गोरखपुर के गवरजीत आम का स्वाद लें कभी !

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गोरखपुर के गवरजीत आम का स्वाद लें कभी !

सय्यद अयूब 

गोरखपुर . गवरजीत गौहर जीत का बिगड़ा हुआ नाम है. गौहर यानी रत्न या मोती.फलों का राजा आम. आमों का राजा गौरजीत. कुछ लोग आमों का राजा अलफांसो (हापुस), दशहरी और मालदे को भी कहते हैं. लेकिन गोरखपुर वाले गौरजीत (गवरजीत) को ही आमों का राजा मानते हैं. गोरखपुर वाले दुनिया में कहीं भी रहें, अपने गौरजीत पर फ़िदा हैं. यह आम अपनी मिठास और ख़ुशबू में बेजोड़ है. यह आम वीआईपी है. गोरखपुर शहर में जो ठेले वाला गौरजीत आम बेचता है वह एक दो सप्ताह खुद को ख़ास समझता है. दूसरे आमों की तुलना में यह आम ज़रा महँगा मिलेगा. मुहल्लों में गौरजीत आम बिकता हुआ शायद ही नज़र आए. गोलघर, विजय चौक, टाऊन हॉल, उर्दू बाज़ार, रेती, नखास चौक और अलीनगर में यह आम नज़र आएगा. वह भी मात्र दो सप्ताह.गाजीपुर, बलिया, सीवान, छपरा आदि जगहों पर इस आम को मिठुआ भी कहते हैं.सैयद नसीर हसन साहब इसे मिठुआ आम कहने पर ज़ोर देते हैं जबकि मेरे 75 वर्षीय पिता डॉक्टर अय्यूब अहमद ख़ान का कहना है कि मिठुआ एक दूसरा आम है जो कि बिजु आम है.  क़ाबिले ग़ौर है कि ये दोनों हज़रात बाग़ों के मालिक रहे हैं.

गौरजीत आम के बारे में गोरखपुर के लोगों ने काफ़ी कुछ लिखा भी है. एक तथ्य यह सामने आया कि बेतिया के राजा ने यह आम गोरखपुर के एक रईस को भेंट किया था. गोरखपुर और आस पास की मिट्टी इस विशेष आम के लिए अनुकूल थी.सो गौरजीत ने गोरखपुर को अपना लिया और गोरखपुर ने गौरजीत को हमेशा के लिए अपना बना लिया.जनाब ख़ादिम हुसैन साहब मौलाना मुबारक खाँ नदवी ( मियां बाज़ार) और हसन मसूद एडवोकेट जैसे गोरखपुर के ज़मीनदार गौरजीत के दीवाने रहे हैं. ख़ादिम हुसैन साहब बताते थे कि किसी गौहर खान के नाम पर यह गौहर जीत नाम पड़ा जो कालांतर में गौरजीत हो गया.अमृता शेरगिल, साक़ी फारूकी, फ़िराक़ गोरखपुरी और मजनूंगोरखपुरी भी इस गौरजीत आम के दीवाने रहे. आज भी विद्या बालन, नरेन्द्र हीरवानी, अनुराग कश्यप आदि की यादों में गौरजीत आम की ख़ुशबू रची बसी है. दिल्ली में राज्य सभा के सेक्रेटरी जनरल देश दीपक वर्मा हों या प्रख्यात कवि प्रोफेसर जितेन्द्र श्रीवास्तव हों, जेएनयू के प्रोफेसर मोहम्मद शाहिद हुसैन हों या आईडिया कम्युनिकेशन के आसिफ आज़मी हों, मई के महीने में अपने गौरजीत को ज़रूर याद करते हैं.

अधिकारिक जानकारी के अनुसार हमारे देश भारत में 283 प्रकार के आम पाये जाते हैं. लेकिन इनमें अधिक से अधिक 20-25 प्रकार के आम ही स्वादिष्ट हैं, खाने योग्य हैं. बाक़ी गिनाने के काम आते हैं या  नुमाइश के काम आते हैं या फिर अचार डालने के काम आते हैं. भारत विश्व में सबसे अधिक आम पैदा करने वाला देश है. कुल उत्पादन का लगभग 40 फीसद चीन, थाईलैंड, पाकिस्तान, बंगलादेश, म्यंमार, फिलीपींस आदि देशों में भी आम की अच्छी पैदावार होती है.


विश्व बाजार में रत्नागिरी का हापुस आम सब से महंगा  बिकता है. दरभंगा के मालदे, चम्पारण के ज़र्दा या ज़रदालु , बनारस का लंगड़ा, मलीहाबाद का दशहरी, गोरखपुर का गौरजीत किसी से कम नहीं लेकिन हम ने इसका अंतरराष्ट्रीय बाजार नहीं बनाया. चौसा भी एक स्वादिष्ट आम है. कर्नाटक का बादामी और गुजरात का केसर आम भी स्वादिष्ट होता है. दिल्ली में मार्च में ही एक पीला आम हर जगह नज़र आने लगता है, बरसात के पीले मेंढकों की तरह. यह आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु का सफेदा आम है. रंग पीला है, नाम सफेदा है, स्वाद ग़ायब है. तंदुरुस्त आम है, मैंगो शेक बनाकर पीने के काम आता है. गुजरात, राजस्थान और कर्नाटक के कुछ हिस्सों में सिंदूरी और तोता परी नाम का आम भी खूब पाया जाता है. दिल्ली के आस पास रटवल आम की भी बड़ी धूम है. मगर इन आमों में वह स्वाद कहां जो मालदे, दशहरी, चौसा और गौरजीत में होता है.


 आमों के मौसम में एक दो वक़्त खाना न खाएं सिर्फ आम ही खा लें तो चलेगा. उनको चार आम पसंद हैं-गौरजीत, दशहरी , चौसा और मालदे. मालदे आम को गोरखपुर, देवरिया, कुशीनगर के इलाकों में कपुरी आम कहते हैं. चित्तिदार कपुरी आम की खुशबू और स्वाद का जवाब नहीं. दिल्ली वाले न जाने क्यों मालदे आम को लंगड़ा आम कहते हैं. जबकि लंगड़ा आम अलग प्रजाति है, बनारस का लंगड़ा आम सब से मशहूर है. बनारस वाले अपने लंगड़े पे फ़िदा हैं. बहुत से दिल्ली वाले मानसिक लंगड़ेपन का शिकार हैं. हर वक्त "दिल्ली वाला" होने के नशे में रहते हैं जबकि आता जाता कुछ नहीं. इसीलिए मालदे आम को लंगड़ा आम कहते हैं. एक सब्ज़ी है नेनुआ, इसे पूरब में घेंवड़ा भी कहते हैं. दिल्ली वाले तोरी या तोरई कहते हैं. जबकि तोरी नेनुआ के ख़ानदान की ही एक अलग सब्ज़ी है. ख़ैर छोड़िए, दिल्ली वालों की मानसिकता का ज़िक्र फिर कभी. वरना बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी. हाँ, इतना जरूर है कि हिंदी साहित्य के विद्वान, प्रधानाचार्य डॉक्टर शाकिर अली ख़ान कहा करते हैं कि दिल्ली का न अपना कोई मौसम है, न कल्चर है न एग्रीकल्चर है. ज़ाहिर सी बात है कि दिल्ली वालों का अपना कोई आम भी नहीं है. दिल्ली वालों में एडवोकेट खलीलुर्रहमान का बड़ा नाम है. वे बताते हैं कि दिल्ली वाले सरौली आम के बड़े दीवाने हैं. रटवल आम भी दिल्ली वालों की ख़ास पसंद है. रत्नागिरी के डॉक्टर मोहम्मद दानिश ग़नी को हर हाल में अपना अलफांसो ही पसन्द है. जेएनयू के प्रोफेसर अनवर पाशा हों या बेतिया के साहित्यकार डॉक्टर शकील मोईन और डॉक्टर नसीम अहमद, ये लोग अपने ज़र्दा या जर्दालू आम पे फ़िदा हैं. मुश्ताक अहमद नूरी और डॉक्टर अबरार रहमानी पटना के आस पास पाए जाने वाले दुधिया मालदे के सर पर आमों के राजा का ताज रखते हैं. डाक्टर शकील अहमद ख़ान को दरभंगा के मालदे आम के स्वाद के सामने कोई आम पसंद नहीं. सच बात तो यह है कि भारत वर्ष में आमों की ये 20 -. 25 प्रजातियां ऐसी है जो अपने स्वाद में बेजोड़ है. सब का अपना अलग महत्व और मज़ा है लेकिन गोरखपुर का गौरजीत तो गौरजीत है. गोरखपुर, खलीलाबाद, बस्ती, देवरिया और कुशीनगर के लोग अपने गवरजीत को अपनी यादों में बसा कर रखते हैं.

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