जनादेश

बिहार में कोरोना से फैली दहशत नेपाल में अब इमरजेंसी की भी आहट एक सवाल कभी नहीं मर सकता अति राष्ट्रवाद की राजनीति का परिणाम अखबारों की मोतियाबिंदी नजर राजनीतिशास्त्र अपराधशास्त्र की ही एक शाखा है उत्तर प्रदेश में फिर लॉक डाउन ,फ़िलहाल तीन दिन का विकास दुबे की कहानी में कोई झोल नहीं है ? बिहार में राजनीति तो बंगाल में लापरवाही का नतीजा सामने तो बच्चों के दिमाग से लोकतंत्र हटा देंगे ? अपना वादा भूल गए नीतीश दलाई लामा से यह बेरुखी क्यों ? बारूद के ढेर पर बैठा है पटना विदेश नीति में बदलाव करना चाहिए जब तक जिए शान से जिये चन्द्रशेखर असली समस्या तो बुद्धि है सादगी में मुस्कुराता चेहरा यानी चंद्रशेखर गांव ,गरीब और पेड़ के लिए सत्याग्रह गुजर जाना एक दरख्त का जोमैटो में चीन का निवेश रुका

मंच पर गांधी थे नीचे मैं -पारीख

अंबरीश कुमार 

मुंबई .देश का माहौल बदला हुआ है .आजादी के समय गांधी ,नेहरु और पटेल थे . बोस थे तो जेपी और लोहिया भी थे .फिर चौहत्तर आया तो जेपी सामने थे .अब वैसे कद्दावर और समर्पित जननेता तो नहीं हैं पर देश के दूर दराज के हिस्सों में आजादी की लड़ाई के कुछ दीप अभी भी टिमटिमा रहे हैं .इनमे एक हैं भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लेने वाले दिग्गज समाजवादी जीजी पारीख . वर्ष 1942 में भारत छोडो आंदोलन में भाग लेंने की वजह से दस महीने तक वर्ली की अस्थाई जेल में रहे . वे इस समय 98 वर्ष के हैं और समाजवादी आंदोलन का दिया जलाए हुए है .वे न कभी चुनाव लड़े और न कोई शासकीय पद लिया . दिग्गज समाजवादी जीजी पारीख से कुछ समय पहले जो बातचीत हुई थी उसे एक बार फिर से दे रहे हैं .

आप किसी प्रेरणा से भारत छोडो आंदोलन से जुड़े ?

 यह उस समय का देश का माहौल था . लोग आजादी की बात करते थे .जेल जाने की बात करते थे .इस सबका असर मेरे ऊपर भी पड़ा .गांधी और कांग्रेस की हवा बह रही थी जिसका असर मेरे घर पर भी पड़ा .शुरुआत कहा से हुई ?एआईसीसी का मुंबई में भारत छोडो आंदोलन का जो सेशन हुआ उसमे एक वालंटियर के रूप में मै भी शामिल हुआ था .अन्य नेताओं के साथ महात्मा गांधी मंच पर थे .उनके भाषण से प्रभावित हुआ और फिर इस आंदोलन का हिस्सा बन गया .

 समाजवादियों की कई बार एकजुटता की कोशिश हुई ,कई बार बिखराव हुआ .आप इसे कैसे देखते है ?मै सोशलिस्ट पार्टी में हमेशा विभाजन के खिलाफ रहा .इस मामले में डा राम मनोहर लोहिया से भी सहमत नहीं था .हमें जोड़ना चाहिए तोडना नहीं . महाराष्ट्र में लम्बे समय से है यहां की राजनीति में शिवसेना के उदय को किस तरह देखते है ? 

मै खुद गुजरात से हूँ पर पचास साठ के दशक में मुंबई के कल कारखानों में जिस तरह मराठी लोगों की उपेक्षा हुई उसी से यह सब शुरू हुआ .जो पहल समाजवादियों को करनी चाहिए थी उसे बाल ठाकरे ने किया और वे कामयाब भी हुए .नौकरी में जब स्थानीय लोगों की हिस्सेदारी नहीं होगी तो यह सब होगा . 

इस युसूफ मेहर अली सेंटर में अस्पताल है ,स्कूल है लड़कियों का छात्रावास है और बड़ी संख्या में स्टाफ है ,इसका खर्च कैसे निकलता है ?इन सब जनहित के कामो में काफी पैसा लगता है कुछ हमारे अपने संसाधनों से मिलता है तो ज्यादा हिस्सा जनता से मांगता हूँ .हर साल करीब दो करोड़ का खर्च आता है जो मांग कर इकठ्ठा करता हूँ .

 समाजवादियों की नई पहल से क्या उम्मीद है ?

 अभी भी बहुत उम्मीद है .हमने कई बदलाव देखे है और फिर बदलाव होगा . 

Share On Facebook

Comments

Subscribe

Receive updates and latest news direct from our team. Simply enter your email below :