क्वार का महीना और गर्भवती धूप....

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क्वार का महीना और गर्भवती धूप....

सतीश जायसवाल 

कभी ऐसा भी होता है कि कोई भ्रम उसके यथार्थ से अच्छा लगने लगता है. तब उससे बाहर निकलने के बदले अपना मन इस भ्रम को सायास बनाये रखना चाहता है. उस दिन भी यही हो रहा था. वह विश्वकर्मा पूजन का दिन था और रास्ते भर पण्डाल सज रहे थे. देव प्रतिमा की स्थापना हो रही थी. मुझे दुर्गा पूजा की तैयारियों का भ्रम हो रहा था. इस भ्रम को बनाये रखना अच्छा लग रहा था.

वह सितम्बर महीने के दूसरे पखवाड़े का बेहद उमस भरा समय था. और हम पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के ग्राम्यांचलों से होकर निकल रहे थे. बंगाल में दुर्गोत्सव की तैयारियां भी लगभग इसी आसपास शुरू होती हैं. इस समय बारिश के बादल वापस लौट रहे होते हैं. और कास के भूरे-सफ़ेद फूल खिल रहे होते हैं. सत्यजित रे ने अपनी फिल्म पथेर पांचाली में कास के इन भूरे-सफ़ेद फूलों को अनश्वर सौंदर्य प्रदान किया है. उनसे पहले, शायद किसी का भी ध्यान इन फूलो पर नहीं गया था.

इससे पहले मैंने भी इस सड़क को कहाँ देखा था, जो कोलकाता से निकल कर बांंग्लादेश की तरफ जाती है ? और कोलकाता से बाहर निकलते ही सड़क के दोनों किनारों पर इन भूरे-सफ़ेद फूलों के गुच्छे सर उठाये हवा में डोलते हुए मिलने लगते हैं ! पथेर पांचाली बनाने के निर्णय से पहले सत्यजित रे का मन बेहद उद्विग्न था. तब वे इसी सड़क पर निकल कर आये थे. और वह इसी मौसम की बात थी, जब दुर्गोत्सव की तैयारियां शुरू हो रही होती हैं. ढाकुलिए ढाक पर अभ्यास कर रहे थे और सत्यजित रे का आस्थावादी मन भरोसा दिला रहा था कि सब कुछ ठीक होगा.

मैं उसी सड़क पर हूँ ? यह मुझे रोमांचित तो कर ही रहा था, साथ ही एक सुन्दर यात्रा का भरोसा भी करा रहा था.

नदिया जिले के ग्रामांचलों से होकर गुजरने वाली यह सड़क बांग्लादेश की सरहद के साथ साथ चलती है. कृष्णनगर इसी रास्ते पर है. कृष्णनगर की मृण्मूर्तियां कलात्मक होती हैं. इनके साथ एक सम्बन्ध मेरी स्मृतियों का भी है. एक बार कृष्ण्नगर की इन कलात्मक मृण्मूर्तियों की प्रदर्शनी हमारे यहां लगी थी. उस प्रदर्शनी में एक ऐसी रुपवती मुझे दिखी जो इन कलात्मक मूर्तियों की तरह सुन्दर थी. इसलिए,मैंने अपने लिए उस रुपवती का नाम मृण्मया रख लिया. उसे तो अपने इस नाम का कभी पता भी नहीं चलेगा, क्योंकि यह मेरे पास सुरक्षित है. लेकिन यहां, मैं उन कलात्मक मृण्मूर्तियों को गढ़ी जाते हुए देख सकूंगा.

वापसी में मैं शान्तिपुर में भी रुकूंगा. वहाँ की मशहूर टांगाइल साड़ियां खरीद कर अपने साथ ले जाऊंगा. इस तरह का खब्त मेरे दिमाग में क्यों आता है ? और किसके लिए आता है ? क्या पता ! कहीं, कोई है ही नहीं. फिर भी.

शांतिपुरी तांत की साड़ियां बंगाल में बंगाल से बाहर भी मशहूर हैं. यहां घर-घर में करघे हैं. इन करघों पर बुनी जाती हुयी, और फिर बुनकर उतारी जाती हुयी साड़ियों को देखना,उन पर तरह-तरह की रंग-बिरंगी आकृतियों को बनते हुए देखना -- एक पूरी रचना प्रक्रिया के साथ सीधा साक्षात्कार होगा. एक कलात्मक अनुभूति भी. इसके लिए समय चाहिए. और इत्मीनान भी. अभी तो मायापुर पहुँचने की जल्दी है. ध्यान वहीं है.

मायापुर पहुँचते-पहुँचते रात हो गयी. मन असमंजस में था कि इतनी रात गए यहां जगह नहीं मिली तो कहाँ जायेंगे ? हालांकि चन्दू ने ''इस्कॉन'' मंदिर के इंटरनेशनल गैस्ट हॉउस में पहले से खबर करा दी थी. और मुझे भरोसा दिलाया था कि उसका इंतज़ाम पक्का होता है. यह उसका ही इंतज़ाम है.

चन्दू माने, कोलकता के उद्योग समाज के चन्द्र शेखर जालान, जो अब मालूम नहीं कहाँ होंगे -- यहीं कोलकाता में या सिंगापूर में या कैलिफोर्निया में या कहीं और ? चन्दू कहीं भी हो सकता है. वह एक बहुत ख़ास किस्म का दोस्त है. इस किस्म के दोस्तों के दम पर खुशवन्त सिंह कहते हैं कि पकिस्तान में ऐसा एक भी दोस्त हो तो फिर उसके सामने सारे वीआईपी छोटे.

भारतीय पत्रकारिता में आज कितने बड़े-बड़े पुरस्कारों के बाद भी द स्टेट्समैन(कोलकता) के ग्रामीण पुरस्कार की प्रतिष्ठा सबसे अलग है. यह प्रतिष्ठा लगातार दो बार मुझे मिल चुकी है. पुरस्कार की अपनी ख़ुशी में शामिल करने के लिए मैंने चन्दू को पुरस्कार समारोह का आमंत्रण पत्र भिजवाया था. लेकिन हाँ कहने के बाद भी वह नहीं आया था. अपने नहीं आ पाने के मुआवज़े में उसने अपनी नयी ए/सी कार और स्थानीय ड्राइवर के साथ तीन दिनों के शोनार बांग्ला दर्शन का एक कार्यक्रम बनाकर मेरे हाथ में थमा दिया.

सितम्बर के दूसरे पखवाड़े की मध्यरात्रि में वहाँ, मायापुर में रौशनी हो रही थी. और ''इस्कॉन'' मन्दिर के विशाल प्रांगण में देशी-विदेशी कृष्ण भक्त विचरण कर रहे थे. मस्तक पर चन्दन के वैष्णवी तिलक धारण किये हुए. और हाथों में तुलसी की मालाएं सरकाते हुए. वे सबके सब पहले तो कोई देवदूत लगे, फिर चैतन्य महाप्रभु लगने लगे. एक साथ इतने-इतने चैतन्य महाप्रभुओं को देखना एक विलक्षण अनुभव था. उन चैतन्य महाप्रभुओं ने विदेशी उच्चारण वाली शुद्ध हिन्दी में हमारा स्वागत किया. और विशाल फाटक खोल दिया. उन्होंने बताया कि आज ''इस्कॉन'' के संस्थापक प्रभुपाद का जन्मदिवस है.सितम्बर के दूसरे पखवाड़े की उस मध्यरात्रि में वहाँ प्रभुपाद के जन्मदिवस का समारोह आयोजित था. इसलिए वहाँ रौशनी हो रही थी. मध्यरात्रि में वहाँ एक समूचा मायालोक जाग रहा था. इसमें प्रवेश करना एक अतीन्द्रिय-बोध था.


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