मायावती अब सिर्फ जाटवों की नेता रह गई

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मायावती अब सिर्फ जाटवों की नेता रह गई

विभूति नारायण राय 

नई दिल्ली .लोकसभा चुनाव में एक तरफ जहां पिछड़ी जातियों में बंटवारा हुआ और समाजवादी पार्टी के साथ राष्ट्रीय जनता दल को बड़ा झटका लगा वहीँ कांशीराम के बनाए बहुजन समाज पार्टी को भी झटका लगा .उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा के गठबंधन के चलते बसपा किसी तरह कुछ सीट बचा ले गई पर वह फायदा उसे नहीं हुआ जिसकी लोग उम्मीद लगाए हुए थे .यह क्यों हुआ इसे समझना होगा .

दरअसल कुछ ऐसी ही संकीर्णता का शिकार दलित आंदोलन भी हुआ . अस्सी के दशक मे यह सही अर्थों मे बहुजन का आंदोलन था . कांशीराम ने सरकारी कर्मचारियों का संगठन बामसेफ खड़ा किया जिसमें सभी दलित जातियों का प्रतिनिधित्व था . बहुत से यादव और कुर्मी बुध्दिजीवियों ने बहुजन समाज आंदोलन की सैद्धांतिकी निर्मित की . अलग अलग पिछड़ी और दलित जातियों के लेखकों के लिखे नाटक खेलते और गीत गाते कार्यकर्ताओं ने समाज मेंतूफ़ान की तरह एक ज़बर्दस्त लहर पैदा कर दी थी जिसकी मिसाल सिर्फ़ मध्य काल के भक्ति आंदोलन में तलाशी जा सकती है . डाक्टर अम्बेडकर को अपना प्रेरणा पुरुष मानने वाले इस आंदोलन से अपेक्षा की जा सकती थी कि यह उनकी सबसे महत्वपूर्ण कामना ' जातियों के समूलोच्छेदन ' के अनुरूप जातियों के विनाश का प्रयत्न करेगा .हुआ बिल्कुल उल्टा ही.कांशीराम और उनकी उत्तराधिकारिनी मायावती ने जातियों को नष्ट करने की जगह  उन्हें मज़बूत करने का ही काम किया .पहली बार बहुजन समाज पार्टी ने अलग अलग जातियों के सम्मेलन  किये . ख़ास तौर से दलित जातियों के नायकों की मूर्तियां मुख्य चौराहों पर लगाई गयीं . ऊदा देवी या बिजली पासी जैसे विस्मृत दलित नायकों को इस तरह याद करना स्पृहणीय था पर इनके पीछे छिपी मंशा जातिगत चेतना को हवा दे कर उन की जातियों को बसपा का वोट बैंक बनाना था . कांशीराम यह भूल गये कि एक बार इन जातियों के अंदर नेतृत्व पैदा हो गया तो उसे महत्वाकांक्षी बनने और ख़ुद उनके नारे ' जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी भागीदारी'  के अनुसार पार्टी नेतृत्व समेत सत्ता तंत्र में भागीदारी माँगने से कोई रोक नही सकेगा . उनके नारे की भावना तो सारी ग़ैर द्विज जातियों को गोलबंद करना था पर इसके लिये तो उन्हें स्वयं को किसी एक जाति की पहचान से बाहर निकल कर एक वृहत्तर बहुजन पहचान मे समाहित करना चाहिये था . वे या मायावती यही नही कर पाये . मायावती ने एक बार स्पष्ट रूप से कहा भी कि बीएसपी का अध्यक्ष कोई चमार जाति का व्यक्ति ही हो सकता है अर्थात बात भले बहुजन समाज़ की हो नेतृत्व चमार या जाटव ही करेगा . वे  भूल गईं कि ग़ैर चमार दलित जातियाँ मिल कर चमारों से अधिक हो जायेंगी .भाजपा ने इसी अंतर्विरोध का लाभ उठाया .

नौकरियों मे आरक्षण का सर्वाधिक लाभ कुछ ख़ास जातियों ने उठाया है अतः सबसे पहले बिहार मे अनुसूचित जातियों मे महदलित औरपिछड़ों मे अति पिछड़े का विभाजन किया गया . किसी से छिपा नही है कि उत्तरी भारत मे अनुसूचित जातियों मे चमार या जाटव जाति शिक्षा और सामाजिक / राजनैतिक चेतना मे इसी श्रेणी की दूसरी जातियों से बहुत आगे है फलस्वरूपनौकरियों काबड़ा हिस्सा उनके खाते में आता है .दलित जातियों मेंपासी ,वाल्मीकि,धोबी,खटिक,मुशहर और दुसाध आदि जाटवों से सामाजिक , शैक्षणिक और आर्थिक क्षेत्रों में पिछड़े हैं . होना यह चाहिए था कि बहुजन एकता को ध्यान मे रखते हुये इन्हें भी नेतृत्व और सरकारी नौकरियों मे जगह मिलती पर ऐसा नही हुआ . मायावती का खुल कर यह कहना कि केवल चमार जाति का व्यक्ति ही बीएसपी का अध्यक्ष हो सकता है न सिर्फ़ अराजनैतिक बयान थाउसका संदेश भी ग़ैर जाटव अनुसूचित जातियों मे अच्छा नही गया .

संघ परिवार ने इन अंतर्विरोधों को चतुराई से भुनाया . 2014 के चुनावों तक मुलायम या लालू परिवारसमस्त पिछड़ों के नही बल्कि सिर्फ़ यादवों के नेता रह गये . पिछड़ों की संख्या मे कम लेकिन शिक्षा और महत्वकांक्षा मे उनसे टक्कर ले सकने वाली जातियों यथा कुरमी, काछी , कुशवाहा , चौरसिया,गूज़रको भाजपा से जोड़ने मे संघ रणनीति कारों को विशेष दिक्कत नही हुई . इनके अतिरिक्त कहार , राजभर या केवट ( मल्लाह ) जैसी जातियों ने भी अस्मिता की राजनीति के दाँव पेंच सीखकर अपनी जातियों के नेतृत्व  खड़े कर लिये. यह तय हो जाने के बाद कि मुलायम और लालू परिवार सिर्फ़ यादवों के नेता हैं शेष पिछड़ों को भाजपा मे जाने में कोई दिक्कत नही हुई .

लगभग यही परिदृश्य दलित राजनीति का है . मायावती अब सिर्फ़ जाटवों या चमारों की नेता है . शेष दलित जातियाँ भाजपा के खेमे मे हैं .2014 और   2019 के चुनावों मे मोदी की सफलता के पीछे यह एक बड़ा कारण है और इससेअस्मिता की राजनीति पर एक नया विमर्श शुरू हो सकता है .इस विमर्श की शुरुआत भाजपा करेगी आरक्षण के लिये पिछड़ों मे अति पिछड़े और दलितों में महादलित का बंटवारा कर के . क्या लोकतांत्रिक शक्तियों को हस्तक्षेप कर एक ऐसे विमर्श की शुरुआत नही करनी चाहिए जो डाक्टर आम्बेडकर के सपने ' जातियों के समूलोच्छेदन ' की बात सोचे ? ( विभूति नारायण राय ने पिछले शुक्रवार पिछड़ों और दलितों की चुनावी राजनीती पर जो टिपण्णी की थी उसकी अंतिम क़िस्त )

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