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अंफन ने बदली सुंदरबन की तस्वीर और तकदीर

प्रभाकर मणि तिवारी

 कोलकाता.पश्चिम बंगाल के उत्तर और दक्षिण 24-परगना जिले में लगभग 4200 वर्ग किलोमीटर में फैले और बांग्लादेश से सटे इस इलाके में रहने वाले लगभग चालीस लाख लोगों के लिए अंफन बर्बादी की नई दास्तां लेकर आया था. अब तूफान में सबकुछ तबाह हो जाने के बाद इलाके से एक बार फिर बड़े पैमाने पर विस्थापन का अंदेशा है. यानी तस्वीर के साथ इलाके की तकदीर बदलने का भी खतरा बढ़ गया है. इससे पहले वर्ष 2009 में आइला तूफान के बाद भी ऐसा ही विस्थापन देखने को मिला था. कुछ साल पहले हुए एक अध्ययन के मुताबिक, इलाके में हर पांच घरों में से एक व्यक्ति रोजी-रोटी कमाने के लिए दूसरे राज्यों में रहता है. अब इस आंकड़े के तेजी से बढ़ने का अंदेशा है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा है कि सरकार तूफान से तबाह सुंदरबन को बचाने के लिए इलाके में एक महीने के भीतर पांच करोड़ मैंग्रोव के पेड़ लगाएगी. इसकी शुरुआत पांच जून यानी पर्वारण दिवस के मौके पर की जाएगी. उन्होंने माना है कि अंफान से मैंग्रोव वनों को भारी नुकसान हुआ है.

अंफन ने इलाके के लोगों की जमा-पूंजी और रोजगार के साधनों ही नहीं बल्कि इलाके की जैव-विविधता और मैंग्रोव के जंगल को भी तबाह कर दिया है. वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि लगभग एक-तिहाई जंगल साफ हो गया है.


अंफन ने इलाके में बहने वाली गंगा, इच्छामती और कालिंदी समेत तमाम छोटी-बड़ी नदियों पर बने बांधों को तो भारी नुकसान पहुंचाया ही है, आजीनिका के सबसे प्रमुख साधन खेती को भी तबाह कर दिया है. बांधों के टूटने या उनमें दरार होने की वजह से बंगाल की खाड़ी का खारा पानी नदियों के रास्ते खेतों में पहुंच गया है. इस वजह से अब बरसों उनमें कोई फसल नहीं उगेगी. इलाके के मौसुनी द्वीप पर रहने वाले प्रदीप मंडल कहते हैं, “लॉकडाउन ने पहले ही हमें पंगु बना दिया था. अब अंफन ने हमसे बची-खुची पूंजी भी छीन कर सड़क पर ला दिया है. हमारे घर औऱ खेत दोनों बर्बाद हो गए हैं.”


सुंदरबन के स्व-सहायता समूह की महिलाओं को प्रशिक्षण देने वाले एक गैर-सरकारी संगठन के संयोजक रमेश गिरि कहते हैं, “बीते तीन-चार वर्षों के दौरान कई प्रवासियों ने लौट कर अपना छोटा-मोटा कारोबार शुरू किया था. तस्वीर बेहतर हो ही रही थी कि अंफन ने तमाम किए-धरे पर पानी फेर दिया है.” काकद्वीप इलाके के प्रणब विश्वास का बेटा अभी तूफान से एक सप्ताह पहले ही महाराष्ट्र में नासिक से लौटा था. अब बाप-बेटे मिल कर मछली के कारोबार की योजना बना रहे थे. लेकिन अंफन उनके तमाम सपनों के साथ कच्चे मकान को भी अपने साथ उड़ा ले गया. मंडल को अब समझ में नहीं आ रहा है कि छह लोगों के परिवार को वै कैसे पालेंगे? ऊपर से दो बेटियां ब्याह के लायक हैं.

पश्चिम बंगाल सरकार में सुंदरबन मामलों के मंत्री मंटूराम पाखिरा कहते हैं, “तूफान से इलाके को हजारों करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है. अब सबकुछ शून्य से दोबरा शुरू करना होगा. लगभग 140 किमी लंबे बांधों में जगह-जगह दरारें पड़ गई हैं. इनसे ज्वार-भाटे के समय समुद्र का पानी गांवों को डुबो देगा.”


कोलकाता के जादवपुर विश्वविद्यालय में समुद्र विज्ञान संस्थान के निदेशक और सुंदरबन पर जलवायु परिवर्तन के असर पर लंबे अरसे से शोध करने वाले डा.सुगत हाजरा कहते हैं, “तूफान ने इलाके में आधारभूत ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया है. इसका लोगों की आजीनिका पर बेहद प्रतिकूल असर पड़ेगा. आने वाले महीनों में इलाके से बड़े पैमाने पर विस्थापन देखने को मिलेगा. आइला के बाद अब तक जो कुछ भी दोबोरा बना था, वह सब साफ हो गया है.” वह कहते हैं कि सुंदरबन डेल्टा में समुद्र के जलस्तर में वृद्धि की दर औसत वैश्विक दर से काफी ऊंची है.

पर्यावरणविद डा. सुगत हाजरा बताते हैं, “किसी तूफान की स्थिति में मैंग्रोव के जंगल हवा की रफ्तार को कम कर देते हैं. इससे तूफान की गति और उससे होने वाली क्षति काफी कम हो जाती है. इस इलाके को कोलकाता का कवच कहा जाता है जो अक्सर उसे ऐसे चक्रवाती तूफानों से बचाता रहा है. इसने वर्ष 2009 में आइला और बीते साल बुलबुल के कहर से भी कोलकाता की रक्षा की थी. लेकिन अब इसका बड़ा हिस्सा बर्बाद हो गया है.”

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