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चीन की हरकत गुस्से में हैं सैनिक परिवार !

नेपाल सीमा से यशोदा श्रीवास्तव

गोरखपुर से सोनौली होते हुए नेपाल जाते समय एक गांव पड़ता है उदितपुर.यह गांव गोरखपुर और नेपाल सीमा के मध्य स्थित है.पूरा गांव गोरखा रेजीमेंट के पूर्व सैनिकों का है. यहां से नेपाल सरहद 40 किमी दूर रह जाता है. गोरखपुर से नेपाल सीमा के सोनौली अथवा नौतनवा तक आने जाने का कोई साधन नहीं था.करीब सौ किमी की यह दूरी लोग अधिकांशतः पैदल ही तय करते थे. ब्रिटिश हुकूमत ने इस गांव को गोरखा सैनिकों के लिए एक पड़ाव के रूप में सृजित किया ताकि नेपाल अपने गांव आते जाते समय ये सैनिक यहां एक रात का विश्राम कर सकें.इसे सैनिक ग्राम भी कहते हैं.

इस गांव के पूर्व सैनिकों के परिवार के कई युवक अभी भी भारतीय सेना के विभिन्न अंगों में सेवारत है. 1962 के भारत चीन युद्ध के गवाह कुछेक सैनिक  यहां मौजूद हैं. चीन बार्डर पर गलवान में घटित घटना से यह गांव गम और गुस्से से सन्न है. कई पूर्व सैनिकों ने एक स्वर से कहा चीन आस्तीन का सांप है. पीठ में छूरा घोपना इसकी फितरत है.जब जब हम इसके कथित मित्रतता के पाखंड में फंसे,धोखा ही खाए.

2019 में जब देश में मोदी के नेतृत्व में बीजेपी की पूर्ण बहुमत की मजबूत सरकार आई तो तमाम ऐसे क्षेत्रों में विश्वास की आस जगी जहां भारत अविश्वास के भवंरजाल में फंसा हुआ महसुस करता रहा.चीन भी इसमें से एक रहा.मोदी ने देश को भरोसा दिया था कि शी जिनपिंग और उनके बीच के संबंध अटूट है. दोनों के संबंधों के सूत्रधार चीनी यात्री ह्वेनसांग था जो भारत में मोदी के गांव रहा और जब चीन लौटा तो जिनपिंग के गांव भी रहा.यह दावा जिनपिंग के हवाले से मोदी का ही है.हैरत है कि संबंधो के ऐसी कथित मिठास और मजबूती के बीच चीन से कभी डोकलाम तो कभी गलवान के रूप में धोखा ही मिला.गलवान की घटना, जहां हमारे 20 जवान शहीद हो गए, उससे तो सारा देश गुस्से से तिलमिलाया हुआ है.

 सैनिक ग्राम उदितपुर के पूर्व सैनिक कैप्टन मानसिंह जो 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान मेंचुका में तैनात थे, कहते हैं कि चीन बेहद खतरनाक देश है, उस पर भरोसा करना गलत है.कहा कि नियमत: चीन बार्डर पर तैनात दोनों देशों की सेनाएं हथियारों से तो लैश होते हैं लेकिन वे डाउन मोड में होते हैं. घोषित युद्ध में ही हम इसका इस्तेमाल कर सकते हैं. सेना के नियमों को लेकर हम बेहद अनुशासित व प्रतिवद्ध होते हैं, चीनी सैनिक भितरघाती व विश्वास घाती होते हैं. हम यहीं मारे जाते हैं. गलवान में हमारे सैनिकों के साथ ऐसा ही हुआ.लेकिन हमारी स्थिति 1962 जैसी नहीं रह गई. भारत चीन को मुंहतोड़ जबाब देने पर विचार करे ताकि हमारे शहीद हुए बच्चों के परिजनों का कलेजा ठंडा हो,और हमारा भी.

इसी गांव के हवलदार गंगा राम गुरूंग जो1962 के युद्ध के दौरान भारत-चीन सीमा के वालूंग में तैनात रहे,कहते हैं कि 1962 की तस्वीर दूसरी थी.दिन रात के युद्ध में भारत को निराशा हाथ लगी थी.पूराने हथियार थे, चीन की तुलना में सेना भी कम थी,चीन के पास आधुनिक हथियार थे. इसलिए भारतीय सेना को हटना पड़ा था.अब तो हम चीन क्या चीन जैसे बीस देशों के छक्के छुड़ा सकते हैं. चीन न भरोसे लायक तब था और न अब है. इसे इसकी ही भाषा में जवाब देना होगा.

सुबेदार मेजर एसबी गुरूंग भारत-चीन सीमा के गलवान की घटना पर बेहद गुस्से में थे.होंठ भींचते हुए कहा कि वहां की भौगोलिक परिस्थिति भी धोखे बाज है.नए लड़के तो रास्ता तक भटक जाते हैं. चीनी सैनिक जब घात करना चाहते हैं तो ये रास्ते भी उनके मददगार होते हैं.हमारे जो बीस सैनिक शहीद हुए,उसमें ऐसे भी तमाम कारण रहे होंगे.गलवान की घटना पर व्यथित करीब दो हजार की सैनिक आवादी के इस गांव में कई घरों में चूल्हे नहीं जले.गोरखा रेजिमेंट के सैनिक मूलत:नेपाली हैं लेकिन गलवान में शहीद सैनिकों के गम में यहां सैनिकों की पत्नियों की आंखो में आंसू देखा गया.उन्होंने साफ कहा कि सैनिकों का कोई अलग जात धर्म नहीं होता.हम एक परिवार के होते हैं. कहीं भी सैनिक शहीद होता है तो हमारा कलेजा फटता है.


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