लैंसेट ने लेख क्यों वापस लिया? क्या बड़ा मेडिकल घोटाला है यह !

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लैंसेट ने लेख क्यों वापस लिया? क्या बड़ा मेडिकल घोटाला है यह !

डा महेंद्र सिंह

पिछले महीने 22 मई, 2020 को विश्वप्रसिद्ध मेडिकल जर्नल लैंसेट में ४ चिकित्साविज्ञानियों/शोधार्थियों ने एक शोधपत्र प्रकाशित किया जिसके अनुसार आजकल पूरी दुनिया में छायी हुई महामारी कोरोना के मरीज़ों पर क्लोरोक्वीन/हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन के उपयोग से कोई लाभ नहीं होता.एक लाभ की पुष्टि करने में असमर्थ थे.इस शोध में यह भी कहा गया कि न सिर्फ हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन के उपयोग से कोविड 19 के मरीज़ों के लिए असामान्य तरह की हृदय गति जैसी बीमारी के खतरे भी बढ़ जाते हैं.इसके प्रकाशित होने के साथ इसे कोविड के मरीज़ों के इलाज़ के सिलसिले में एक बड़ी शोध के रूप में मान्यता मिली.

पर इसके पहले हम इस शोध पर आगे बात करें, COVID-19 के सन्दर्भ में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन (HCQ) के उपयोग की पृष्टभूमि को समझने की कोशिश करते हैं.दरअसल इस महामारी के शुरूआती दिनों में ही फ्रांस से एक छोटा सा अध्ययन प्रकाशित हुआ जिसमे बताया गया कि मलेरिया और आर्थराइटिस के मामलों में बेहद प्रभावी दवा हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन (HCQ) के इस्तेमाल से COVID-19 के मरीज़ बेहद तेजी से रिकवर होते हैं.इस फ्रांसीसी शोध के आधार पर अमेरिकी राष्ट्रपति श्री डोनाल्ड ट्रम्प ने हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन का जोर शोर से प्रचार करना शुरू किया और यहाँ तक कि भारत, जो इस दवा का दुनिया भर में सबसे बड़ा सप्लायर है, पर अनावश्यक दबाव डालकर दवा की आपूर्ति अमेरिका में सुनिश्चित करवाई.चूँकि फ़्रांसिसी अध्ययन में कई सारी कमियां थीं और उनका सैंपल साइज भी बहुत कम था इसलिए इन सब बातों को देखते हुए वैज्ञानिक समुदाय ने और बड़े पैमाने पर क्लीनिकल ट्रायल शुरू किये और ट्रम्प द्वारा इस तरह बगैर अन्य क्लीनिकल ट्रायल के परिणाम आये हुए इस दवा का प्रचार करने की आलोचना भी की. चूँकि राष्ट्रपति ट्रम्प अक्सर विज्ञानं सम्मत बातों का विरोध करते हैं और लोगों के अन्धविश्वास को बढ़ावा देने वाली बातें करते हैं इसलिए ऐसी चर्चा होने लगी कि ट्रम्प किसी स्वार्थवश HCQ का प्रचार कर रहे हैं.

खैर अप्रैल के तीसरे सप्ताह में एक महत्त्वपूर्ण शोध प्रकाशित हुआ जो अमेरिका में वेटेरन अफेयर्स हॉस्पिटल (अमेरिकन सैनिकों के लिए इस्तेमाल होने वाले अस्पताल) में भर्ती होने वाले कोविड के लगभग ११ हज़ार मरीज़ों पर HCQ के उपयोग पर आधारित था.मेडिकल साइंस में रिसर्च के लिए मरीज़ों की यह संख्या काफी अच्छी मानी जाती है और इस शोध में पहली बार यह बात सामने आयी कि HCQ के इस्तेमाल का कोविड के मरीज़ों पर कोई फायदा नहीं होता बल्कि मरीज़ों के मरने के चांस बढ़ जाते हैं.हालाँकि इस शोध की वैज्ञानिकों के ही एक ग्रुप ने आलोचना भी की, वह इस आधार पर कि HCQ का इस्तेमाल उन मरीज़ों पर किया गया जिनकी हालत पहले ही बहुत ख़राब थी और सलाह दी गयी कि बीमारी के शुरआती दिनों में अगर यह दवा दी जाती तो परिणाम शायद अच्छे आ सकते थे.खैर विज्ञान से इतर राजनीतिक हलकों में इस शोध के आधार पर ट्रम्प का खूब मज़ाक उड़ाया गया और ज्यादातर लोगों दो खेमों में बंट गए, कुछ जो HCQ की उपयोगिता पर अभी भी भरोसा करते थे और बाकी जो इसका मज़ाक उड़ाते थे.


इस बीच में ही रेमडेसिविर नामक एक नयी दवा पर शोध परिणामों की चर्चा होने लगी जिसे अमेरिका की गिलियड कंपनी ने बनाया है.इसके परिणाम भी बहुत उत्साहजनक नहीं आये पर यह जरूर है कि अस्पताल में भर्ती COVID-19 के मरीज़ों के रिकवर होने के टाइम को यह नयी दवा रेमडेसिविर घटा देती है जिसे एक बड़ी उपलब्धि माना गया खासकर अमेरिका जैसे देशों में अस्पताल में भर्ती होने की लागत बहुत ज्यादा होती है और अस्पताल में भर्ती होने की अवधि को घटाने वाली दवा का भी बड़ा महत्त्व है.


आइये अब वापस आते हैं २२ मई को प्रकाशित लैंसेट के अध्ययन पर –  इस अध्ययन में खास बात यह थी कि इसमें दुनिया भर के ६०० से ज्यादा अस्पतालों में भर्ती किये गए ९६ हज़ार COVID-19 के मरीज़ों पर HCQ के उपयोग का अध्ययन किया गया था. यह संख्या हालाँकि आम लोगों के लिए अधिक बड़ी नहीं लगती क्योंकि पूरी दुनिया में लाखों मरीज़ प्रभावित हुए हैं और यह संख्या लगातार बढ़ती जा रही है पर कुछ वैज्ञानिकों का माथा ठनका क्योंकि पश्चिमी जगत में मरीज़ों की प्राइवेसी और बगैर उनकी सहमति (consent) के उन पर आधारित शोध परिणामों पर आधारित कोई अध्ययन नहीं छापा जा सकता और यह लगभग असंभव सी बात लगी कि केवल चार शोधार्थी इतने कम समय में दुनिया भर के अलग अलग देशों में स्थित  ६७१ अस्पतालों में फैले ९६ हज़ार मरीज़ों के सहमति पत्र कैसे प्राप्त कर सके.पर अगर इस शोध पत्र को ध्यान से पढ़ा जाय तो यह पाएंगे कि इतने सारे मरीज़ों पर आधारित यह डेटा Surgisphere नामक एक लगभग अनाम सी “डेटा एनालिटिक्स” कंपनी द्वारा इन सब अस्पतालों से प्राप्त किया गया था.पर हर देश के अपने अलग अलग तरह के डेटा प्राइवेसी कानून हैं जिनके रहते कैसे ऐसा संभव हुआ यह वैज्ञानिक समुदाय को बेहद संदेहास्पद लगा.इसलिए इस शोध पत्र के प्रकाशित होने के तुरंत बाद वैज्ञानिकों ने इस पूरे अध्ययन के लिए सामग्री (डेटा) की आपूर्ति करने वाली रहस्यमयी डेटाबेस कंपनी के बारे में चिंतायें जाहिर करना शुरू कर दिया दीं जिसने .डेटाबेस सर्जीफेयर कॉर्पोरेशन का है, जिसके संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ.सपन देसाई हैं, जो अध्ययन के प्रमुख सह-लेखक हैं.खैर वैज्ञानिकों ने लैंसेट जर्नल एक एडिटर को पत्र लिखा और लैंसेट ने इस शोध पत्र में इस्तेमाल होने वाले डेटा की जांच शुरू कर दी. चूंकि सारा डेटा डॉ देसाई ने उपलब्ध कराया था इसलिए शक की सूई सबसे पहले उन पर ही गयी और उनसे डेटा के audit की मांग की गयी जिससे डॉ. देसाई ने इंकार कर दिया.परिणाम यह हुआ कि कल यानी ४ जून आते आते इस शोध पत्र को इस जर्नल से retract यानी वापस कर लिया गया.इस शोधपत्र के लेखकों ने अपना पक्ष सामने रखा है और इसके लिए क्षमा भी मांगी है।



खैर, लोग बहुत निराश हैं खासकर वे लोग जो आधुनिक विज्ञान में चल रहे शोध की दुनिया को अंदर से नहीं जानते और इन शोध प्रकाशित करने वाले जर्नल्स को और वैज्ञानिकों को बेहद सम्मान की दृष्टि से देखते हैं.यह निराशा इस महामारी के समय में इसलिए भी अधिक हुई क्योंकि लोग वैज्ञानिकों की तरफ बेहद उम्मीद से देख रहे हैं ऐसे में कुछ वैज्ञानिकों का ऐसा आचरण बेहद गैर जिम्मेदाराना ही नहीं आपराधिक भी है.आइये समझते हैं ऐसा कैसे और क्यों हुआ।


मेरे जैसे लोग जो विज्ञान की दुनिया में दशकों से हैं के लिए यह प्रकरण कोई नया नहीं है.विज्ञान भी दुनिया के अन्य प्रोफेशनों की तरह अच्छे बुरे लोगों से भरा है.गला काट प्रतियोगिता का माहौल है और सफलता का प्रतिशत बहुत कम.इसलिए  कुछ लोग लापरवाही के चलते गलतियां करते हैं तो कुछ लोग जानबूझ कर व्यावसायिक लाभ के लिए ऐसा फर्जीवाड़ा रचते हैं.लगभग हर साल कई बड़े शोध पत्र बाद में होने वाली विस्तृत जांच के चलते सही न साबित होने पर retract किये जाते हैं.बहुत सारे लोग इस बात से निराश हैं कि Lancet ने यह गलती कैसे की क्योंकि वह तो मेडिकल रिसर्च की दुनिया में बेहद सम्मानित जर्नल माना जाता है, उनके लिए यह जानना आवश्यक है कि जर्नल खुद नहीं निर्णय लेता कि कौन सा शोध पत्र छापा जाय और कौन सा नहीं.इस प्रक्रिया को Peer Review कहा जाता है.यह प्रक्रिया किसी प्रकार के bias से बचने के लिए  ही अपनाई जाती है.दरअसल इसमें होता यह है कि जब एक शोधार्थियों का समूह कोई शोध पत्र किसी peer reviewed जर्नल को भेजता है तो उसे पहले एडिटर सरसरी तौर पर देखता है और अगर उस शोध का विषय उस जर्नल के रिसर्च स्कोप के हिसाब से फिट बैठता है और उसे लगता है कि यह शोध इस फील्ड को आगे बढ़ाएगा तो उसे वह एडिटर आगे २-३ कभी कभी ४ referees को रिव्यु करने के लिए भेज देता है.ये reviewers उस फील्ड के जाने माने विशेषज्ञ होते हैं.शोधपत्र के लेखकों से यह जानकारी गोपनीय रखी जाती है कि उनके शोध को review करने के लिए किन विशेषज्ञों को भेजा गया है ताकि वे किसी तरीके से उनसे संपर्क करके उनके निर्णय को प्रभावित न कर सकें.अब यह उन reviewers पर निर्भर करता है कि वह अमुक शोध के बारे में कैसी राय रखते हैं.और उनके reccomendation पर ही कोई शोध प्रकाशित हो या न हो इस बात का निर्णय जर्नल का एडिटर लेता है।

आप सोच रहे होंगे कि जब peer review की प्रक्रिया इतनी साफ़ सुथरी और ऊपरी तौर पर unbiased लग रही है तो फिर गलती कहाँ हुई, और किससे हुई.दरअसल जैसा कि यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि वैज्ञानिक अपने कामों में बेहद व्यस्त रहते हैं और किसी और शोध को review करने का उन्हें कोई मानदेय नहीं मिलता.उनकी प्राथमिकता पहले अपने एक्सपेरिमेंटस प्लान करने, उन्हें सम्पन्न करने की होती है ताकि शोध का काम आगे बढ़ सके क्योंकि नौकरी अक्सर उनके अपने शोध की परफॉरमेंस पर निर्भर करती है.उसके साथ साथ शोध करने के लिए सबसे आवश्यक होता है शोध के लिए धन आता रहे और धन ऐसे ही नहीं मिलता, उसके लिए फंडिंग ग्रांट्स प्रपोजल लिखने और सबमिट करने पड़ते हैं, जिसमे सफलता का प्रतिशत बेहद कम होता है.इसके अलावा अक्सर इन वैज्ञानकों को अपने निर्देशन में Ph.D. और कॉलेज लेवल के युवा वैज्ञानिकों को प्रशिक्षण देना होता है और अध्यापन भी करना होता है जिस पर उनकी नौकरी निर्भर है.इसलिए किसी और के किये गए शोध कार्य को ध्यान से देख कर रिव्यु करना और उस पर अपना मत व्यक्त करना उनकी प्राथमिकता में नहीं आता, उसके लिए उन्हें कोई मानदेय भी नहीं मिलता.यह मुफ्त का काम है जिसे लगभग सभी को करना पड़ता है.इसलिए जर्नल आर्टिकल के रिव्यु के काम कई तरह से प्रभावित हो सकते हैं.जैसे मान लीजिये मुझे किसी जर्नल ने एक आर्टिकल भेजा किसी “एक खास जीन/प्रोटीन के किसी मानव रोग में रोल को लेकर” सिर्फ इस वजह से कि मैं उस जीन/प्रोटीन पर सालों से शोध कर रहा हूँ पर अगर मेरी अगले सप्ताह एक मीटिंग है जिसमे मुझे अपना शोध प्रस्तुत करना है जिस पर यह निर्भर करेगा कि मुझे मेरे शोध के लिए अगली फंडिंग मिलेगी या नहीं तो स्वाभाविक है कि मेरे लिए वह मीटिंग अधिक महत्वपूर्ण है और उस सूरत में मैं शायद बहुत हड़बड़ी में उस शोध को पढूंगा और अपनी राय एडिटर को दे दूंगा जिसमे संभावना होगी कि लेखकों द्वारा की गयी गलती पर ध्यान न जाए.अक्सर लोग खुद बेहद व्यस्त होने की सूरत में review करने से मना कर देते हैं और तब एडिटर किसी और विशेषज्ञ को वह शोध review करने के लिए भेज देता है पर कोई गारंटी नहीं कि उस दूसरे विशेषज्ञ की क्या समस्याएं हैं और किन परिस्थितियों में या मानसिक दशा में वह उस शोध को जांचता है यह वही जाने.यह भी संभव है कि वह विशेषज्ञ उस विषय का इतना बड़ा जानकार न हो जितना मैं हूँ.

और यह भी ध्यान देने वाली बात है कि शोधपत्र में रिफाइंड डाटा ही होता है, यानी औसतन २० – ३० पेज का डॉक्यूमेंट होता है जिसे मैनुस्क्रिप्ट कहते हैं जो हज़ारों पेज के raw data का निचोड़ होता है. यह किसी भी सूरत में संभव नहीं है कि कोई reviewer किसी २०-३० पृष्ठ के मैनुस्क्रिप्ट को पढ़ कर यह अंदाज लगा ले कि कहाँ गड़बड़ी की गयी है.इस लैंसेट के मामले में तो आप खुद ही समझ सकते हैं कि कितना बड़ा डेटा होगा अगर मरीज़ की संख्या ही ९६ हज़ार हैं. अगर औसतन एक मरीज़ का रिकॉर्ड औसतन १० पेज में भी है तो एक reviewer को लगभग लाख से ऊपर पेज पढ़ने होंगे जो संभव नहीं है.इसलिए फाइनल मैनुस्क्रिप्ट को ही पढ़कर गलतियां/कमियां ढूंढी जाती है और उसके अनुसार कोई नया एक्सपेरिमेंट करने का या कोई खास डाटा हटाने का या जोड़ने का सुझाव दिया जाता है.हाँ इस बीच शोधकर्ता और उसके इंस्टिट्यूट की जिम्मेदारी होती है कि वह raw data को अगले पचासों साल तक संभाल कर रखे ताकि विवाद होने की सूरत में उनकी जांच इंस्टिट्यूट की इंटरनल समिति या जर्नल की इन्वेस्टीगेशन टीम कर सके. यही इस मामले में भी किया गया और जांच में डेटाबेस प्रस्तुत न कर पाने पर शोधपत्र वापस ले लिया गया.खैर, इस लूपहोल का फायदा उठाकर जो गलत प्रवृत्ति के वैज्ञानिक/चिकित्साविज्ञानी गलत डाटा के आधार पर फाइनल मैनुस्क्रिप्ट भेज देते हैं जैसे इस मामले में हुआ.


विवादास्पद शोधकर्ताओं के विचार पैटर्न और तौर-तरीकों का विश्लेषण करने के अपने थोड़े से अनुभव से मैंने नोटिस किया है कि उनमें से अधिकांश ऐसा कुछ करते हैं जिसे क्षेत्र के अधिकांश लोग पहले से ही मानते हैं या स्थापत तथ्य हैं.जैसा कि इस मामले में हम जानते हैं कि जब ट्रम्प ने HCQ को COVID19 के लिए संभावित दवा के रूप में बताया स्वाभाविक रूप से बायोमेडिकल समुदाय ने आलोचना करनी शुरू कर दी और अन्य क्लीनिकल ट्रायल के नतीजे आने के इंतज़ार करने की बात करने लगे.फिर अप्रैल में अमेरिका के सैनिक अस्पतालों में चल रहे क्लीनिकल ट्रायल के परिणाम HCQ की उपयोगिता के खिलाफ आये तो HCQ के खिलाफ राजनैतिक माहौल बनने लगा.कहना न होगा कि एक शातिर और धूर्त किस्म के डॉक्टर/रिसर्चर डॉ. देसाई जो इस पूरे प्रकरण में शक के दायरे में हैं, ने इसमें एक अच्छा अवसर देखा और अपनी प्राइवेट कंपनी को प्रमोट करने के लिए (जो डाटा बेचने का काम करती है) को बढ़ा चढ़ा कर अन्य तीन शोधकर्ताओं जो हार्वर्ड मेडिकल स्कूल जैसी अकादमिक रिसर्च संस्थाओं में काम करते हैं से संपर्क किया और उन्हें अपना डाटा दिखाया होगा और उन्हें साथ में शोधपत्र लिखने का ऑफर दिया होगा.

 

हालांकि, इस लैंसेट के इस विवादस्पद अध्ययन में, मैं नहीं मानता कि सपन देसाई के अलावा बाकी के तीन लेखक जानबूझकर शामिल थे क्योंकि covid महामारी गंभीरता को देखते हुए उन्हें यह अच्छा अवसर लगा होगा कि शायद इस शोध परिणाम से कुछ ऐसे निष्कर्ष निकलेंगे जिससे लोगों का भला होगा, पर इस बड़े उद्देश्य के कारण उन्होंने रॉ डाटा की छानबीन नहीं की होगी और सपन देसाई के फर्ज़ीवाड़े के चक्कर में पड़ कर यह फ़र्ज़ी डेटाबेस की एनालिसिस करके उसके परिणामों पर आधारित एक शोधपत्र लिख डाला.हालाँकि यह प्रकरण इस बात की तरफ इशारा करता है कि आगे से वैज्ञानिक समुदाय को अधिक सतर्क रहने की जरुरत है और उन्हें कमर्शियल डेटाबेस के बजाय पुराने तरीके से अस्पतालों से सीधे ही डाटा कलेक्ट करने पर विश्वास करना होगा।

आजकल राजनीति का क्षेत्र हो या फैशन, मैनेजमेंट का फील्ड हो या चिकित्सा विज्ञान हर क्षेत्र में  “डेटा एनालिटिक्स”, “क्लाउड कंप्यूटिंग”, “मशीन लर्निंग”, “आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस” की उपयोगिता की बड़ी चर्चा है.पर मैं इस मामले में थोड़ा पुरानी सोच का व्यक्ति हूँ.यह विवाद इस बात का एक सटीक उदाहरण है कि आधुनिक चिकित्सा / जैव चिकित्सा अनुसंधान की प्रतिष्ठा को “बिग डेटा” पर अधिक नहीं निर्भर होना चाहिए और बिग डाटा पर निर्भरता न सिर्फ वैज्ञानिकों की फ़ज़ीहत करवा सकती है बल्कि महामारी आपदा प्रबंधन जैसी अति गंभीर मामलों में भी रूकावट पैदा कर सकती है.मत भूलें कि इस फ़र्ज़ी शोध के कारण WHO ने पूरी दुनिया में चल रहे HCQ के क्लीनिकल ट्रायल्स पर रोक लगाने की सलाह दी थी.अगर आने वाले समय में इस साबित हुआ कि HCQ वास्तव में कोविड बीमारी के लिए असरदायक दवा है तो यह मानवता का कितना बड़ा नुकसान होगा.खैर, लैंसेट द्वारा इस शोध पत्र को retract किये जाने की खबर आते ही WHO ने वापस फिर से HCQ के क्लीनिकल ट्रायल्स  जारी किये जाने की सलाह दी है.


अंतिम महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सिर्फ एक शोध के गलत साबित होने का मामला है. इसका अर्थ कदापि यह न लगाएं कि hydroxychloroquine अब कोविड के मरीज़ों के लिए सुरक्षित और लाभकारी दवा मान ली गयी है.दरअसल पूरी दुनिया में कई सारे ट्रायल चल रहे हैं और उनके परिणाम आने वाले हैं.उसके आधार पर ही चिकित्सक यह निर्धारित करेंगे कि मरीज़ों के लिए क्या उचित है.वैज्ञानिक समुदाय स्वभावगत तौर एक दूसरे के डेटा पर पर यहाँ तक कि अक्सर अपने ही परिणामों पर शक करते हैं इसीलिए उन्होंने इस घटना का स्वतः संज्ञान लिए और इस फ़र्ज़ी शोध को समय रहते पहचान कर पूरी दुनिया को इसके प्रति आगाह किया.विज्ञान एक निरंतर बदलने वाली यानी डायनामिक प्रर्किया है और अपनी कमियाँ, अपने दोष यह सबसे पहले पकड़ती है.इसलिए विज्ञान पर भरोसा रखें.

डा महेंद्र के सिंह अमेरिका में कैंसर विशेषग्य हैं


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