इंजन की भाप में डूबा स्टेशन

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इंजन की भाप में डूबा स्टेशन

अंबरीश कुमार  

ट्रेन का इंजन वहीं तक आया जहां हम खड़े थे .इंजन से निकली भाप चारो तरफ फ़ैल गई .इतनी घनी कि बगल में खड़े अजय भी नहीं दिखे .एक दो मिनट बाद भाप हवा से उड़ी पर धुंध तो थी ही .बरसात से माहौल में ठंढ भी बढ़ गई थी .हालांकि मौसम गर्मी का था .यह सत्तर के दशक के अंतिम वर्ष की गर्मियां थी .दार्जिलिंग से घूम आये थे घूमने के लिए .और इस स्टेशन का महत्व इसलिए भी था क्योंकि 7407 फुट पर बना यह देश का सबसे उंचा रेलवे स्टेशन है.चाय हम ले चुके थे .वापस दार्जिलिंग जाना था .दूरी तो ज्यादा नहीं चार मील की ही है पर वहां भी पहाड़ चढ़ना था .फिर मौसम का क्या भरोसा कब बरस जाए .छाता भी तो था नहीं .तब हम लोग छाता बरसाती रखते भी कहां थे .बरसात होती तो भीगा ही जाता .पर यह तो पहाड़ की एक ठंढी दोपहर थी .पर दोपहर जैसा कोई अनुभव हो नहीं रहा था .सब धुंध और बदल में गड्ड मड्ड हो गया था .यह स्टेशन भी बड़ा अजीब था .रेल की पटरियां स्टेशन से पहले विभाजित हो जाती और फिर आगे जाकर पास आ जाती .

घूम से रेल के जिस डिब्बे में चढ़े वह लगभग खाली ही था . खटारा सा यह डिब्बा नमी से भरा था .डब्बा क्या पूरी ट्रेन ही खस्ता हाल थी .लकड़ी की सीट भी नम ही थी .बरसात की वजह से स्थानीय लोग कम थे तो सैलानी भी .बादल भी स्टेशन पर आ जा रहे थे .धुंध की वजह से ज्यादा दूर तक देखना मुश्किल था . जो लोग पीछे से आ रहे थे वे प्लेटफार्म पर चाय की चुस्की ले रहे थे .कुछ मोटा सा स्थानीय बिस्कुट भी .ट्रेन आने से पहले हम इस स्टेशन पर चहलकदमी कर रहे थे .जहां प्लेटफार्म खत्म होता है वहां त्रिकोण जैसा एक छोटा सा बगीचा बना था जिसके दोनों और पटरियां जा रही थी .बहुत कम ऐसे स्टेशन देखने को मिलते हैं .और प्लेटफार्म भी तो दो ही थे एक दायें तो एक बाएं .एक नवविवाहित बंगाली जोड़ा प्लेटफार्म पर हाथ में हाथ डाले घूम रहा था .कोई उन्हें नोटिस भी नहीं कर रहा था .पहाड़ी सैरगाहों पर यह आम बात है .इस पहाड़ी सैरगाह पर आने वाले ज्यादातर बंगाली ही नजर आये .ट्रेन ने प्लेटफार्म छोड़ा ही था कि बरसात तेज हो गई .खिड़की बंद करनी पड़ी .पर फिर हम उठे और दरवाजे के पास चले गए .ट्रेन की रफ़्तार वैसे भी बहुत धीमी थी .यह ट्रेन शहर के बीच से गुजर रही थी .किसी बस की तरह .पर आगे पहाड़ था .चीड़ और देवदार के पेड़ भी गुजर रहे थे .अपना ठिकाना दार्जिलिंग का यूथ हास्टल था जो मिला भी बहुत मुश्किल से था .कोई कमरा खाली नहीं था .भारी बरसात में हम पहाड़ चढ़ कर ऊपर आये थे और अब नीचे कोई और जगह तलाशना मुश्किल था .हम तीन लोग थे .अंत में मैनेजर ने यूथ हास्टल का कंबल गद्दा रखने वाला स्टोर खुलवा दिया .बोला ,आज यही मिल सकता है कल देखेंगे .खानें में आलू गोभी और टमाटर की सब्जी और चावल मिलेगा .कुछ और खाना है तो दूर बाजार जाना पड़ेगा .कौन ऐसे मौसम में पहाड़ पर स्थित यूथ हास्टल से नीचे उतरता .हम बरामदे में बैठे और रेडियो पर आ रहा गीत सुनने लगे .जारी 


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