कंचनजंगा पर बरसती सुबह की धूप

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कंचनजंगा पर बरसती सुबह की धूप

अंबरीश कुमार 

रात का खाना माल रोड के आगे एक तिब्बती रेस्तरां में हुआ .पर पहले हल्की गर्म छंग से शुरुआत हुई .बांस के बने ग्लास में यह दिया गया था .फिर तिब्बती खाना हुआ .हल्की रौशनी में यह रेस्तरां किसी बार जैसा ही था पर महिलाओं की संख्या कम नहीं थी .खाना स्वाद वाला था .वैसे भी तिब्बती चटनी का तीखा स्वाद देर तक महसूस होता है .कार्यक्रम तभी बना कंचनजंगा का .दार्जिलिंग प्रवास पूर्वोत्तर को देखने का भी मौका था .सिक्किम से लेकर कलिम्पोंग तक .यहां जाने के रास्ते ही मन मोह लेते हैं .बादल ,धुंध और हरियाली के बीच तरह तरह के फूल .अगर चाय बागान से गुजरे तो कुछ देर ठहर कर ही जाना हो पायेगा .चाय बागान की हरियाली आगे बढ़ने भी कहां देती .पर हम सुबह टाइगर हिल के लिए निकले तो अंधेरा छटा नहीं था .जाना भी दस बारह किलोमीटर था .और पहुंच भी समय से गए .बीच में मन हुआ कि चाय पी जाए पर लगा कि हिमालय की चोटियों को बादल में छिपने का मौका नहीं देना है .हिमालय दर्शन का यह पुराना फार्मूला है .चाहे कौसानी रानीखेत हो या फिर दार्जिलिंग .हम पहुंचे तो सैलानी जम चुके थे .सामने कंचनजंगा की चोटियां चमक रही थी .सुबह की धूप उनपर बरस रही थी जिससे उनकी चमक देखते बनती .हिमालय की बर्फीली चोटियों पर धूप का असर देखने वाला होता है .फोटो के लिए भी यह सबसे अच्छा मौका होता है .किस्मत भी ठीक थी बादल नहीं थे .ऊपर नीला और खुला आसमान था .हिमालय की सुनहरी चोटियों ने हमें बांध दिया था .

कुछ देर बाद वापसी हुई तो चाय की दूकान तलाशी गई .नहीं मिली तो आगे बढ़ गए .एक दो झरने भी मिले .पहाड़ से नीचे उतारते हुए किसी के बगीचे के बीच से निकल जाते थे .अब बादल आ चुके थे और झींसी पड़ रही थी .एक छोटा सा ढाबा भी दिख ही गया .एक महिला चाय बना रही थी .पर यह कड़क चाय थी लीफ टी नहीं .गाड़ी से बाहर आये तो ठंढ और हवा की ताजगी दोनों महसूस हुई .चाय के ग्लास की गर्मी और कड़क स्वाद सुखद अहसास था .सामने घाटी की हरियाली और नहाये हुए दरख्त थे . फोटो सोशल मीडिया से साभार 

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