिए जब तक जिए शान से जिये चन्द्रशेखर असली समस्या तो बुद्धि है सादगी में मुस्कुराता चेहरा यानी चंद्रशेखर गांव ,गरीब और पेड़ के लिए सत्याग्रह गुजर जाना एक दरख्त का जोमैटो में चीन का निवेश रुका

इसलिए पांच जून एक यादगार तारीख है !

आनंद कुमार 

भारत समेत सभी देशों में परिवर्तन का कोई भी प्रयास एक चल रही व्यवस्था से लाभान्वित जमातों, वर्गों और संगठनों के लिए असुविधाजनक होता है. फिर क्रांति का प्रयास तो खतरे की घंटी जैसा प्रभाव पैदा करता है. इसीलिए आज़ादी के बाद के राजनीतिक इतिहास में ५ जून १९७४ को बिहार आन्दोलन के दौरान लोकनायक जयप्रकाश नारायण द्वारा पटना के गांधी मैदान की विराट रैली में जनसाधारण, विशेषकर नयी पीढ़ी से ‘सम्पूर्ण क्रांति’ के लिए आगे बढ़ने का आवाहन एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ. आज यह पूछा जा सकता है कि ‘सत्तर के वर्षों में जयप्रकाश जी में ऐसी क्या खासियत थी कि उनके निष्कर्षों ने देश की दिशा बदल दी? देश ने तो १९७१ के लोकसभा और ’७२ के विधानसभा चुनावों में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में प्रबल आस्था प्रकट थी. वामपंथ से लेकर दक्षिणपंथ तक की सभी विरोधी पार्टियां पस्त थीं. ‘गरीबी हटाओ’ के नारे के साथ बैंकों के राष्ट्रीयकरण और महाराजाओं के प्रीवी पर्स  ख़तम करने से लेकर पाकिस्तान के दो टुकड़े करके इंदिरा जी ने अपना चौतरफा वर्चस्व कायम कर लिया था. लेकिन यह तो तस्वीर का एक ही पहलू था. 

दूसरी तरफ १९७३ में बढती मंहगाई, व्यापक बेरोजगारी, निरर्थक शिक्षा व्यवस्था और तेजी से बढ़ते उच्चस्तरीय भ्रष्टाचार का भी सच था. संसदीय मोर्चे पर एकाधिकार के कारण लोग विरोधी दलों का आसरा छोड़ कर खुद सड़कों पर आने लगे थे. नक्सलवादी घटनाओं की बढ़ोतरी थी. मंहगाई से परेशान विद्यार्थियों और गृहिणियों के ‘नव-निर्माण आन्दोलन’ के कारण गुजरात में तो ताज़ा चुनी सरकार ही नहीं चल पायी और विधानसभा भंग करने पर ही लोग शांत हुए. इस सबके बीच जयप्रकाश जी अपने संयत तरीके से राजनीतिक भ्रष्टाचार रोकने और जनता के सरोकारों के समाधान के लिए निर्दलीय मंचों के जरिये नागरिक शक्ति को सबल बनाने की दिशा में देश को सजग करने में जुटे हुए थे. इससे एक नया नारा फैलने लगा  – ‘अंधेरे में एक प्रकाश, जयप्रकाश! जय जय प्रकाश!!’. १९७४ में  कालेजों-विश्वविद्यालयों और कस्बों-नगरों की सभाओं में गाया जाने लगा ‘जयप्रकाश का बिगुल बजा तो जाग उठी तरुणाई है. उठो जवानों! क्रांति द्वार पर तिलक लगाने आई है.’. हर कोने से आवाज आती थी .’सम्पूर्ण क्रांति अब नारा है, भावी इतिहास हमारा है!’. 

वस्तुत: ‘सम्पूर्ण क्रांति’ की ललकार के कई सकारात्मक नतीजे निकले. एक तो जयप्रकाश जी जैसे निष्पक्ष और निर्मल राष्ट्रनायक द्वारा आमूल-चूल बदलाव की जरूरत के ऐलान ने पूरे देश के  परिवर्तनकामी व्यक्तियों, संगठनों और अभियानों के औचित्य को सिद्ध किया. दूसरे, जेपी के दो-टूक शब्दों ने छात्र-युवा आन्दोलनकारियों को तोड़फोड़ की क्षणिक आतिशबाजी के आत्मघाती तरीकों को त्यागते हुए अहिंसक क्रांति की दिशा अपनाने के लिए प्रेरित किया. तीसरे, ५ जून की घोषणा ने यथास्थितिवादी शक्तियों की ढाल बनी राजशक्ति और परिवर्तन के लिए बेचैन लोकशक्ति को आमने-सामने कर दिया. अन्यथा बिहार आन्दोलन दलों के दलदल में धंसने लगा था. चौथे, ५ जून के बाद बिहार में चल रहा जन-प्रतिरोध क्षुब्ध विद्यार्थियों के एक प्रादेशिक आन्दोलन की बजाय राष्ट्रनिर्माण के लिए जरुरी बदलावों  के राष्ट्रीय अभियान की धुरी बनकर आगे बढ़ा. इसलिए ५ जून एक यादगार तारीख बन गयी.

लेकिन सम्पूर्ण क्रांति का संकल्प अधूरा रहा. क्यों? क्योंकि एक बरस के अंदर ही गुजरात में विधानसभा भंग करके हुए चुनावों में जून, १९७५ में कांग्रेस की हार हो गयी. १२ जून १९७५ को तो स्वयं प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने समाजवादी नेता राजनारायण की याचिका के आधार पर चुनावी भ्रष्टाचार का दोषी पाकर उनका चुनाव रद्द कर दिया. सारा देश लोकनायक जयप्रकाश की ओर देखने लगा. जयप्रकाश जी ने भी २५ जून को देश की राजधानी में विशाल जनसभा में इंदिरा सरकार के इस्तीफे की मांग के समर्थन में अहिंसक अभियान का ऐलान कर दिया. इससे घबरा कर अपनी कुर्सी बचाने के लिए २५ जून ’७५ की रात से राष्ट्रपति के अप्रत्याशित अध्यादेश के जरिये  ‘इमरजेंसी राज’ थोप दिया गया. इसके जरिये राजसत्ता के दमन-चक्र के कारण समूची लड़ाई व्यवस्था-परिवर्तन की बजाय लोकतंत्र को पुनर्जीवित करने की ओर मुड़ गयी. जेपी समेत समूचा राष्ट्रीय नेतृत्व बिना मुक़दमा चलाये गिरफ्तार कर लिए गए. छात्रों और नौजवानों की देशभर में धर-पकड़ की गयी. संविधान ही तोड़-मरोड़ दिया गया. 

पर सेंसर का पहरा बैठा दिया गया. न्यायपालिका के हाथ बाँध दिया गए. लोकसभा के चुनाव ताल दिए गए. जब लोकतंत्र ही नहीं बचा तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में मौलिक सुधारों के लिए शरू की गयी ‘सम्पूर्ण क्रांति’ की जरूरत कैसे पूरी होती?यह पूछा जा सकता है कि आज, आधी शताब्दी बाद ५ जून को ‘सम्पूर्ण क्रांति दिवस’ को याद करने की क्या प्रासंगिकता है? इस प्रश्न के उत्तर के लिए यह प्रश्न पूछना सही होगा कि अगर जयप्रकाश जी ने १९७४ में मंहगाई, बेरोजगारी, निर्रथक शिक्षा और उच्च स्तरीय भ्रष्टाचार से फ़ैल रहे मोहभंग और असंतोष के समाधान के लिए चुनाव सुधारों को सबसे पहली जरूरत बतायी थी तो आज की दुर्दशा के समाधान के लिए उनकी तरफ से क्या समाधान बताया जाता? निसंदेह जेपी १९७५ से अवरुद्ध ‘सम्पूर्ण क्रांति’ को पूरा करने की सलाह देते. क्योंकि तबके चारो यक्ष प्रश्न अर्थात मंहगाई, बेरोजगारी, निरर्थक शिक्षा और उच्चस्तरीय भ्रष्टाचार आज जादा विकराल हो चुके हैं और सत्ता का खेल जादा राक्षसी हो चुका है. तबसे अबतक चुनावी खर्चों में बहुत बढ़ोतरी हो चुकी है और चुनावों से बनने वाले विधायकों-सांसदों और सरकारों के सरोकारों में बहुत खराबी आ चुकी है. तब लोकसभा का चुनाव जीतने के लिए कुछ लाख रुपयों की जरुरत थी, अब करोड़ों से कम में काम नहीं चलता. तब खाली देशी घरानों का पैसा लगता था, अब वैश्विक स्तर पर धंधा करने वाले अंतर्राष्ट्रीय कार्पोरेट घराने नेताओं की नकेल थामे दीखते हैं. तब जीतनेवाले विधायक और सांसद कुछ हदतक अपने दलों के घोषणापत्र और अपने चुनावी वायदों के प्रति जवाबदेही निभाने की कोशिश करते थे. लेकिन अब तो जवाबदेही और सक्रियता अप्रासंगिक हो चुकी है. बासी घोषणापत्र ही काम में लाये जाते हैं. समूचा चुनावप्रचार मीडिया के सहयोग से धनशक्ति का अश्लील खेल हो गया है. सरकारें भी मुट्ठी भर लक्ष्मीपुत्रों के मनबहलाव का खिलौना हो गयी हैं. राजनीति का अपराधीकरण, परिवारवाद, प्रभु जातियों का वर्चस्व और साम्प्रदायिकता  चार नए महादोष जुड़ गए हैं. 

लेकिन आज जयप्रकाश जैसे नि:स्वार्थ नायक नहीं हैं, न देश में लोकशक्ति और युवाशक्ति को आगे बढ़ानेवाली बेचैनी है. हाँ, उस रोमांचक दौर की स्मृतियाँ हैं जो हर ५ जून को आशा पैदा करती हैं: हमको है यकीन हम होंगे कामयाब एक दिन...

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