जनादेश

जब तक जिए शान से जिये चन्द्रशेखर असली समस्या तो बुद्धि है सादगी में मुस्कुराता चेहरा यानी चंद्रशेखर गांव ,गरीब और पेड़ के लिए सत्याग्रह गुजर जाना एक दरख्त का जोमैटो में चीन का निवेश रुका कोई क्यों बनती है आयुषी क्या समय पर हो जाएगा वैक्सीन का ट्रायल हरफनमौला पत्रकार की तलाश काफ़्का और वह बच्ची ! कोरोना ने चर्च भी बंद कराया सरकार अपनी जिम्मेदारियों से क्यों भाग रही है? वसूली का दबाव अलोकतांत्रिक विपक्षी दलों ने कहा ,राजधर्म का पालन हो पुर्तगाल ,गोवा और आजादी कब शुरू हुई बाबाओं की अंधविश्वास फ़ैक्ट्री कोरोना से बाल बाल बचे नीतीश आंदोलनकारी या अतिक्रमणकारी ओली के बाद प्रचंड की भी राह आसान नही खामोश हो गई सितारों को उंगली से नचाने वाली आवाज

फिल्मों के इस खेल को भी बूझे

चंचल 

हम इस विषय पर नही जाना चाहते थे , गो कि सुशांत की मौत ने हमे भी उतना ही झकझोरा है जितना किसी भी संवेदनशील को आहत किया होगा . हमे हैरानी हुई जब हमारी तरह के अनेक अज्ञानी ( फ़िल्म के संदर्भ में ) लगे ज्ञान बाटने और नसीहत देने . एक कंगना को छोड़ कर दूसरा कोई फिल्मी कारकून सुशांत की मृत्यु पर सवाल उठाने के लिए नही खड़ा हुआ जो आये भी वे सफाई देने आए . तुर्रा इस बात का की कंगना भी लोंगोके निशाने पर आ गयी और आरोप लगा कि वक्त देख कर बोलती है . कंगना ने सच कहा एक गलत बोली , बहस इस पर नही हुई वो मुड़ गई दूसरी तरफ .

अवसाद फिल्मी दुनिया का स्थायी भाव है . कुछ मौत तक चले जाते हैं कई घुट घुट कर बेनामी जिंदगी बसर करते हैं . अवसाद के कारण अलग अलग हो सकते है उन्हें हम रेखांकित नही कर रहे लेकिन फिल्मी दुनिया का यह सच इसकी नींव में है . शैलेन्द्र , गुरुदत्त , देवानंद , राजकुमार , मीना कुमारी , काका , बहुत नाम हैं . अनगिनत तो वो हैं जो पर्दे पर नही आते लेकिन बगैर उनके फिल्मी दुनिया चलती नही . अवसाद का रिश्ता अवसान से जुड़ा है . हीरो जब उम्र के ढलान पर दूसरी कतार में खड़ा कर दिया जाता है तो अंदाज लगाइये क्या गुजरती होगी उसपर ? दूसरी कतार में खड़ा होना मानवीय साजिश नही है , व्यवसाय की जरूरत है और फ़िल्म विशुद्ध रूप से व्यवसाय है .

फिल्मी दुनिया वह नही है जिसे हम पर्दे पर देखते हैं आजल खिलाड़ी वो हैं जो पर्दा देखते ही नही , उससे कमाते हैं उन्हें ' वितरक ' फ़िल्म डिस्ट्रीब्यूटर कहते हैं .एक वाक्या सुनिए जो पर्दे पर नही आता . गीतकार शैलेन्द्र और राजकपूर की दोस्ती जगजाहिर है . फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी ' तीसरी कसम ' पर्दे पर उतरना शैलेन्द्र की जबरदस्त ख्वाइश रही . शैलेन्द्र की पूरी कमाई लग गई , उधार भी चढ़ा फ़िल्म किसी तरह बन गयी . लेकिन कहानी के अंत को लेकर वितरक संसोधन चाहते थे . विर्क का कहना था कि अगर हीरा बाई और हिरामन अंत मे बिछड़ जांयगे तो दर्शक निराश होगा और फ़िल्म पिट जाएगी . राज कपूर भी इसी राय के थे , राज यह चाहते थे कि शैलेन्द्र की माली हालत तो सुधर जाय . लेकिन शैलेन्द्र तैयार नही हुए . फैसाला हुआ कि कहानी लेखक की राय पूछी जाय . रेणु ने भी वितरक राय के खिलाफ जाकर शैलेन्द्र की राय का समर्थन किया . राज कपूर भी नाराज हो गए और वितरक भी हट लिए . अंत आपको मालूम है .

एक खेल हमारे सामने का है . समाजवादी पार्टी में एक दलाल का प्रवेश हुआ . राज बब्बर और दलाल के बीच ठन गई . जमाने के हीरो रहे नामी कलाकार से दलाल के रिश्ते सब को मालूम है . नतीजा हुआ राज बब्बर और उनके परिवार जिसमे राज के बेटे और बेटी को फिल्मी दुनिया से बाहर रखने का खेल चला और आज तक बदस्तूर जारी है .सुशांत मूलतः कलाकार था , भाउक था . लड़ने की जगह मौत को वरण कर लिया सुशांत को विनम्र श्रद्धांजलि

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